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नेट में अंग्रेजी को पछाड़ती हिंदी
उमेश चतुर्वेदी
Updated Thu, 08 Feb 2018 07:04 PM IST
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उमेश चतुर्वेदी
अंग्रेजी के वर्चस्व वाले माहौल के बीच अगर यह खबर आए कि इंटरनेट की दुनिया में हिंदी ने भारतीय उपभोक्ताओं के बीच अंग्रेजी को पछाड़ दिया है, तो सुखद आश्चर्य होना स्वाभाविक है। यूथ4वर्क की सर्वेक्षण रिपोर्ट ने इस उम्मीद को सही साबित किया है कि जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार छोटे शहरों की ओर बढ़ेगा, हिंदी और भारतीय भाषाओं की दुनिया का विस्तार होता जाएगा। हमारी विडंबना यह है कि यहां का पढ़ा-लिखा वर्ग, कॉरपोरेट और नीति निर्माता मेट्रो शहरों के आधार पर नीति और अवधारणा बनाता है। जबकि 130 करोड़ की आबादी वाले अपने देश में महानगरीय जनसंख्या करीब 25 करोड़ ही है। सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी मेट्रो शहरों की परिधि से बाहर रहती है।
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यूथ4वर्क ने इंटरनेट यूजरों को लेकर जो हालिया सर्वे किया है, उसमें उसने गैर मेट्रो महानगरों को भी जोड़ा था। इस लिहाज से आज जितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी संख्या करीब 51 प्रतिशत हो गई है। जबकि इंटरनेट के लिए सहयोगी रुख रखने वाली भाषा अंग्रेजी का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 40 प्रतिशत पर खिसक गई है। मराठी, कन्नड़, तेलुगू, तमिल, मलयालम और बांग्ला जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल करने वालों की संख्या भी अपने प्रभाव क्षेत्र में बढ़ गई है।
यह हिंदी के बढ़ते वर्चस्व का ही उदाहरण है कि गैर हिंदी भाषी इलाकों में भी छह से 17 प्रतिशत लोग हिंदी का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिन इलाकों में हिंदी नहीं बोली जाती, वहां के लोग अपनी भाषाओं में सबसे ज्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। यानी अंग्रेजी वहां भी पीछे है। इस लिहाज से महाराष्ट्र में मराठी और कर्नाटक में कन्नड़ का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 45 फीसदी से ज्यादा है। इस सूची में बांग्ला 34 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ चौथे नंबर पर है।
इस सर्वे ने भारतीय भाषाओं की इंटरनेट पर पर्याप्त उपलब्धता की कमी की ओर भी इशारा किया है। 43 प्रतिशत ग्रामीण और 13.5 प्रतिशत शहरी अपनी भाषाओं में सामग्री न होने के चलते इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर पाते। गूगल को पता था कि भविष्य में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं का इंटरनेट व्यवहार बढ़ेगा। इसी कारण उसने अगस्त 2015 में, यानी भारत में इंटरनेट सेवा शुरू होने की 20 वीं सालगिरह पर, देसी भाषाओं में अपने सारे प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने का एलान किया था। तब गूगल ने माना था कि इंटरनेट पर हिंदी की सामग्री की खपत में सालाना 94 फीसदी की वृद्धि हो रही है।
इस रिपोर्ट का असर यह होगा कि हिंदी समेत क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट उपलब्ध कराने वाली वेबसाइटों की तरफ ट्रैफिक और बढ़ेगा। दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट सर्च इंजन गूगल इंटरनेट की बड़ी विज्ञापन एजेंसी भी है। पर उसका एड सेंस अभी तक अंग्रेजी के मुताबिक ही है। उसने हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में इसकी सेवा शुरू की है, पर उसे और ज्यादा यूजर फ्रेंडली बनाने पर जोर देना होगा।
वैसे भी पिछले साल आईसीआईआई-केपीएमजी की रिपोर्ट में 2020 तक देश का डिजिटल विज्ञापन बाजार 25,500 करोड़ के होने की संभावना जताई गई थी। इंटरनेट की दुनिया में हिंदी और भारतीय भाषाओं के वर्चस्व की खबरों के बीच उनकी आर्थिक संभावनाओं का द्वार भी खुल रहा है। पर यह भी सच है कि आने वाले दिनों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के उपभोक्ता सचेत होंगे, कंटेंट प्रदाताओं को उस दौर के लिए तैयारी करनी होगी।