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लिम्पिया, कालापानी और लिपुलेख का इतिहास
Sun, 14 Jun 2020 02:37 AM IST
शेखर पाठक
शेखर पाठक
शेखर पाठक
Published by: शेखर पाठक
Updated Sun, 14 Jun 2020 02:37 AM IST
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India-Nepal
भारत-नेपाल सीमा विवाद अपनी पराकाष्ठा पर है। नेपाल में उस नक्शे को स्वीकृति मिल गई है, जिसमें उस क्षेत्र को अपना दिखाया है, जो सिगौली संधि के समय से ही भारत के पास है। नेपाल के अनुसार भारत ने इसे कब्जाया हुआ है। दुर्भाग्य से मीडिया और राजनय दोनों में गहराई में जाने का विवेक कम हो गया है। राष्ट्रवाद मुद्दों को ठीक से देखने नहीं देता।
सीमा विवाद का वर्तमान संदर्भ नेपाल युद्ध के बाद 1816 में संपन्न हुई सिगौली की संधि है, जिसकी धारा पांच के अनुसार काली नदी से पश्चिम में नेपाल का अधिकार जाता रहा। काली भारत और नेपाल की सीमा बनी। कंपनी ने इसकी व्याख्या पहले टनकपुर से कालापानी तक, फिर कालापानी से आगे नदी नहीं पहाड़ के साथ सीमा तय कर की।
संधि के समय इस क्षेत्र का कोई नक्शा न था। काली इससे पहले नेपाली राज्यों और कुमाऊं के बीच सीमा नहीं थी। कुछेक बार कुमाऊं के चंद राजाओें ने काली पार शासन किया और कभी बम और मल्ल राजाओं ने इस पार।
1560 में बालोकल्याण चंद ने तिब्बती सीमा को सुरक्षित किया। 1670 में बाजबहादुर चंद ने पश्चिमी तिब्बत में ताकलाखर जीत कर व्यापार को सुगम बनाया। फिर भी ब्यांस क्षेत्र कुछ समय तिब्बती और जुमली शासन के अन्तर्गत रहा। 1790 में गोरखों के कुमाऊं आगमन के बाद ब्यांस को जुमला राज से मुक्ति मिली।
1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी के कुमाऊं आने से पहले और उसके बाद विभिन्न दर्रों से शौका व्यापारी हर साल तिब्बत की मंडियों में और तीर्थयात्री कैलास-मानसरोवर जाते थे। बीसवीं सदी में यात्रा अधिक व्यवस्थित हुई।
सबसे सरल और सुरक्षित लिपुलेख मार्ग से सैकड़ों सालों में हजारों व्यापारी और तीर्थयात्री ही नहीं, बाजबहादुर चंद, बस्तीराम (जोरावरसिंह का सहायक), हेनरी तथा रिचर्ड स्ट्रेची, चार्ल्स शेर्रिंग, प्रणवानंद, हैम और गैन्सर आदि भी तिब्बत गए।
भागीरथी और अलकनंदा घाटियों में विदेशी यात्रियों और सर्वेयरों का आगमन सत्रहवीं सदी में शुरू हुआ। 1624 में जैसुइट मिशनरी माणा दर्रे से छपरांग गए, तो 1808 में सर्वे दल भागीरथी-अलकनंदा स्रोतों तक जाकर कुमाऊं से लौटा। 1812 में मूरक्राफ्ट नीती दर्रे से राकसताल-मानसरोवर तक गया। पर काली या सरयू की घाटियों में ऐसे अभियान नहीं आए। इनकी जानकारी सिर्फ स्थानीय स्मृति में थी।
वैब ने 1816-18 में कुमाऊं का व्यापक भ्रमण किया। 1819 के कुमाऊं के पहले नक्शे में काली घाटी के अन्तरवर्ती क्षेत्र का विवरण था। इसमें कालापानी तथा ब्यांस ऋषि शिखर के नाम थे पर लिपुलेख और अन्य दर्रों के नहीं।
1829 के संशोधित नक्शे में बिना नाम लिपुलेख चीनी टार्टरी को खुल रहे दर्रे के रूप में अंकित था। कुटी नदी को काली नाम दिया था। 1846 के नक्शे में पहली बार दर्रे तक काली के साथ कुमाऊं की सीमा को दर्शाया गया।
1850 के नक्शे में सीमा ज्यादा स्पष्ट स्ट्रेची भाइयों की 1846 तथा 1849 की यात्राओं से संभव हुई थी। इस नक्शे में लिपुलेख नाम पहली बार आया। साथ ही अन्य दर्रों का भी। पर लिम्पियाधुरा नहीं दर्शाया गया था। नक्शे में पहली बार कैलास-गुरला शिखर तथा मानस-राकस ताल दिखाए गए।
