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आर्थिकी: टैरिफ का काल और बाजार बेहाल बावजूद इसके भारत बना हुआ है आकर्षक दीर्घकालिक निवेश गंतव्य
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शेयर बाजार का हाल बेहाल।
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अमर उजाला
विस्तार
सितंबर, 2024 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने वाले भारतीय शेयर बाजार में उसके बाद से उल्लेखनीय गिरावट आई है और निवेशकों के 87 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डूब गई है। निवेशक कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जिसमें आर्थिक एवं कॉरपोरेट आय वृद्धि में सुस्ती, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का लगातार बाजार से पैसे निकालना, वैश्विक स्तर पर व्यापक आर्थिक अनिश्चितताएं और भारतीय शेयरों का उच्च मूल्यांकन शामिल है। इसके अलावा, ‘ट्रंप टैरिफ’ का प्रभाव, मजबूत अमेरिकी डॉलर और अन्य बाजारों की तुलना में अमेरिका की सापेक्ष आर्थिक मजबूती ने भी मंदी में योगदान दिया है। सितंबर, 2024 की तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर खराब रही।
कमजोर होती घरेलू मांग और लगातार प्रतिबंधात्मक मौद्रिक नीति के साथ-साथ संसदीय चुनावों के कारण मार्च से जुलाई, 2024 तक कम सरकारी व्यय के कारण अर्थव्यवस्था के तीन स्तंभों में कमजोरी देखने को मिली-व्यक्तिगत उपभोग व्यय, सरकारी व्यय और निजी फर्म का पूंजीगत व्यय, सभी प्रभावित हुए। चौथे स्तंभ, निर्यात को भी वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारत की जीडीपी वृद्धि दर, जो वित्त वर्ष 2023-24 में सात फीसदी से ज्यादा थी, अब वित्त वर्ष 2024-25 में छह फीसदी के स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। इस मंदी ने कॉरपोरेट लाभप्रदता और बाजार प्रदर्शन के बारे में निवेशकों की उम्मीदों को घटा दिया है। भारत में कॉरपोरेट आय, जो महामारी के बाद अच्छी रही थी, में भी तनाव के संकेत दिखने लगे हैं। कच्चे माल और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने लाभ के अंतर को कम कर दिया है।
आईटी, फार्मास्युटिकल्स और टेक्सटाइल जैसे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को कम ऑर्डर का सामना करना पड़ रहा है। आरबीआई की सख्त मौद्रिक नीति ने ऋण लेने की लागत बढ़ा दी है, जिससे रियल एस्टेट और बैंकिंग जैसे क्षेत्र प्रभावित हुए हैं, जबकि एमएफआई सेगमेंट और असुरक्षित व्यक्तिगत ऋण तनाव के संकेत दिखा रहे हैं। एफएमसीजी और ऑटोमोबाइल सहित उपभोक्ता-केंद्रित क्षेत्रों में मांग में कमी देखी गई है, खासकर शहरी अर्थव्यवस्था में। आय में धीमी वृद्धि के कारण भारतीय शेयरों का उच्च, प्रीमियम मूल्यांकन और भी अधिक बढ़ा हुआ लग रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम क्षणों में बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई। ट्रंप के संरक्षणवादी, अमेरिका पहले की बयानबाजी के चलते निवेश का प्रवाह और भी ज्यादा सुरक्षित ठिकानों की ओर बढ़ गया। विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय इक्विटी में शुद्ध विक्रेता रहे हैं, जो बाजार में गिरावट के पीछे प्रमुख कारक हैं। भारत के बाजारों में 850 अरब डॉलर से अधिक का एफपीआई निवेश है।
