क्षत्रपों को कैसे साधेगी कांग्रेस
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अचानक भारत का मानचित्र अलग दिखने लगा है, कांग्रेस और गैर-राजग विपक्ष के लिए अवसर की खिड़की खुली है। जम्मू-कश्मीर से लेकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात, यानी पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र में लोकसभा की 273 सीटें हैं। इनमें से भाजपा और उनके सहयोगी दलों के पास 226 लोकसभा सीटें हैं। यदि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के आज के नतीजों के साथ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ आने की संभावनाओं को जोड़ लिया जाए, तो वास्तविक संभावना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 80 से 100 सीटों का नुकसान हो सकता है। तेलंगाना में संभावित सहयोगी की चुनावी सफलता और पूर्वोत्तर, बंगाल या तमिलनाडु में राजग की संख्या में बढ़ोतरी की संभावना संभावित नुकसान के मुश्किल से एक चौथाई सीट की ही भरपाई कर सकती है।
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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सफलता सबसे ज्यादा चमकदार और स्पष्ट है। यह एक ऐसा राज्य था, जहां कांग्रेस का मुकाबला किसी मजबूत क्षेत्रीय दल से नहीं था। 'चावल वाले बाबा' की स्वीकार्यता और लोकप्रियता, जिन्होंने कल्याणकारी योजनाओं की शृंखला चलाई और नक्सल हिंसा के खिलाफ लड़ाई लड़ी, के चलते रमन सिंह स्पष्ट रूप से विजेता माने जाते थे। लेकिन वहां के मतदाता अलग तरह से सोचते थे और उन्होंने रमन सिंह को गंभीर दंड दिया। उस परिदृश्य की कल्पना कीजिए, यदि छत्तीसगढ़ की तर्ज पर शेष भारत के मतदाता वोट करते हैं!
ऐसे वक्त में जब राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के रूप में एक साल का समय पूरा किया है, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की चुनावी सफलता एक असाधारण जीत है। भाजपा को तब हार का मुंह देखना पड़ा है, जब वह चुनावी सफलता और सांगठनिक नेटवर्क, दोनों में मजबूत स्थिति में है। एक टीम नेता के रूप में राहुल को अपने दो भरोसेमंद लेफ्टिनेंटों-राजस्थान में सचिन पायलट और मध्य प्रदेश में कमलनाथ का शुक्रगुजार होना चाहिए। उनके धैर्य और कड़ी मेहनत का पूर्णतः विश्लेषण करने की जरूरत है। पायलट और कमलनाथ, दोनों मुख्यमंत्री पद के वैध दावेदार हैं। इसे बार-बार याद किया जाना चाहिए कि अशोक गहलोत को हाल ही में पार्टी महासचिव नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि गहलोत गांधी परिवार के बाद सबसे प्रभावी व्यक्ति माने जाते हैं। गहलोत को एक जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसे 2019 के चुनाव में परखा जाएगा।
कांग्रेस की जीत ने महागठबंधन की संभावनाओं में वृद्धि की है। राहुल गांधी, चंद्रबाबू ने मई, 2019 के लिए राजग के खिलाफ राज्यवार महागठबंधन करने का प्रयास किया, हालांकि अभी इसका नकारात्मक प्रभाव दिखा है। छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन ने उसे महागठबंधन में केंद्रीय स्थिति प्रदान की है। ऐसे परिदृश्य में मायावती की बसपा को दूसरे स्थान पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिसका दलित आइकन दृढ़ता से विरोध कर रही हैं। कांग्रेस की सफलता से बसपा-सपा के महागठबंधन से अलग होने की आशंका भी बन रही है और मायावती भाजपा-राजग की ओर भी जा सकती हैं। मोदी के खिलाफ सफल महागठबंधन के लिए पुनर्जीवित कांग्रेस और उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, आंध्र, तमिलनाडु आदि में गैर-भाजपा क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच सही संतुलन की आवश्यकता है। लेकिन महत्वाकांक्षी मोदी विरोधी लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को हटाने के लिए सही समीकरण और विवेकपूर्ण अंकगणित बनाने में असमर्थ हैं।