बिना नैतिकता के कैसा सुशासन
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राजनीति में एक चीज है, जो लोगों को हर बार मात दे देती है। वह चीज है, घमंड। क्या ऐसा हुआ है नरेंद्र मोदी के साथ? क्या उन्हें कहनी चाहिए थी विदेशी जमीन पर वे बातें, जो उन्होंने कही थीं पिछले दिनों देश की पिछली सरकारों के बारे में? उन्होंने कहा था कि उनसे पहले जो सरकारें थीं, उन्होंने स्कैम इंडिया बना दिया था देश को। जब इन बातों पर कांग्रेसियों ने हल्ला मचाया, तब मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन अब लगने लगा है मुझे कि इन बातों से घमंड की बू आती है और इस घमंड ने प्रधानमंत्री का नुकसान किया है। वर्ना कौन कह सकता था पिछले वर्ष जून के इस महीने में कि एक अति ताकतवर प्रधानमंत्री का यह हाल हो जाएगा?
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इतिहास गवाह है कि जब विपक्ष की सीटें कम होती हैं लोकसभा में, तब उनका शोर ज्यादा होता है। उदाहरण देते हैं वे राजीव गांधी के कार्यकाल का, जब 415 सीटें हासिल करने के बाद भी राजीव कुछ नहीं कर सके, जब बोफोर्स घोटाले के बाद उन पर विपक्ष के साधारण नेताओं ने भी हमले शुरू किए थे। नतीजा उन हमलों का यह हुआ कि 1989 के चुनाव में लोकसभा में कांग्रेस की सीटें आधी हो गईं, और मिली-जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ।
इस दौर को समाप्त किया नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष परिवर्तन और विकास का नारा देकर। लेकिन अभी एक ही वर्ष पूरा हुआ है कि उनको परिवर्तन और विकास के वायदे भूलकर ऐसी चीजों पर ध्यान देना पड़ रहा है, जो महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए थीं। सुषमा स्वराज ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करके अगर पहले ही दिन इस्तीफा दे दिया होता, तो मोदी सरकार की छवि खराब नहीं होती। नहीं हुआ ऐसा, तो जब बारी आई वसुंधरा राजे की, तो वह भी अड़ी हैं इस्तीफा न देने की बात पर। आखिर उन्होंने अपने दोस्त को बचाने की खातिर ऐसे हलफनामे पर दस्तखत किए हैं, जो भारत के हितों के खिलाफ साबित हो सकते हैं।
वसुंधरा राजे के दस्तखत हलफनामे पर जिस दिन पाए गए, उसी दिन खबर मिली कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार की एक मंत्री, पंकजा मुंडे, 206 करोड़ रुपये के एक घोटाले में घसीटी गई हैं। कहने का मतलब यह कि वही स्कैम इंडिया की बदबू आने लगी है मोदी सरकार से, जो मनमोहन सरकार से आया करती थी।
नुकसान तो हुआ है, लेकिन इतना नहीं कि रोका न जा सके। प्रधानमंत्री के दफ्तर में अगर मीडिया से संपर्क करने वाले खास अधिकारी होते, तो पहले दिन ही मामला ठंडा किया जा सकता था। इसका जिक्र मैंने जब एक वरिष्ठ भाजपा नेता से किया, तो उन्होंने कहा कि मोदी गुजरात में भी मीडियावालों से दूर रहते थे। पर यह दिल्ली है हुजूर, गुजरात नहीं, और जिन मीडियावालों से आपका पाला पड़ता है, वे किसी छोटे अखबार के पत्रकार नहीं होते।
प्रधानमंत्री कार्यालय से जब किसी ने नुकसान रोकने की कोशिश नहीं की, तो सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के बचाव में निकले भाजपा के प्रवक्ता और वरिष्ठ मंत्री। किसी ने कुछ कहा, तो किसी ने कुछ। गृह मंत्री ने तो हैरान कर दिया यह कहकर कि हमारे मंत्री इस्तीफा नहीं देते, जैसे यूपीए के मंत्री देते थे। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री इस पूरी घटना से सीख गए होंगे कि जिस देश में 400 से ज्यादा 24 घंटे चैनल हों, उस देश में मीडिया को गंभीरता से लेना पड़ता है। वह यह भी समझ गए होंगे कि बिना नैतिकता के सुशासन लाना नामुमकिन है।