1879 के नक्शे में सीमा में बदलाव हुआ। अब कालापानी से लिपुलेख के पूर्व -दक्षिण की धार का टिंकर नदी के जल विभाजक तक का हिस्सा भारतीय क्षेत्र में था। इस तरह कालापानी से नीचे ही काली नदी सीमा रेखा रही, इससे ऊपर नहीं। तब से यही सीमा चली आ रही है। 1857 में नेपाली शासक ने कंपनी को मदद दी, जिसके एवज में अवध सीमा से लगे क्षेत्र को नेपाल को लौटाया गया। ब्यांस बाबत भी तब कोई सहमति हुई हो सकती है। 1931 के नक्शे में 1879 की स्थिति ही है।
1903 की यात्रा में चार्ल्स शेर्रिंग ने पाया कि भारत, तिब्बत और नेपाल की सीमाओं के त्रिकोण पर स्थित लिपुलेख सरल दर्रा है, जो सर्वाधिक समय तक खुला रहता है। प्रणवानंद ने बताया कि कालापानी काली नदी का पारंपरिक स्रोत है, जबकि नदी की मुख्य धारा लिपुलेख से आती है। 1936 में भूविज्ञानी हैम ने पाया था कि काली कालापानी तक नेपाल से सीमा बनाती है और यहां से सीमा दक्षिण-पूर्व को चली जाती है।
नेपाल के सर्वेयर बुद्धिनारायण श्रेष्ठ ने कुछ नक्शों में कुटी को काली लिखा पाया है। यह सही है कि लिपुलेख से गुंजी तक काली 17.76 किमी. तथा लिम्पियाधुरा से गुंजी तक कुटी 47.84 किलोमीटर लंबी है। पर स्रोत का आधार नदी के आकार (जलागम और लंबाई) से नहीं जुड़ा था।
नदी की महत्ता को उससे जुड़े मिथकों से निर्णित किया गया था। फिलहाल औपनिवेशिक काल में जो सीमा बनी वही आजादी के बाद रही। अब सीमा को लेकर चतुराई नहीं समझदारी की दरकार है।
सीमा विवाद संबंधी भारत-नेपाल संयुक्त समिति को अधिक गंभीरता से और जल्दी इसका निदान ढूढना चाहिये। भारत चीन को तो आंख दिखा नहीं पाता पर नेपाल से आंख मिलानी चाहिए। दूसरी ओर दिल्ली और काठमांडू को दो देशों के इस सीमांत, जो तीसरे कठिन देश से भी जुड़ा है, के समाजों में किसी भी गलतफहमी को जन्म देने से बचना चाहिए। (लेखक, हिमालय के अध्येता और पहाड़ के संपादक हैं।)
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सीमा विवाद का वर्तमान संदर्भ नेपाल युद्ध के बाद 1816 में संपन्न हुई सिगौली की संधि है, जिसकी धारा पांच के अनुसार काली नदी से पश्चिम में नेपाल का अधिकार जाता रहा। काली भारत और नेपाल की सीमा बनी। कंपनी ने इसकी व्याख्या पहले टनकपुर से कालापानी तक, फिर कालापानी से आगे नदी नहीं पहाड़ के साथ सीमा तय कर की।
संधि के समय इस क्षेत्र का कोई नक्शा न था। काली इससे पहले नेपाली राज्यों और कुमाऊं के बीच सीमा नहीं थी। कुछेक बार कुमाऊं के चंद राजाओें ने काली पार शासन किया और कभी बम और मल्ल राजाओं ने इस पार।
1560 में बालोकल्याण चंद ने तिब्बती सीमा को सुरक्षित किया। 1670 में बाजबहादुर चंद ने पश्चिमी तिब्बत में ताकलाखर जीत कर व्यापार को सुगम बनाया। फिर भी ब्यांस क्षेत्र कुछ समय तिब्बती और जुमली शासन के अन्तर्गत रहा। 1790 में गोरखों के कुमाऊं आगमन के बाद ब्यांस को जुमला राज से मुक्ति मिली।
1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी के कुमाऊं आने से पहले और उसके बाद विभिन्न दर्रों से शौका व्यापारी हर साल तिब्बत की मंडियों में और तीर्थयात्री कैलास-मानसरोवर जाते थे। बीसवीं सदी में यात्रा अधिक व्यवस्थित हुई।
