खुशियां बनें विकास का पैमाना
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आज विश्व के कई विकसित देशों में मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसा संभवत: इन देशों द्वारा आर्थिक प्रगति के लिए अपनाए गए पूंजीवादी मॉडल के कारण हो रहा है। हर व्यक्ति को केवल अपनी चिंता है। ऐसे देशों में लोग इस सिद्धांत पर चल रहे हैं कि केवल 'कमाने वाला खाएगा'। यहां तक कि पुत्र भी बुजुर्ग माता-पिता के खाने का इंतजाम नहीं करता। उन्हें गुजर-बसर के लिए या तो स्वयं की आय अर्जित करनी होती है या फिर सरकारी सहायता पर आश्रित होना पड़ता है। दूसरी ओर भारतीय जीवन पद्धति उक्त सिद्धांत के सर्वथा विपरीत है।
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हमारी सोच है, कमाने वाला खिलाएगा। इससे परिवार के सभी सदस्य आपस में जुड़े रहते हैं एवं सामाजिकताबनी रहती है, इसलिए भारतवर्ष में मनोरोग के मामले तुलनात्मक रूप से कम हैं। आर्थिक विकास के पूंजीवादी मॉडल में सकल घरेलू उत्पाद एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को ही विकास को नापने का मुख्य पैमाना बनाया गया। आज जियो, कल किसने देखा। उत्पाद की आवश्यकता हो या नहीं, परंतु विज्ञापन देखकर उसे खरीदने के लिए मन में प्रबल विचार उत्पन्न किए गए। ऐसी प्रवृत्तियों को रोकने की जरूरत है।
- इसके लिए तीन सुझाव दिए जा सकते हैं।
1. 'कमाने वाला खिलाएगा' के सिद्धांत का पालन करते हुए नैगमिक सामाजिक उत्तरदायित्व (कॉर्पोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी - सीएसआर) योजना को समस्त कंपनियों एवं व्यक्तियों पर लागू किया जाना चाहिए। यह योजना उन कंपनियों पर लागू है, जिनकी वार्षिक आय 1,000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष हो अथवा वार्षिक लाभ पांच करोड़ रुपये प्रतिवर्ष हो अथवा वार्षिक कुल मूल्य (नेट वर्थ) 500 करोड़ रुपये हो। इन कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के औसत लाभ का दो प्रतिशतहिस्सा सीएसआर योजना के तहत समाज की उन्नति/भलाई के लिए बनाई गई योजनाओं पर खर्च करना होता है। समस्त लाभ अर्जित करने वाली कंपनियों एवं उच्च कुल मूल्य (हाई नेट वर्थ) व्यक्तियों को सीएसआर के दायरे में लाया जाना चाहिए। उच्च एवं मध्यम आय वर्ग के लोग धर्म के कामों में मदद करते ही हैं, परंतु इस मदद को यदि गरीब लोगों के लिए आर्थिक उन्नति के साथ जोड़ दिया जाए, तो इस वर्ग के लोगों के लिए रोजगार के नए अवसरों का सृजन किया जा सकता है।केंद्र एवं राज्य सरकारों को इस महान कार्य के लिए पहल करनी चाहिए।
2. सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ मानव पूंजी पर भी विशेष ध्यान देने की आज आवश्यकता है। देश में अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति जब तक संपन्न और खुश नहीं है, तब तक सरकार की नीतियां सफल नहीं है, ऐसा माना जाना चाहिए। देश में निवास कर रहे समस्त देशवासियों के लिए सरकार की ओर से रोजगार की गारंटी होनी चाहिए। आर्थिक नीतियां भी इसी प्रकार की बनाई जानी चाहिए, जिससे अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उत्पन्न हों एवं अंतत्तोगत्वा देश के नागरिक खुश रहें।
3. किसी भी देश की आर्थिक नीतियों की सफलता का पैमाना, वहां के समस्तनागरिकों में खुशी का संचार ही होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति सामान्यतः खुश तभी रह सकता है, जब उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से हो जाती हो। शुरुआती दौर में तो रोटी, कपड़ा और मकान की प्राप्ति ही सामान्य जन को खुश रख सकती है। परंतु यह अंतिम ध्येय नहीं हो सकता है।
राष्ट्र तेजी से तरक्की करे एवं संपूर्ण विश्व में एक आर्थिक ताकत बनकर उभरे तथा इसके नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय में तीव्र गति से वृद्धि हो, इन लक्ष्यों कीप्राप्ति के साथ-साथ भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद दोनों में समन्वय स्थापित करना भी आवश्यक है।
अतः आर्थिक प्रगति का पैमाना सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ प्रसन्नचित मानव सूचकांक (हैपी ह्यूमन इंडेक्स) को भी बनाया जाना चाहिए। देश के शासकों का मुख्य उद्देश्य अंततः देश में निवास कर रहे लोगों की खुशी में वृद्धि होना चाहिए। इस इंडेक्स को भूटान में बहुत सफलता के साथ लागू किया गया है। वस्तुतः आर्थिक प्रश्नों का विचार करते समय नैतिक मूल्यों पर विचार करना भीआवश्यक है, जिससे देश के नागरिकों को प्रसन्न रखने में मदद मिल सकती है।