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गंगा सफाई अभियान कहां तक पहुंचा?

Thu, 19 Mar 2020 06:48 PM IST
Raman Singh ज्ञानेन्द्र रावत
ज्ञानेन्द्र रावत Published by: Raman Singh Updated Thu, 19 Mar 2020 06:48 PM IST
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How did far the Ganga cleaning campaign reach?
ज्ञानेन्द्र रावत - फोटो : A

बीते दिनों दो समाचार अखबारों की सुर्खियां बने। एक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान जिसमें उन्होंने गंगा आमंत्रण अभियान के सहभागियों के स्वागत समारोह में कहा था कि केंद्र सरकार के ’नमामि गंगे’ अभियान से गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता सुधरी है और देश की अति महत्वपूर्ण नदियों में एक गंगा को स्वच्छ बनाने की यह परियोजना काफी सफल रही है। सरकार देश की अन्य नदियों को साफ करने के लिए संबंधित राज्य सरकारों के साथ मिलकर ऐसी ही अन्य पहल करेगी। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आया दूसरा बयान था कि उत्तर प्रदेश में साबरमती की तर्ज पर गंगा के तटों का सौंदर्यीकरण होगा। इसमें लोगों के स्नान के लिए घाट और अन्य सुविधाओं के साथ-साथ उनके बैठने के लिए भी व्यवस्था की जाएगी। यह काम राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में पास प्रस्तावों के आधार पर विकास प्राधिकरणों के साथ निकायों के संयुक्त प्रयास से पूरे किए जाएंगे। ये प्रयास किसी हद तक सराहनीय हैं, लेकिन इनसे गंगा की शुद्धि का सवाल तो अनसुलझा ही रहा।


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असलियत यह है कि दुनिया भर में पतितपावनी, मोक्षदायिनी, पुण्यसलिला नदी के रूप में जानी जाने वाली नदी गंगा आज अपने अस्तित्व के लिए ही जूझ रही है। जिस गंगा में स्नान को लोग पुण्य का सबब मानते थे, आज उसमें स्नान जानलेवा भयंकर बीमारियों की वजह बनता जा रहा है। 2014 के मुकाबले गंगा आज बीस गुना अधिक मैली है। यह जगजाहिर है और गंगाजल के वैज्ञानिक परीक्षण इस तथ्य के जीते जागते सबूत र्हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की थी। इसकी सफलता का जिम्मा केंद्र के सात मंत्रालयों को सौंपा गया। एक अलग मंत्रालय भी बनाया गया। दावा किया गया कि गंगा सफाई का परिणाम अक्तूबर 2016 से दिखने लगेगा। उसके बाद समय-समय पर गंगा सफाई के बारे में दावे-दर-दावे किए जाते रहे और गंगा सफाई की समय सीमा भी बढ़ती रहीं।इस दौरान सम्मेलन भी हुए। उसमें बेतहाशा पैसा खर्च हुआ और योजनाए-दर-योजनाएं जरूर बनती रहीं। दावे भले कुछ भी किए जाएं गंगा दिन-ब-दिन और मैली हो रही है। गंगा का प्रदूषण अब पहले से बहुत ज्यादा हो गया है, यह इस बात का प्रमाण यह हैं कि गंगा में नील धारा और नरौरा बैराज में 30 प्रतिशत पक्षियों तथा जलीय जंतुओं की संख्या बहुत तेजी से घटी है। कन्नौज से लेकर कानपुर, इलाहाबाद, बनारस के बीच कैंसर, आंत्रशोध आदि जानलेवा बीमारियों के रोगियों की संख्या भी तेजी से ब़ढ़ रही है। गंगाजल में फॉस्फेट, क्रोमियम, नाइट्रेट की तादाद बढ़ती ही जा रही हैं। इसका असर खेती पर दिखने लगा है। दारा नगर गंज (बिजनौर) से नरोरा बैराज तक डॉल्फिन की संख्या जो पहले 56 थी अब घटकर 30 के आसपास रह गई है। प्रदूषण के चलते प्रवासी पक्षी भी रूठ रहे हैं और वे किनारा कर रहे हैं। अक्सर होता यह है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नदी के बीचों-बीच से सैंपल ले लिए जाते हैं। इससे किनारों की स्थिति का अंदाजा लगा लिया जाता है। यदि किनारे के सैंपल लिए जाएं, तो हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की चेतावनी के बाद भी गंदे नाले गंगा नदी में मिल रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक एवं आईयूसीएन के पूर्व प्रमुख डा. एम.एस.स्वामीनाथन का कहना है, 'इसे इतिहास की विडंबना ही समझिए कि कालांतर में गंगा आध्यात्मिक केंद्रों को महत्व देने वाली तो रही है, परंतु आधुनिक समय में इसे प्रदूषण का शिकार होना पड़ा है। वह जलधारा जो जीवन को सिंचित और पल्लवित करती रही है, अब एक विकट, रोग प्रसारी, प्रदूषित जलकोष बनकर रह गई है।'

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