'पुराने' कश्मीर की ओर लौटने की कैसे हो रही राजनीति, बता रहे हैं बलबीर पुंज
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विगत 22 अगस्त को श्रीनगर में छह राजनीतिक दलों- नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस, पीपुल्स कांफ्रेंस, माकपा और ए.एन.के. एक मंच पर आए। सभी दलों ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन को असांविधानिक बताते हुए पांच अगस्त, 2019 से पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग की और इसे 'गुपकार घोषणा' की संज्ञा दी। इन मांगों को लेकर श्रीनगर में पिछले वर्ष पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के 'गुपकार मार्ग' स्थित आवास पर बैठक हुई थी, इसलिए इस घोषणापत्र का नाम 'गुपकार' रखा दिया गया। इनके संयुक्त बयान के अनुसार, 'हम गुपकार घोषणा से पूरी तरह बंधे हैं। हम अनुच्छेद 370 और 35-ए, जम्मू-कश्मीर के संविधान की फिर से बहाली के लिए प्रतिबद्ध हैं और राज्य का विभाजन अस्वीकार्य है।' संक्षेप में कहें, तो ये सभी दल कश्मीर को पूर्व-स्थिति में लौटाना और घाटी की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखना चाहते हैं।
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आखिर प्रदेश की विशिष्ट 'पहचान' क्या है? क्या इसकी जड़ें सदियों पुराने कालखंड में मिलती हैं, जब कश्मीर वैदिक संस्कृति और बौद्ध-शैव मत का प्रमुख केंद्र था? क्या यह 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के समय से संबंधित है, जब लाखों हिंदू-सिख प्रदेश की मौलिक बहुलतावादी संस्कृति के साथ कश्मीर के सार्वजनिक जीवन के एक जीवंत अंग थे? क्या इसका संबंध 1980-90 के दशक से है, जब जिहादी-आतंकवादी दर्जनों हिंदुओं को मौत के घाट उतार रहे थे और उनकी महिलाओं का बलात्कार कर रहे थे- परिणामस्वरूप, पांच लाख पंडित घाटी से पलायन करने के लिए विवश हो गए? या क्या यह पिछले डेढ़-दो दशकों का प्रतिबिंब है, जिसमें कश्मीर स्थित मस्जिदों से भारत और हिंदुओं की मौत की दुआ मांगी गई, मजहबी नारे लगे, आतंकियों की ढाल बनकर स्थानीय लोगों द्वारा सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाए, सिनेमाघरों पर ताले लग गए और घाटी में 'निजाम-ए-मुस्तफा' (शरीयत कानून) का वर्चस्व हो गया?
सच तो यह है कि लोकतंत्र-सेक्यूलरवाद के नाम पर ये सभी छह दल यहां उसी इस्लामी परचम को फिर से लहराता देखना चाहते हैं, जिसकी नींव 1931 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की जिहादी भट्टी में तपकर कश्मीर लौटे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने रखी थी। उस समय के जम्मू-कश्मीर की समरसता का उल्लेख तत्कालीन महाराजा हरिसिंह के पुत्र, वरिष्ठ कांग्रेसी और पूर्व सदर-ए-रियासत डॉ. कर्ण सिंह ने आत्मकथा में किया है। वह लिखते हैं कि 9 मार्च, 1931 को जब फ्रांस में उनका जन्म हुआ, तब श्रीनगर में युवराज के पैदा होने पर प्रजा (हिंदू-सिख और मुस्लिम- सबने) ने अपने घरों और शिकारों को रंग-बिरंगी दीपमाला से सजाया था। स्पष्ट था कि प्रदेश का तत्कालीन वातावरण उत्सवमयी और सौहार्दपूर्ण था।
