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प्रबंधन संस्थानों में हिंदी: अब उच्च शिक्षा का माध्यम बनाई जा रहीं भारतीय भाषाएं, आईआईएम इंदौर से होगी शुरुआत

Tue, 28 Nov 2023 07:25 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Tue, 28 Nov 2023 07:25 AM IST
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सार
26 नवंबर, 1949 को जब संविधान सभा ने संविधान को स्वीकृत किया, उस मौके पर संविधान सभा को आखिरी बार बतौर संविधान सभा अध्यक्ष संबोधित करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जो दो अफसोस जताए थे, उनमें से एक यही था कि वह चाहकर भी हिंदी में संविधान नहीं बना सके। 
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Hindi in management institutes Now Indian languages are being made the medium of higher education read opinion
IIM - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

करीब ढाई दशक पहले जब भारत में कंप्यूटर का विस्तार हो रहा था और इसके बाद जब तकनीक ने कंप्यूटर पर भारतीय भाषाओं में काम करना सुलभ बनाया, तब भी यह सोचना बेमानी था कि किसी दिन कंप्यूटर का भारतीय भाषाओं पर भी प्रभुत्व हो सकेगा। लेकिन अब यह भी हकीकत हो चुका है। जिस तरह तकनीक ने भारतीय भाषाओं को न सिर्फ कंप्यूटर के लिए सहज बनाया, कुछ उसी तरह अब भारतीय भाषाओं को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाया जाने लगा है।



उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रबंधन संस्थान, इंदौर ने तय किया है कि अगले साल जनवरी में दस दिनों का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होगा, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ कार्यशाला में शामिल लोगों को हिंदी में प्रशिक्षित करेंगे। आईआईएम, इंदौर पहले ही हिंदी माध्यम से प्रबंधन की पढ़ाई शुरू करने की घोषणा कर ही चुका है। आईआईएम के रूप में मशहूर प्रबंधन संस्थानों के बारे में अब तक यही धारणा रही है कि यहां अंग्रेजी माध्यम के जरिये पहुंचा जा सकता है। पर वहां यदि सोच के स्तर पर भारतीय भाषाओं और हिंदी को लेकर बदलाव हो रहा है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।


26 नवंबर, 1949 को जब संविधान सभा ने संविधान को स्वीकृत किया, उस मौके पर संविधान सभा को आखिरी बार बतौर संविधान सभा अध्यक्ष संबोधित करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जो दो अफसोस जताए थे, उनमें से एक यही था कि वह चाहकर भी हिंदी में संविधान नहीं बना सके। इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत में अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार 1860 में तेजी से शुरू हुआ और इसके बाद वह बढ़ता ही गया। बावजूद इसके कि कांग्रेस की अगुआई में चले स्वाधीनता
आंदोलन में भारतीय भाषा और हिंदी पर जोर रहा। फिर भी अंग्रेजी इतनी तेजी से स्वीकार्य बनती गई कि सौ साल से भी कम अवधि में वह इतनी महत्वपूर्ण बन गई कि देश की उच्च पेशेवर जिंदगी और पढ़ाई के लिए अनिवार्य मान ली गई। उसी का नतीजा रहा कि स्वाधीन भारत में अंग्रेजी गुलाम भारत की तुलना में कहीं ज्यादा फलती-फूलती रही।

यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन काल में हिंदी और भारतीय भाषाओं को लेकर धारणा बदली है। पर यह भी उतना ही कटु सत्य है कि नौकरशाही और नीति निर्माण में अब भी अंग्रेजी का वर्चस्व है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर भाषा की अपनी संस्कृति होती है और उस पर निर्भर करने वाले लोगों की सोच पर उस भाषा के साथ जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों का असर ज्यादा होता है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ी भारतीय नौकरशाही के बड़े वर्ग की सोच पर अंग्रेजी के साथ चली आ रही शासक और श्रेष्ठता बोध की मानसिकता अब भी हावी है। 

इसलिए जमीनी स्तर पर जैसे बदलाव दिखने चाहिए, नहीं दिख पाते। ऐसे माहौल में तकनीकी और उच्च शिक्षा की पढ़ाई के लिए भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाने के बारे में सोचना भी साहस का काम है। हालांकि, नौकरशाहों की तुलना में प्रबंधक भारतीय भाषा-भाषियों के प्रति कहीं ज्यादा सचेत हैं। उन्हें पता है कि देश का जो विशाल मध्य वर्ग है, वह अपना दैनिक कामकाज अपनी भाषाओं में ही करता है। इसलिए उन तक अपने उत्पाद की पहुंच बनाने के लिए प्रबंधन पेशेवरों ने भारतीय भाषाओं को ही जरिया बनाया है। 

इसके ही चलते देश का विशाल मध्य वर्ग दुनिया भर के उत्पादों का बड़ा बाजार बन गया है। प्रबंधन अपने प्रोफेशन की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से भले ही करता है, लेकिन उसे अपनी विशेषज्ञता को जमीनी हकीकत जिन कर्मचारियों या फील्ड कार्यकर्ताओं के जरिये बनाना पड़ता है, उनकी प्राथमिक जुबान भारतीय भाषाएं होती हैं। प्रबंधन के सूत्र कार्यकर्ताओं तक पहुंचते वक्त भाषायी नुकसान का शिकार होते रहे हैं। भारतीय भाषाओं में प्रबंधन की पढ़ाई के बाद जो पेशेवर तैयार होंगे, उनकी अभिव्यक्ति कार्यकर्ता के स्तर की होगी, तभी वे बेहतर नतीजे दे सकेंगे। 

इससे यह धारणा भी खंडित होने लगेगी कि भारतीय भाषाओं के जरिये भी प्रबंधन के गुर सीखे जा सकते हैं। इसे संयोग कहें या कुछ और कि मेडिकल की हिंदी माध्यम से पढ़ाई मध्य प्रदेश की धरती से शुरू हुई, अब नेतृत्व विकास से संबंधित प्रबंधन की पढ़ाई भी मध्य प्रदेश की धरती से ही आरंभ होने जा रही है। इससे एक बात तय है कि भारतीय भाषाओं को लेकर जो हिचक हमारे मानस में चिरस्थायी ढंग से स्थापित है, वह दरकेगी।

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