आदमखोर बाघिन के आगे बेबस
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उस बाघिन के बारे में विस्तार से बताने वाला कोई भी जीवित नहीं बचा, लेकिन कुछ बातें उसके बारे में लोग जानने लगे हैं। वह एक दिन में लंबी दूरी तय करती है और रिहायशी इलाकों में भी अंदर तक आसानी से घुस जाती है। एक विशेषज्ञ का कहना है कि शुरुआती तीन या चार लोगों को मारने के बाद उसने अपने शिकार को खाना शुरू किया। खाने की शुरुआत उसने पुट्ठे से की, जैसे वह हिरण को खा रही हो। दावे के साथ यह कहना मुश्किल है कि बार-बार शिकार वही बाघिन कर रही है, लेकिन पिछले छह हफ्तों में जब दसवीं मौत हुई, तब भारतीय अखबारों ने उसे 'आदमखोर' कहना शुरू किया।
भारत में वन्यजीव संरक्षण समाज चलाने वाले वन्यजीव विज्ञानी उल्लास कारंथ मानते हैं कि मानव के साथ बाघों का यह संघर्ष ठीक उन जगहों पर बढ़ा है, जहां संकटग्रस्त बंगाल टाइगर की आबादी संरक्षण कार्यक्रमों के कारण फिर से बढ़ी है। उल्लेखनीय है कि 20वीं सदी की शुरुआत में भारत में करीब 40,000 बाघ थे, लेकिन बाद में इनकी संख्या घटकर महज 4,000 रह गई। लिहाजा बाघों को बचाने के लिए व्यापक अभियान चला और उनके अनुकूलन की व्यवस्था की गई। लेकिन जहां इन संरक्षणात्मक कार्यक्रमों की वजह से बाघों की संख्या में वृद्धि हुई, वहीं इसने उसे मानव बस्तियों की ओर भी उन्मुख किया।
हर हमले के बाद बाघों का सामना मानव भीड़, क्रेन और ट्रैक्टर के शोर-शराबे से हुआ, जबकि पहले की मानव पीढ़ी बाघों को वापस जंगल भेजने के लिए सटीक और गूंथे हुए महाजाल की सहायता लेती थी। इसकी परतें खोलते हुए कारंथ कहते हैं, बाघों को साधने के लिए प्रशिक्षित लोगों की छोटी-सी टीम ही काफी है, जो हाथियों पर चढ़कर बाघों को नियंत्रित कर सकती है। लेकिन अभी होता यह है कि पहले आम लोगों की भीड़ जुटती है, फिर सेना आती है और वे चारे के रूप में अन्य पशु का इस्तेमाल करते हैं। इससे बाघों को पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
उत्तर प्रदेश में बाघिन का यह कहर 29 दिसंबर से तब शुरू हुआ, जब ईख के खेत में एक किसान का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। इसके करीब एक हफ्ते बाद एक युवक का दर्द टेलीविजन पर दिखा, जिसमें वह बता रहा था कि घटनास्थल से करीब 20 मील उत्तर की तरफ जब वह अपनी बहन के साथ था, तभी पीछे से बाघ ने उसकी बहन का गला दबोच लिया और तेजी से ईख के खेत में ले भागा।
इसके बाद तो हमलों के तार जुड़ते ही गए। इसी कड़ी में उत्तराखंड की सीमा पर बसे जिम कार्बेट राष्ट्रीय पार्क में, जहां बाघों की सघन आबादी दुनिया भर में सबसे अधिक होने के दावे किए जाते हैं, रविवार की सुबह राम चरण नामक 45 वर्षीय कर्मी गाड़ी से उतरकर सड़क के किनारे पहुंचा, तो बाघ ने उस पर हमला कर दिया। मुरादाबाद के शीर्ष नौकरशाह शिव शंकर सिंह कहते हैं कि उस कर्मी की मौत के बाद गुस्साए ग्रामीणों ने वन विभाग के आउटपोस्ट को घेर लिया और वहां के कर्मियों को कुछ देर के लिए बंधक भी बनाए रखा। ग्रामीण बंदूक की मांग कर रहे थे, ताकि वे खुद बाघिन को मार सकें।
वन्यजीव संरक्षण समाज की कार्यकारी निदेशक बेलिंडा राइट कहती हैं, जो बाघ आदमखोर हो जाए, उसे अवश्य मार देना चाहिए, लेकिन उसे पकड़ना बहुत दुश्कर काम है। जहां तक इस बाघिन का सवाल है, वह जिले में कहीं भी दिख सकती है और अपना शिकार कर सकती है। लोग भले ही मुस्तैद रहेंगे, लेकिन वह लोगों को चौंकाती रहेगी।
यही वजह है कि जिम कार्बेट राष्ट्रीय पार्क की घटना के बाद चार सौ लोग दो हाथियों की सहायता से जंगल का चप्पा-चप्पा छान रहे हैं। पार्क के फील्ड डायरेक्टर समीर सिन्हा की मानें, तो यह पहचानने की कोशिश हो रही है कि राम चरण पर हमला करने वाला बाघ या बाघिन कौन है।
वह कहते हैं, लोगों के गुस्से को समझा जा सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि अभी मुश्किल है कि पार्क में आदमखोर बाघ का प्रवेश हो गया है। संभव है कि आराम कर रहे बाघों को 'चौंकाकर' राम चरण ने कोई 'गलती' कर दी हो, और बाघ के साथ उसका संघर्ष संयोगवश हुआ हो। बहरहाल, तथ्य जो भी हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी के हाथों में बंदूकें थमा दी जाएं। कुछ कानूनी प्रावधान हैं, जिनका पालन करना जरूरी है। अपनी बातों पर बल देते हुए वह कहते हैं, अमूमन जब बाघ और मानव का आमना-सामना होता है, तो बाघ ही बीस साबित होता है और वह मानव को काफी नुकसान पहुंचाता है। मानव शायद ही बाघ को हानि पहुंचा पाता है।
लगातार हो रही मौतों के बाद उत्तर प्रदेश की सीमा पर बंदूकधारी नियुक्त किए गए हैं और उन्हें आदमखोर बाघिन को मारने की अनुमति दी गई है। पंजीकृत बंदूकधारी निशानेबाजों में एक संजय सिंह को सात मौतों के बाद वन पदाधिकारियों ने बुलाया था। उन्होंने तीन हफ्ता इस क्षेत्र में बिताया है।
उनका मानना है कि आदमखोर बाघिन सघन जंगल में इतनी अंदर चली गई है कि उसे हाथियों पर चढ़कर खोजना लगभग नामुमकिन है, जैसा आम तौर पर बाघ पकड़ने वाले करते हैं। यही वजह है कि वह और उनके जैसे दर्जन बंदूकधारी पैदल ही जंगल को अहले सुबह से लेकर दिन ढलने तक छान रहे हैं। उनके शब्दों में कहें, तो 'उसे मारने के सिवाय अब कोई दूसरा चारा नहीं है। अगर ऐसा नहीं किया जाएगा, तो वह लोगों का शिकार करती रहेगी। यह एक ऐसा खेल है, जिसके परिणाम के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। यह खतरनाक भी है और डरावना भी।'