अलीगढ़ से शेख के घाटी लौटते ही कश्मीर का माहौल विषाक्त होना प्रारंभ हो गया। महाराजा हरिसिंह को मुस्लिम विरोधी बताकर, हाथों में कुरान लेकर शेख और उनके साथियों ने मस्जिदों से 'काफिरों' के खिलाफ विषवमन करना शुरू कर दिया। सच तो यह है कि महाराजा एक सामान्य हिंदू की भांति 'सेक्यूलर' थे। उनकी सेना में हिंदू-सिख के अतिरिक्त मुस्लिम भी बड़ी संख्या में थे। विडंबना है कि महाराजा को मुस्लिम विरोधी बताने वाले स्वयं शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा आतिश-ए-चिनार में स्वीकार किया है, 'महाराजा सदैव मजहबी विद्वेष से ऊपर थे।'
अक्तूबर, 1947 आते-आते कश्मीर की फिजा इतनी जहरीली हो गई कि जब पाकिस्तान ने मजहबी नारों के साथ जम्मू-कश्मीर रियासत पर हमला किया, तब महाराजा का मुस्लिम सैन्यबल हथियारों के साथ एकाएक शत्रुओं के साथ हो गया। उस समय रात में सो रहे रियासती सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल नारायण सिंह को उनके मुस्लिम सैनिकों ने मजहबी उन्माद में अन्य हिंदू सैनिकों के साथ निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया और पाकिस्तानी इस्लामी आक्रांताओं से जा मिले। इस पृष्ठभूमि में पाठक कई वर्षों तक टीवी पर कश्मीरी युवाओं को हाथों में पाकिस्तान का झंडा लिए, उसके समर्थन में मजहबी नारे लगाते हुए और भारतीय सुरक्षा बलों पर जानलेवा पथराव करते हुए देख चुके हैं। क्या ये तस्वीरें और ले. कर्नल नारायण की हत्या- एक ही चिंतन की उपज नहीं? क्या ये सब कश्मीरी 'नेता' घाटी में उसी जहरीले दर्शन को वर्षों से पुष्ट नहीं कर रहे हैं?
अक्सर, अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए के समर्थक इसे जम्मू-कश्मीर के विलय से जोड़ते हैं। क्या इससे बड़ा कोई झूठ हो सकता है? जिस 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने हस्ताक्षर किया था, उसके प्रारूप का एक-एक शब्द वही था, जिस पर अन्य 560 से अधिक रियासतों ने भारत विलय के समय हस्ताक्षर किए थे। तब महाराजा हरिसिंह ने किसी विशेषाधिकार की मांग नहीं की थी। किंतु तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन की कुटिलता, शेख अब्दुल्ला के जिहादी एजेंडे और पं. नेहरू की अदूरदर्शिता ने दो वर्ष पश्चात 17 अक्तूबर, 1949 को अनुच्छेद 370, तो इसके लगभग चार साल बाद 14 मई, 1954 को अनुच्छेद 35-ए को संविधान में अस्थायी रूप से जोड़ दिया। स्पष्ट है कि इन दोनों अनुच्छेदों का विलय से कोई संबंध नहीं था। यह केवल प्रदेश के इस्लामी चरित्र को बरकरार रखने का प्रपंच था।
अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए के सक्रिय रहते जम्मू-कश्मीर की स्थिति क्या थी? दलित अधिकार (आरक्षण व्यवस्था सहित) विहीन थे। वे केवल मैला-ढोने तक सीमित थे। महिलाओं के सीमित अधिकार शरीयत द्वारा संचालित थे। भारतीय संविधान और दंड-संहिता निष्क्रिय होने से तिरंगे का अपमान- 'अभिव्यक्ति' का प्रतीक था। चंद परिवारों ने भारी-भरकम केंद्रीय अनुदान को अपनी बपौती समझा। दशकों तक केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के हर नागरिक पर जहां 91,300 रुपये वार्षिक खर्च किया, वहीं आबादी के संदर्भ में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में यह मात्र 4,300 रुपये है। फिर भी कश्मीर संकट से घिरा है! इस पृष्ठभूमि में इन छह दलों द्वारा जम्मू-कश्मीर में पुरानी व्यवस्था को बहाल करने की मांग क्या लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्षी और बहुलतावादी भारत के हित में है?- इसका उत्तर स्पष्ट है।