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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Hindi Diwas 2020 : Doors Opening In The South For Hindi, How Many Steps Have We Gone

हिंदी के लिए दक्षिण में खुलते दरवाजे, आखिर कितने कदम चले हम

Mon, 14 Sep 2020 12:55 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 14 Sep 2020 12:55 AM IST
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Hindi Diwas 2020 : Doors Opening In The South For Hindi, How Many Steps Have We Gone
हिंदी दिवस - फोटो : अमर उजाला

स्वाधीनता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस ने आज से ठीक 102 साल पहले हिंदी को आधिकारिक तौर पर भावी स्वाधीन भारत की राजभाषा के तौर पर स्वीकार किया था। इतने सालों में हिंदी को पूरे देश में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए था। पर तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने इसके ठीक 19 साल बाद ही जो विरोध करना शुरू किया, वह तकरीबन अब तक जारी है।


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हिंदी के खिलाफ जब भी आंदोलन हुए, उनके पीछे आम लोगों की सोच और चिंताओं के बजाय स्थानीय राजनीति हावी रही। तमिलनाडु के द्रविड़ नेता सीएन अन्नादुरै के राजनीतिक उत्तराधिकारी एम करुणानिधि की कवयित्री बेटी और राज्यसभा सांसद कनिमोझी ने दो-दो बार हिंदी के विरोध में भावनाएं उकसाने की कोशिश की।

लेकिन दोनों ही बार उन्हें जनसमर्थन नहीं मिल पाया। तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि कनिमोझी ने इस मसले को इन्हीं संदर्भों में तूल देने की कोशिश की। दिलचस्प यह है कि द्रमुक की हर बात का विरोध करने वाली अन्नाद्रमुक ने कनिमोझी के इन आरोपों के विरोध में अपनी जुबान नहीं खोली।

तमिलनाडु की हिंदी विरोधी राजनीति 1937 से ही जारी है। उसी साल स्वशासन की अवधारणा के तहत प्रांतीय एसेंबलियों के चुनाव हुए थे। उन चुनावों में तत्कालीन मद्रास और अब के तमिलनाडु प्रांत में कांग्रेस को जीत मिली थी, जिसके बाद सी राजगोपालाचारी प्रीमियर बने थे।

राजगोपालाचारी ने हिंदी को मद्रास प्रांत में पढ़ाना अनिवार्य कर दिया था। सीएन अन्ना दुरै तभी से हिंदी के विरोधी हो गए। संविधान लागू होने के बाद सांविधानिक प्रावधानों के तहत 26 जनवरी, 1965 को राजभाषा के तौर पर हिंदी की भूमिका पूरे देश में एक साथ लागू होनी थी, पर इसका विरोध 1955 में ही शुरू हो गया।

इसी विरोध को देखते हुए संसद ने 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित कर दिया, जिसमें कहा गया, 'केंद्र सरकार द्वारा राज्यों से पत्राचार में अंग्रेजी के प्रयोग को उसी स्थिति में समाप्त किया जाएगा, जब सभी अहिंदी भाषी राज्यों के विधान मंडल इसकी समाप्ति के लिए संकल्प पारित कर दें और उन संकल्पों पर विचार के बाद संसद के दोनों सदन उसी प्रकार के संकल्प पारित करें।'

इसके बावजूद तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति को डर था कि 26 जनवरी, 1965 को हिंदी राजभाषा बन जाएगी और उसकी परिधि में तमिलनाडु भी आएगा। इसके विरोध में सीएन अन्नादुरै के नेतृत्व में 25 जनवरी, 1965 को तमिलनाडु में लोगों ने काला झंडा लगाया।

नई शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषाओं को बनाने का जो संकल्प किया गया, इसे लेकर भी तमिलनाडु में डर का माहौल बना रहा, इसलिए इसका विरोध भी हुआ। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि मातृभाषाओं का मतलब स्थानीय भाषाएं है।

बहरहाल कनिमोझी का उकसाऊ बयान हो या फिर प्राथमिक शिक्षा में हिंदी को लागू किए जाने का कथित डर, इसे साठ के दशक जैसा जनसमर्थन नहीं मिलने की एक बड़ी वजह है, उदारीकरण के बाद विकसित बाजारवादी व्यवस्था।

उदारीकरण से पहले हिंदी के विस्तार में हिंदी सिनेमा ने बड़ी भूमिका निभाई। बाद के दौर में हिंदी के खबरिया चैनलों ने हिंदी के प्रसार को बढ़ाया। अब बाजार खुद-ब-खुद हिंदी के प्रसार में परोक्ष ढंग से भूमिका निभा रहा है।

कुछ साल पहले एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन की बरसी पर लोगों की राय जानने की कोशिश की थी। उससे जाहिर हुआ कि जिन लोगों ने हिंदी विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया, उन्होंने हिंदी नहीं पढ़ी, उन्हें लगता है कि अगर वे हिंदी सीख गए होते, तो उनके सामने व्यापक संभावनाएं होतीं।

इसीलिए अब तमिलनाडु में हिंदी सिखाने वाले कोचिंग संस्थान भी खुल गए हैं और लोग अपने बच्चों को हिंदी सिखाने के लिए भेजते हैं। हालांकि तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिंदी के बहुत अच्छे दिन नहीं आए हैं। हां, यह जरूर हुआ है कि हिंदी को लेकर तमिलनाडु के लोगों का रवैया अब पहले जैसा नहीं रहा है। उसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।

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