हस्तशिल्प की ओर भी बढ़े मदद का हाथ
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स्वतंत्रता के पश्चात भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के जरिये योजनाबद्ध विकास प्रारंभ हुआ था। ग्रामीण विकास हेतु अनेक योजनाओं एवं कार्यक्रमों को लागू किया गया। कृषि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद, जनसंख्या वृद्धि के कारण छोटी जोत वाले कृषकों व भूमिहीन श्रमिकों के रोजगार के दिनों व वास्तविक मजदूरी में गिरावट आई। भारत जैसे कृषि प्रधान देश की अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों को बढ़ावा देना सबसे अधिक तर्कसंगत माना गया है। तीव्र गति से विकास के लिए कुटीर, लघु व मझौले उद्योगों की भूमिका को महसूस किया गया। राजस्थान लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए जाना जाता है। खासतौर से यहां के हस्तशिल्प ने वैश्विक पहचान बनाई है। राजस्थान में सामंती शासन रहने के कारण वृहत उद्योगों को प्रोत्साहन नहीं मिला। परंतु मझौले स्तर के सूती-ऊनी वस्त्र उद्योग, शक्कर, सीमेंट, कांच, नमक व कुटीर उद्योग प्रमुख रहे।
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परंपरागत कलाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखने और विकासवान बनाने में राजस्थान के हस्तशिल्पियों का अभूतपूर्व योगदान है। कोरोना महामारी की वजह से राजस्थान लौटने वाले अधिकांश प्रवासी मजदूर व कारीगर लघु उद्योग विशेषकर पत्थर, वस्त्र व आभूषण उद्योगों से जुड़े हैं। ये प्रवासी मजदूर ग्रामीण औद्योगिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कुटीर उद्योग प्रायः परिवार के सदस्यों द्वारा संचालित होते हैं, जिनमें बहुत कम मात्रा में पूंजी लगती है। प्रदेश की प्रसिद्ध वस्तुओं में मूल्यवान सोने-चांदी के कलात्मक आभूषण, पीतल पर खुदाई-भराई, पत्थर व लकड़ी पर खुदाई, ब्ल्यू पॉट्री, लाख व हाथी दांत के सामान, चंदन की वस्तुएं, सांगानेरी प्रिंट के कपड़े, पाल व मारवाड़ की रंगाई-छपाई के वस्त्र, कोटा की डोरिया साड़ियां, बीकानेर के कालीन व कंबल, जयपुर की मूर्तियां, उदयपुर, सवाई माधोपुर व डुंगरपुर के लकड़ी के खिलौने, शाहपुरा की फड़ पेंटिग्स, जैसलमेर और बाड़मेर में जाली के कपड़े पर हाथ की छपाई, नाथद्वारा के आभूषण, जयपुर व जोधपुर की बंधेज साड़ियां, उदयपुर की हाथी दांत की वस्तुएं, सलमा सितारे, व गोटे-किनारी के काम से युक्त परिधान, नागौर के लोहे के औजार इत्यादि हैं, जिन्हें प्रोत्साहन देकर राज्य की आर्थिक वित्तीय स्थिति को सुधारा जा सकता है।
नोटबंदी, जीएसटी व कोराना लॉकडाउन से आई मंदी का सर्वाधिक असर राजस्थान के इन लघु उद्योगों पर पड़ा है। एक ओर जहां कच्चा माल नहीं मिल रहा, दूसरी ओर मांग समाप्त हो गई, निर्यात बंद हो गया। पर्यटन उद्योग पर पड़े दुष्प्रभाव ने हस्तशिल्प, ज्वेलरी, खादी व चर्म उद्योग में उत्पादन रोकने पर मजबूर कर दिया। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मांग नहीं होने से इनका संकट बढ़ गया है। बेरोजगारी की वजह से कलाकार व मजदूर रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वृद्ध कारीगर, महिलाएं बेरोजगार हैं। कच्चे माल की मांग की कमी से उत्पन्न विपणन की समस्या, उद्योगपतियों की उदासीनता, परिवहन की कठिनाइयों के कारण सर्वाधिक प्रभावित समाज के कमजोर वर्ग के दस्तकारों का रोजगार समाप्त हुआ है। प्रमुख शहरों में विशेष मेले, प्रदर्शनियां व शिल्पकारों का आयोजन बंद हो गया है। पर्यटकों की कमी के कारण एम्पोरियम सूने पड़े हैं। एयर कार्गो कांप्लेक्स बंद है, जिससे निर्यात बंद है।
राजस्थान के कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प कलाकारों, श्रमिकों को मदद आज प्राथमिक जरूरत है। प्रदेश में खादी के क्षेत्र में नए उद्योग स्थापित करना आवश्यक है, अकेले इस उद्योग में सवा दो लाख व्यक्तियों को रोजगार मिलने की संभावना है। इन उद्योगों में सर्वाधिक रोजगार ग्रामीण महिलाओं को मिलता है। हाथकरघा, हैंडलूम क्षेत्र में हस्त कलाएं रोजगार सृजन के साथ निर्यात की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। महात्मा गांधी ने कहा था,'बेरोजगारी उन्मूलन, ग्रामीण उद्योग, विकेंद्रीकरण के लिए मैं उस मशीनरी का स्वागत करता हूं, जो बिना दो हाथों को हटाए उत्पादन व आय बढ़ाती है।' प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने घोषणा की थी कि राष्ट्र के लिए जरूरी है, गरीबी, अज्ञानता, बीमारी, असमानता दूर करना और लघु उद्योग इसमें सर्वाधिक सहायक सिद्ध हो सकते हैं। यदि बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जाए, तो इन सपनों को साकार किया जा सकता है।