अमेरिकी शेयर बाजार के बेहतर प्रदर्शन, मजबूत अमेरिकी डॉलर, अमेरिका में उच्च ब्याज दरें और भारतीय अर्थव्यवस्था/आय में मंदी के कारण अक्तूबर, 2024 से एफपीआई द्वारा तेजी से बिकवाली की गई। भारत सहित सभी उभरते बाजारों में निकासी देखी गई। अमेरिकी बाजारों ने 2023 और 2024, दोनों वर्षों में 20 फीसदी से अधिक रिटर्न दिया है, और मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था वर्ष 2025 और उसके बाद के लिए भी मजबूत पृष्ठभूमि प्रदान कर रही है। वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से धन निकालकर अमेरिकी बाजारों का रुख कर रहे हैं। भारतीय बाजारों में एफपीआई की निरंतर बिकवाली ने अस्थिरता को बढ़ा दिया है। डोनाल्ड ट्रंप के विजयी होने के साथ ही बाजारों में ‘ट्रंप ट्रेड’ की धूम मच गई, जिससे अमेरिका में मुद्रास्फीति, डॉलर में मजबूती और उच्च राजकोषीय घाटे में वृद्धि हुई। इस ‘ट्रंप ट्रेड’ के कारण भी उभरते बाजारों समेत भारत से भी मजबूत निकासी हुई। अमेरिकी फेड द्वारा सितंबर से दरों में पूरे एक फीसदी की कटौती के बावजूद, हमने देखा कि अमेरिकी राजकोष में वृद्धि हुई है और अन्य सभी मुद्राओं की कीमत पर अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है। भारतीय रुपये को मजबूत करने के लिए आरबीआई ने उस अवधि में लगभग 70 अरब डॉलर खर्च किए। इससे प्रणालीगत तरलता और भी कम हो गई, जो पहले से ही सरकारी खर्च में कमी के कारण कमजोर थी।
अर्थव्यवस्था में मंदी और कुल मांग में गिरावट के स्पष्ट संकेतों के बावजूद रिजर्व बैंक ने अपने प्रतिबंधात्मक रुख को बरकरार रखा। इसके अलावा, रिजर्व बैंक द्वारा मैक्रो प्रूडेंशियल कसावट ने घरों में ऋण प्रवाह को सीमित कर दिया, जब अन्य क्षेत्रों में भी सुस्ती थी। इन सभी कारकों ने भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित किया। हालांकि, प्राथमिक बाजार में सट्टा उन्माद चरम पर था, क्योंकि फंड लगातार अति-प्रचारित शेयरों में निवेश कर रहे थे और साथ ही तथाकथित ‘ग्रे मार्केट प्रीमियम’ पर आधारित अच्छे ऑफर भी दे रहे थे, जो त्वरित लिस्टिंग लाभ का लालच दे रहे थे। नए साल में एफपीआई निकासी में तेजी आई है और जनवरी व फरवरी में भारतीय बाजारों से भारी मात्रा में निकासी देखी गई। घरेलू प्रवाह ने कुछ हद तक इसका मुकाबला किया है, मजबूत म्यूचुअल फंड एसआईपी प्रवाह ने एफपीआई की बिक्री को पचा लिया है। आय में सुधार, वैश्विक व्यापक आर्थिक स्थिरता और रिजर्व बैंक द्वारा संभावित दरों में कटौती पर ही भविष्य में बाजार में सुधार निर्भर करेगा।
हालांकि, भारत आकर्षक दीर्घकालिक निवेश गंतव्य बना हुआ है, लेकिन वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के कारण निकट अवधि में बाजार में अस्थिरता बनी रहने की आशंका है। हालांकि, उम्मीद के संकेत भी हैं। रिजर्व बैंक ने दरों में कटौती की है, बाजारों में नकदी डाली है और अपने बहुत ही प्रतिबंधात्मक मैक्रो प्रूडेंशियल क्रेडिट नीति उपायों को आसान बनाया है। सरकार ने बजट में राजकोषीय विवेक को बनाए रखते हुए मध्यम वर्ग को एक लाख करोड़ रुपये की कर राहत की पेशकश की है। दिसंबर से फरवरी के दौरान, सरकारी व्यय ने गति पकड़ी है और इससे अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी। हालांकि, ट्रंप के टैरिफ से लेकर मजबूत अमेरिकी डॉलर तक वैश्विक चुनौतियां बनी हुई हैं, फिर भी निवेशकों को भारतीय बाजार में दीर्घकालिक निवेश करते रहना चाहिए। सितंबर 2025 से आर्थिक सुधार में तेजी आएगी और हम कॉरपोरेट आय में भी सुधार दिखेंगे। शेयर बाजार में निवेश के जरिये दीर्घकालिक चक्रवृद्धि निवेश सफलता का सबसे सरल नुस्खा है। भारत इसके लिए एक मजबूत प्लेटफॉर्म प्रदान करता है।