सबसे सरल और सुरक्षित लिपुलेख मार्ग से सैकड़ों सालों में हजारों व्यापारी और तीर्थयात्री ही नहीं, बाजबहादुर चंद, बस्तीराम (जोरावरसिंह का सहायक), हेनरी तथा रिचर्ड स्ट्रेची, चार्ल्स शेर्रिंग, प्रणवानंद, हैम और गैन्सर आदि भी तिब्बत गए।
भागीरथी और अलकनंदा घाटियों में विदेशी यात्रियों और सर्वेयरों का आगमन सत्रहवीं सदी में शुरू हुआ। 1624 में जैसुइट मिशनरी माणा दर्रे से छपरांग गए, तो 1808 में सर्वे दल भागीरथी-अलकनंदा स्रोतों तक जाकर कुमाऊं से लौटा। 1812 में मूरक्राफ्ट नीती दर्रे से राकसताल-मानसरोवर तक गया। पर काली या सरयू की घाटियों में ऐसे अभियान नहीं आए। इनकी जानकारी सिर्फ स्थानीय स्मृति में थी।
वैब ने 1816-18 में कुमाऊं का व्यापक भ्रमण किया। 1819 के कुमाऊं के पहले नक्शे में काली घाटी के अन्तरवर्ती क्षेत्र का विवरण था। इसमें कालापानी तथा ब्यांस ऋषि शिखर के नाम थे पर लिपुलेख और अन्य दर्रों के नहीं।
1829 के संशोधित नक्शे में बिना नाम लिपुलेख चीनी टार्टरी को खुल रहे दर्रे के रूप में अंकित था। कुटी नदी को काली नाम दिया था। 1846 के नक्शे में पहली बार दर्रे तक काली के साथ कुमाऊं की सीमा को दर्शाया गया।
1850 के नक्शे में सीमा ज्यादा स्पष्ट स्ट्रेची भाइयों की 1846 तथा 1849 की यात्राओं से संभव हुई थी। इस नक्शे में लिपुलेख नाम पहली बार आया। साथ ही अन्य दर्रों का भी। पर लिम्पियाधुरा नहीं दर्शाया गया था। नक्शे में पहली बार कैलास-गुरला शिखर तथा मानस-राकस ताल दिखाए गए।
1879 के नक्शे में सीमा में बदलाव हुआ। अब कालापानी से लिपुलेख के पूर्व -दक्षिण की धार का टिंकर नदी के जल विभाजक तक का हिस्सा भारतीय क्षेत्र में था। इस तरह कालापानी से नीचे ही काली नदी सीमा रेखा रही, इससे ऊपर नहीं। तब से यही सीमा चली आ रही है। 1857 में नेपाली शासक ने कंपनी को मदद दी, जिसके एवज में अवध सीमा से लगे क्षेत्र को नेपाल को लौटाया गया। ब्यांस बाबत भी तब कोई सहमति हुई हो सकती है। 1931 के नक्शे में 1879 की स्थिति ही है।
1903 की यात्रा में चार्ल्स शेर्रिंग ने पाया कि भारत, तिब्बत और नेपाल की सीमाओं के त्रिकोण पर स्थित लिपुलेख सरल दर्रा है, जो सर्वाधिक समय तक खुला रहता है। प्रणवानंद ने बताया कि कालापानी काली नदी का पारंपरिक स्रोत है, जबकि नदी की मुख्य धारा लिपुलेख से आती है। 1936 में भूविज्ञानी हैम ने पाया था कि काली कालापानी तक नेपाल से सीमा बनाती है और यहां से सीमा दक्षिण-पूर्व को चली जाती है।
नेपाल के सर्वेयर बुद्धिनारायण श्रेष्ठ ने कुछ नक्शों में कुटी को काली लिखा पाया है। यह सही है कि लिपुलेख से गुंजी तक काली 17.76 किमी. तथा लिम्पियाधुरा से गुंजी तक कुटी 47.84 किलोमीटर लंबी है। पर स्रोत का आधार नदी के आकार (जलागम और लंबाई) से नहीं जुड़ा था।
नदी की महत्ता को उससे जुड़े मिथकों से निर्णित किया गया था। फिलहाल औपनिवेशिक काल में जो सीमा बनी वही आजादी के बाद रही। अब सीमा को लेकर चतुराई नहीं समझदारी की दरकार है।
सीमा विवाद संबंधी भारत-नेपाल संयुक्त समिति को अधिक गंभीरता से और जल्दी इसका निदान ढूढना चाहिये। भारत चीन को तो आंख दिखा नहीं पाता पर नेपाल से आंख मिलानी चाहिए। दूसरी ओर दिल्ली और काठमांडू को दो देशों के इस सीमांत, जो तीसरे कठिन देश से भी जुड़ा है, के समाजों में किसी भी गलतफहमी को जन्म देने से बचना चाहिए। (लेखक, हिमालय के अध्येता और पहाड़ के संपादक हैं।)