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भाषिक विविधता को प्रोत्साहन देना होगा, क्यों और कैसे बता रहे हैं भाषाविद गणेश एन डेवी

Mon, 14 Sep 2020 12:59 AM IST
Ganesh N Devy गणेश एन डेवी
Updated Mon, 14 Sep 2020 12:59 AM IST
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Hindi Diwas 2020 : Linguistic diversity has to be encouraged
हिंदी दिवस

भाषिक समृद्धि के लिहाज से भारत एक विशिष्ट देश है। देश की सभी भाषाओं के दस्तावेजीकरण के लिए वर्ष 2010 में पीपल'स लिंग्युस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया नाम से मेरे नेतृत्व में एक सर्वेक्षण हुआ था, जिसमें देश की कुल 780 भाषाओं के बारे में पता चला था। स्वतंत्र भारत में देश की तमाम जीवित भाषाओं की शिनाख्त करने के उद्देश्य से किया गया वह पहला सर्वेक्षण था।


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सर्वे में अनेक ऐसी भाषाओं के बारे में पता चला, जिन्हें 10,000 से भी कम लोग बोलते थे और इस कारण जिन्हें स्वाभाविक ही सरकारी जनगणना सर्वेक्षणों में मान्यता नहीं दी गई थी। हमने इन 780 भाषाओं में से करीब 400 भाषाओं के व्याकरण और शब्दकोश भी देखे।

इनमें से करीब 100 भाषाओं के बारे में पहले भी अध्ययन हो चुका था। लेकिन शेष 300 भाषाओं के बारे में उन्हें बोलने वाले समुदायों से बाहर कभी कोई अध्ययन नहीं हुआ, न ही उनका दस्तावेजीकरण हुआ।  लेकिन याद रखना चाहिए कि हमने भाषाओं की खोज नहीं की, क्योंकि वे तो पहले  से ही अस्तित्व में थीं।

उस सर्वे के दौरान अरुणाचल प्रदेश में 90 भाषाओं का पता चला, तो असम में 55 भाषाएं पाई गईं। इससे लोगों को आश्चर्य हुआ। पर यह आश्चर्यजनक नहीं था। भाषाएं पांच वजहों से प्रभावित होती हैं-कार्यस्थल, भूगोल, राजनीतिक शक्ति तथा इतिहास, बाहरी प्रभाव तथा समुदायों के सामाजिक संगठन।

अगर किसी समुदाय में सगोत्र विवाह के सख्त नियम लागू हैं, तो उसकी भाषा का प्रसार नहीं होगा। अरुणाचल प्रदेश में उथल-पुथल भरी राजनीतिक शक्तियों का बहुत पुराना इतिहास है। साथ ही, वहां का भूगोल और वहां की राजनीति भी स्थानीय समुदायों को दमित और अलग-थलग करती रही है।

वहां की सामाजिक संरचना ऐसी है, जिसमें किसी एक भाषा के प्रसार की बहुत गुंजाइश नहीं है। नतीजतन वहां अनेक भाषाएं जन्मीं। नगालैंड में भी ऐसी ही स्थिति है, जहां के समुदाय अपनी मातृभाषा नगामीज में बात करने को तैयार नहीं हैं, ऐसे में, यह सिर्फ समारोहों तक केंद्रित भाषा ही रह गई है। नगामीज पूरे नगालैंड की भाषा है, लेकिन कोई इसे अपनी मातृभाषा मानने के लिए तैयार नहीं है।

भाषाओं के लुप्त हो जाने की बात बार-बार कही जाती है। मैं इससे पूरी तरह सहमत नहीं हूं। मैं यह भी नहीं मानता कि कोई भाषा सिर्फ इसलिए लुप्त हो जाती है, क्योंकि उसके बोलने वाले कम हैं। संस्कृत बोलने वाले तो बहुत ही कम हैं। लेकिन उसके लुप्त हो जाने का खतरा नहीं है। ऐसे ही लैटिन बहुत शक्तिशाली भाषा थी। लेकिन देसी भाषाओं के उत्थान के कारण वह लुप्त हो गई।

हमें इस बात का गर्व होना चाहिए कि भारत में शक्तिशाली भाषाओं से सामना करने की विलक्षण शक्ति है। इसने संस्कृत का सामना किया, फारसी का सामना किया, और बिना अपनी भाषिक विविधता खोए अंग्रेजी का भी हम उसी तरह मुकाबला कर रहे हैं।

अगर हमारी सरकार 10,000 से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को मान्यता न देने संबंधी अपने कानून में बदलाव करे, तो हमारी भाषिक विविधता को और बल मिल सकता है। दरअसल वर्ष 1971 में भाषा के मुद्दे पर बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने के बाद हमारे यहां 1972 में यह निर्णय लिया गया।

इसके पीछे यह सोच थी कि ज्यादा से ज्यादा भाषाओं को मान्यता देने से भारत की अखंडता पर फर्क पड़ सकता है। सरकार की यह नीति ही मुझे भाषाओं के बारे में जानने की ओर ले गई। भाषाओं के बारे में सरकार का रवैया कितना चलताऊ रहा है, इसका पता इससे चलता है कि 1961 की जनगणना में 1,652 भाषाओं की सूची दी गई थी, जबकि 1971 की जनगणना में भाषाएं सिमटकर मात्र 182 रह गईं!

वर्ष 2010 में मैंने अपने संगठन भाषा की ओर से एक आयोजन किया था, जिसमें 320 भाषाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। भाषा के निर्धारण के बारे में मैंने इस धारणा को नहीं स्वीकारा कि उसकी लिपि होनी चाहिए, नहीं तो वह बोली है। दुनिया में अधिकांश भाषाओं की अपनी लिपि नहीं है, दरअसल लगभग 6,000 भाषाओं में से 300 भाषाओं की ही लिपि है।

अंग्रेजी की अपनी कोई लिपि ही नहीं है, उसने रोमन लिपि ली है। हां, एक भाषा का अपना व्याकरण होना चाहिए और उस भाषा के 70 प्रतिशत शब्द ऐसे होने चाहिए, जो एक नई भाषा का बोध कराते हों। आज तो भाषाओं के संरक्षण का काम और भी गंभीरता से होना चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता का बोध नहीं कराती, बल्कि आर्थिक पूंजी के रूप में भी हमारे सामने है।

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