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सबको साथ लाने की मुश्किल
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राहुल गांधी
राहुल गांधी के समक्ष अब कुछ कठिन कार्य हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी (एआईसीसी) के 84वें महाधिवेशन में उन्होंने जो प्रभावी भाषण दिया, उसे कार्यरूप दिया जाना बाकी है। कहना आसान होता है, करना कठिन। एआईसीसी के महासचिव और फिर उपाध्यक्ष के रूप में राहुल पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने की बात करते रहे हैं, पर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्यकारिणी में सभी 24 पदों पर लोगों को नामांकित करने के लिए 17 मार्च, 2018 को उन्होंने शक्तियां हासिल कर ली हैं।
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राहुल ने कांग्रेस में बुजुर्गों की जगह युवाओं को लाकर भारी बदलाव का वायदा किया है। लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही राहुल को अहमद पटेल, एके एंटनी और अन्य लोगों के समर्थन की जरूरत है, जो उनका मार्गदर्शन कर सकें। अखिलेश यादव और उमर अब्दुल्ला को छोड़ दें, तो उनका ममता बनर्जी, मायावती, करुणानिधि, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव एवं अन्य नेताओं के साथ गहरा व्यक्तिगत रिश्ता नहीं है। गठबंधन राजनीति के साथ राहुल की असुविधा इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि उन्होंने पूर्ण गठबंधन या नरेंद्र मोदी के खिलाफ समान विचारधारा रखने वाली पार्टियों के साथ आने का कोई ब्योरा नहीं दिया।
राहुल का भाषण कांग्रेस प्रतिनिधियों के साथ उन लोगों के लिए था, जो नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा का विरोध करते हैं। उन्होंने अपने लिए गढ़ी गई 'पप्पू' की छवि खारिज की और प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष के लिए कटु शब्दों का प्रयोग किया। इस साहसिक कार्य ने, जिसका दूरगामी असर होगा, संभावित सहयोगियों के लिए संकेत का कार्य किया है कि नया कांग्रेस अध्यक्ष भाजपा से सीधे संघर्ष के लिए दृढ़ संकल्प है।
सोनिया ने, जो पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का फैसला कर चुकी थीं, लगता है कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया है। इसकी दो वजहें हैं-राहुल को सफल बनाने की उनकी मातृत्व भावना और उनके राजनीति में बने रहने से द्रमुक, राजद, तृणमूल, राकांपा, सपा, बसपा, वाम दल और अन्य पार्टियों को साथ लाकर इंद्रधनुषी गठबंधन बन सकता है। ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, करुणानिधि, लालू प्रसाद, शरद यादव जैसे लोगों के बीच अहं के टकराव की आशंका पूर्ण वास्तविकता है। 1975-77 में जयप्रकाश नारायण तथा 1989, 1996 एवं 2004 में विश्वनाथ प्रसाद सिंह व हरकिशन सिंह सुरजीत की तरह विभिन्न संघर्षरत दलों को एक साथ लाने के लिए सोनिया गांधी के पास पर्याप्त सम्मान और स्वीकार्यता है। राहुल और सोनिया सत्ता के भूखे नहीं हैं, वे सत्ता के ट्रस्टी के तौर पर रहना पसंद करते हैं। सोनिया ने दिखाया है कि 2004 से 2014 के बीच प्रधानमंत्री बने बिना भी वह शक्तिशाली और प्रासंगिक हो सकती हैं। राहुल ने भी मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री बनने से इन्कार कर दिया और 48 की उम्र में वह खुद को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश करने की जल्दबाजी में नहीं हैं।
राहुल की यही अनिच्छा नरेंद्र मोदी-विरोधी मोर्चे का नेतृत्व करने की उसकी सबसे बड़ी बाधा है। जैसा मैंने हाल में प्रकाशित अपनी पुस्तक बैलेट-टेन एपिसोड्स दैट हैव शेप्ड इंडियाज डेमोक्रेसी में विस्तार से वर्णन किया है कि पहले आम चुनाव से तमाम लोकसभा में एक व्यक्तित्व का प्रभाव प्रमुख रहा है। 1951-52, 1957 और 1962 के संसदीय चुनावों में कांग्रेस की सफलता में नेहरू काफी हद तक महत्वपूर्ण थे। उसके बाद अपनी मृत्यु तक इंदिरा गांधी ने राजनीतिक परिदृश्य पर वर्चस्व बनाए रखा। फिर राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी का वक्त आया, जबकि पी वी नरसिंह राव और डॉ मनमोहन सिंह उनकी छाया के तले रहे। वर्तमान में कांग्रेस सहित विपक्ष मोदी के विशाल व्यक्तित्व का सामना करने में सक्षम नहीं है और यह 2019 के लिए सबसे बड़ी बाधा बनने वाला है। इंदिरा की तरह मोदी के पास किसी भी चुनाव को 'बाकी बनाम स्वयं' बनाने और विजयी बनकर उभरने की की शानदार क्षमता है।
जब इंदिरा को लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी और पिछड़े वर्ग के नेताओं का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने इसका विरोध करने के लिए अपने 'लिंग' और ‘विनम्र छवि’ का इस्तेमाल किया। 20 जनवरी, 1967 को रायबरेली में इंदिरा ने अपने नारीत्व को ताकत के स्रोत के रूप में जोड़ा और अपने भाषण से ‘भारत माता’ की अनौपचारिक पदवी हासिल की, जहां उन्होंने पूरे देश को अपना परिवार बताया और इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे वह उनकी समस्याओं का ख्याल रखती हैं। उसी समय जयपुर में एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने पूर्व राजपरिवार की महारानी गायत्री देवी पर निशाना साधा, जिन्होंने 1962 का लोकसभा चुनाव विशाल अंतर से जीता था। गायत्री देवी स्वयं को इंदिरा गांधी का प्रतिद्वंद्वी मानती थीं। गायत्री देवी ने स्वतंत्र पार्टी को अस्तित्व में लाने के लिए कड़ी मेहनत की। इंदिरा ने सीधे मतदाताओं से कहा कि 'जाओ, अपने महाराजा और महारानी से पूछो कि जब वे शासन कर रहे थे, तो अपने राज्य के लोगों के लिए उन्होंने क्या किया और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने क्या किया, जब वे लोगों की कीमत पर आराम की जिंदगी गुजार रहे थे।' दशकों बाद मोदी ने कांग्रेस के संभ्रांत नेतृत्व का मुकाबला करने के लिए 'चायवाले' की अपनी छवि का इस्तेमाल किया। मणिशंकर अय्यर ने इसमें उनकी काफी मदद की।
एआईसीसी के 84वें महाधिवेशन को विभिन्न कारणों से याद किया जाएगा। मंच पर कांग्रेस के इतिहास का प्रदर्शन करने के लिए कोई बैनर नहीं था। कांग्रेस ने ईवीएम का विरोध करने के लिए प्रस्ताव पारित किया और लगता है कि ममता व मायावती जैसी संभावित सहयोगियों को खुश करने के लिए मतपत्र से चुनाव कराने की मांग की। एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस को ईवीएम का पूर्ण विरोध करने से पहले राज्यों, शहरों, गावों के लाखों सदस्यों से प्रतिक्रिया मांगनी चाहिए, चाहे वे ईवीएम पर संदेह करें या नहीं।