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केदारनाथ सिंह हमारे समय के सबसे बड़े कवि हैं। उन्होंने हिंदी कविता को एक नया रास्ता दिया, जिसके दोनों तरफ उम्मीद की दुनिया है। जैसा कि वह खुद अपनी कविता के हवाले से कहते हैं कि मुझे सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है, क्योंकि इससे एक उम्मीद होती है कि जो दुनिया सड़क के इस ओर है, उससे कहीं बेहतर दुनिया सड़क के उस तरफ है। दरअसल, हममें से हर कोई रोज कहीं न कहीं कोई सड़क तो पार करता ही है। मगर इससे उम्मीद तो सिर्फ केदारनाथ सिंह ही लगा सकते हैं। उन्होंने बने बनाए खांचों के विपरीत बगैर किसी विरोध के लोक और शास्त्र दोनों परंपराओं को जोड़ते हुए आम जन के लिए हिंदी कविता को सुलभ और सरल बनाया। उनकी कविताओं में जीवन अपनी पूरी ऊर्जा के साथ मौजूद है।
उन्होंने कविता में मनुष्य के विश्वास को फिर से स्थापित किया। केदारनाथ सिंह की कविताओं में गांव, कस्बे, बाग-बगीचे और भूले-बिसरे लोग तो आते ही हैं, साथ ही उनमें ठेठ गंवई किसान जीवन भी सायास मुखर हुआ है। उनकी शुरू से लेकर अभी तक की कविताएं कई पीढ़ियों और श्रोताओं के कंठ में बसी हुई हैं। ऐसे कवि के लिए कोई भी सम्मान कम है। हां, ये जरूर है कि हिंदी साहित्य के लिए केदार जी को ज्ञानपीठ सम्मान मिलना उनके महत्व को रेखांकित करता है। ‘गिरने लगे नीम के पत्ते...पड़ने लगी उदासी’ से लेकर ‘पानी में घिरे हुए लोग’ और ‘लहरतारा’ जैसी कविताएं उनकी अपने समय के सापेक्ष सक्रियता को उजागर तो करती ही हैं, साथ ही सजगता से अपने परिवेश को बयान भी करती हैं।
उनके पूरे काव्य खंड की बुनावट में सूक्ष्मता के साथ मनुष्य और पदार्थ में गहराई से प्रवेश करने की क्षमता है, जो हैरानी भरा लगता है। `बनारस’ और `नदी’ जैसी कविताएं उनकी बेहद प्राणवान रचनाएं हैं। `बनारस’ कविता में तो उन्होंने उस शहर के इतिहास, भूगोल के साथ-साथ अध्यात्म का ऐसा ताना-बाना बुना है कि पूरी की पूरी कविता जी उठती है। जैसे इसकी बानगी देखिए- किसी अलक्षित सूर्य को/देता हुआ अर्घ्य/शताब्दियों से इसी तरह/गंगा के जल में/अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर/अपनी दूसरी टांग से बिलकुल बेखबर।
कविता में अघोरपन है, जो श्मशान का साधक ही महसूस कर सकता है। जो जीवन और मृत्यु के प्रति निर्विकार भाव रखता हो। इस तरह की कविता में समूचे कालखंड के साथ इतनी सहजता से प्रयोग तो केदार जी ही कर सकते हैं। असाधारण को साधारण और साधारण को असाधारण बनाने की अद्भुत क्षमता है उनमें। `अकाल में सारस’ कविता संग्रह में कुछ ऐसी ही कविताएं हैं, जहां कवि गहराई से, मगर मूल्य- बोध के साथ जीवन की पड़ताल करता है। ये कविताएं सिर्फ सपाटबयानी नहीं हैं और न ही साहित्य का कोरस। केदारजी की तमाम कविताएं जिंदगी के सहजबोध से प्रभावित हैं। वे जटिल होते जा रहे समय में जीवन के सुकून का सूत्र देती हैं। उनकी कविताएं बोझिल होने से बचती हैं। वे अपनी छोटी-छोटी पंक्तियों में बड़ी-बड़ी बातें करती हैं। ये कविताएं ऐसी हैं कि परिवेश का अहसास होते ही लोगों की जुबान पर सहज ही आ जाती हैं। काल से होड़ लेतीं, उनकी कई कविताओं के स्वर में पैनापन भले ही न हो, मगर आहिस्ता-आहिस्ता वे पाठक के दिलोदिमाग पर छा जाती हैं। बहुत सी कविताएं तो ऐसी हैं कि वे बीते और रीते हुए की याद दिला जाती हैं। जैसे कि `फागुन’, `फसल’ और `दाने’ कविता को पढ़ने के बाद हम गुजरे हुए कालखंड में चले जाते हैं।
`दाने’ कविता की एक बानगी- नहीं हम मंडी नहीं जाएंगे/खलिहान से उठते हुए कहते हैं दाने/जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आएंगे/जाते- जाते कहते जाते हैं दाने। केदार जी के यहां कविता बेहद मासूमियत से अपने को बयान करती है। ऐसी मासूमियत कि कोई भी उस पर मर मिटे। ऐसी कविता के लिए तो कालजयी दृष्टि के साथ-साथ जीवनबोध भी चाहिए, जो अपने दौर में केदारजी के पास ही है। उनकी बहुत सी कविताओं में पूर्वांचल की धरती की गमक है। जिसमें आंचलिकता भरपूर है।