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इंडिया गेट पर जो कुछ हुआ

Fri, 28 Dec 2012 09:44 PM IST
अरुण नेहरू
अरुण नेहरू Updated Fri, 28 Dec 2012 09:44 PM IST
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happened at india gate

देश भर में जारी आंदोलन ने बेहतरी के लिए बदलाव की पहल की है। नया साल आने वाला है। हम सभी चमत्कार और पीड़िता के पूरी तरह स्वस्थ होने की कामना करें। हमारी संवेदनाएं एवं प्रार्थनाएं उसके साथ हैं। इंडिया गेट पर जो कुछ हुआ, उससे मैं दुखी हूं, क्योंकि इस आंदोलन को राजनीतिक दलों के छात्र संघों ने हथिया लिया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वहां अपनी उपस्थिति दर्ज की। पूर्व सैन्य प्रमुख वी. के. सिंह और बाबा रामदेव भी इस आंदोलन में कूद पड़े। और आखिरकार इस पर असामाजिक तत्वों का कब्जा हो गया, जिन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। नतीजतन हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। इस बीच दिल्ली पुलिस के एक सिपाही को जान भी गंवानी पड़ी।

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बेशक सब कुछ सही नहीं था, लेकिन उसके बाद जो हुआ, उसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। अगर हम शांत दिमाग से सोचें, तो इस बात से असहमत नहीं हो सकते कि घटना के बाद पीड़िता को अस्पताल ले जाने में काफी तेजी दिखाई गई, और देश के कई हिस्सों में छापेमारी करके 72 घंटे के भीतर सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
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इंडिया गेट पर हुए प्रदर्शन के दौरान दो न्यूज चैनलों ने भीड़ को उकसाने वाली खबरें प्रसारित की थीं। मेरा मानना है कि मीडिया और गलत खबरें प्रसारित करने वाले टीवी चैनलों को, जिसका नाम मैं नहीं लेना चाहता, थोड़े आत्ममंथन की जरूरत है। जाहिर है, यह राजनीति करने का समय नहीं है।
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मुझे हैरानी है कि मीडिया और प्रदर्शनकारियों में से शायद ही किसी ने मौत से जूझ रहे पुलिसवालों या 78 अन्य घायलों के पास जाने की जहमत उठाई हो। हम सभी ने बाबा रामदेव को एक बस के ऊपर खड़े देखा, जो अपने समर्थकों के साथ इंडिया गेट की तरफ जाने की कोशिश कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों की भीड़ में इंडिया गेट पर पहुंचने वाले गुंडे हॉकी स्टिक और चाकू से लैस थे। वहां उन लोगों ने पुलिसवालों को चोटें पहुंचाईं। हमने यह भी देखा कि बसों और एंबुलेंसों पर पथराव हुआ और महिलाओं के साथ गाली-गलौज की गई, जबकि कुछ ने छेड़छाड़ की भी शिकायत की। हमने टेलीविजन पर और कई समाचार पत्रों में छपे उन चित्रों को भी देखा, जिनमें आपराधिक तत्व उल्टी हुई बसों और कारों के ऊपर खड़े थे। क्या उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? मेरा मानना है कि मीडिया के साथ मिलकर पुलिस को भीड़ में शामिल लोगों का पता लगाना चाहिए।

1980 के दशक में आंतरिक सुरक्षा मंत्री के रूप में मेरा कार्यकाल अनेक चुनौतियों से भरा रहा था। हमने कई बड़ी आतंकवादी गतिविधियों का सामना किया। उस दौरान पुलिस और अर्धसैनिक बलों के काफी जवान हताहत हुए थे। तब मेरे लिए परेड में शामिल होना और अपना कर्तव्य निभाते हुए शहीद हुए कर्मियों की माताओं, पत्नियों, बेटियों और बहनों पदक और प्रमाणपत्र देना पीड़ादायक अनुभव था। वर्दीधारी पुरुषों और महिलाओं के त्याग और दर्द को बहुत कम लोग जानते हैं। अन्य लोगों की तरह उन सभी के भी परिवार हैं। मेरा मानना है कि हमें कुछ भी बर्दाश्त करना पड़ता हो, पर किसी घटना पर निर्णय देने से पहले संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणाम भविष्य के लिए महत्वपूर्ण रुझान दिखाते हैं। मीडिया की निरंतर नकारात्मकता का चुनावी नतीजे पर कोई असर नहीं दिखा है। परिणाम बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश में पिछले पांच साल तक सत्ता में रही सरकार के खिलाफ आक्रोश था, जिससे कांग्रेस को विजय मिली। राज्य में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन सत्ता-विरोधी भावना को बेअसर करने में वह सफल नहीं हुए। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह चुनावी नतीजा भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए चेतावनी की तरह है। कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जीत के लिए भाजपा को चमत्कार की जरूरत है, तो आंध्र प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस भी इसी तरह की समस्या से जूझेगी।

गुजरात के परिणाम और रिकॉर्ड तीसरी बार नरेंद्र मोदी को सत्ता मिलना उनके शासन कौशल और 120-130 सीटें मिलने की उम्मीद के प्रचार-प्रसार का नतीजा है। लेकिन मेरा मानना है कि मोदी सत्ता के खिलाफ माहौल को लेकर सजग थे। इसलिए किसी भी कसौटी पर कसें, तो यह एक बड़ी जीत है। हालांकि आगे बढ़ने की उनकी योजना बेहद सतर्कतापूर्ण होगी। उससे पहले भाजपा को पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का विवाद सुलझाना होगा।


नए साल की दहलीज पर हम उस युवती के लिए प्रार्थना करते हैं। इसके अलावा उस भीड़ का भी पता लगाना चाहिए, जो सुभाष चंद तोमर की मौत की वजह बन गई। उनका एक बेटा न्याय मांग रहा है। क्या इस नुकसान के लिए भी कोई आंदोलन करेगा? सामूहिक बलात्कार का मुद्दा पूरे देश में महसूस किया गया है और इसके खिलाफ चला आंदोलन जायज था। इसी पृष्ठभूमि में 2013 में दिल्ली में चुनाव होंगे। यह दुखद है कि ऐसे आलोड़ित वातावरण में कुछ अपराधियों ने एक ऐसे पुलिसकर्मी की हत्या कर दी, जो इंडिया गेट पर अपनी ड्यूटी निभा रहा था।    

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