महागुरुओं का गुरु उत्सव
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खासी बहस छिड़ी है कि महागुरुओं के बीच में कोई स्वयंभू गुरु बच्चों को कैसे पढ़ा सकता है? जिसके पास पढ़ाने का लाइसेंस है, वही तो किसी को पढ़ा सकता है। उसके अलावा यदि कोई ई-क्लास लेकर बच्चों को पढ़ाने की जुर्रत करता है, तो उन लोगों को कैसे हजम हो सकती है, जो शिक्षा के ठेकेदार हैं या जिनके पास पढ़ाने का लाइसेंस है। भले ही वे पढ़ाना जानें या न जानें, लेकिन उनके अधिकारों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। लोग झंडा-डंडा लेकर खड़े हैं कि गुरु उत्सव मनाना हो मनाओ, लेकिन खास गुरु का व्याख्यान किसी भी सूरत में नहीं सुनना है।
महागुरु चिंतित हैं कि यदि किसी और गुरु ने उनके पीरियड में आकर बालकों के सामान्य ज्ञान की परीक्षा ले ली, तब उनका क्या होगा, जो हर महीने बिना मुंह-दिखाई किए ही शगुन वसूल रहे हैं। कुछ महागुरु चैन की सांस ले रहे हैं कि अच्छा हुआ गुरु के ई-व्याख्यान से पहले ही वे रिटायर हो गए, वरना न जाने कितनी फजीहत झेलनी पड़ती। गुरु ने भी कह दिया है कि ई-व्याख्यान देने का जो अवसर उन्हें मिला है, उसे किसी भी कीमत पर वह गंवाने को तैयार नहीं हैं। गुरु बखूबी समझते हैं कि उनका व्याख्यान हिट रहता है। उनके व्याख्यान से प्रभावित होकर उनके अनेक ऐसे शिष्य बन चुके हैं, जिन्हे गुरु ने अपना शिष्यत्व प्रत्यक्ष रूप से प्रदान नहीं किया है।
बहरहाल, विरोधियों का तर्क है कि व्याख्यान देना है, तो दो, मगर जबर्दस्ती काहे करते हो कि सुनना ही पड़ेगा। हमारी मर्जी हम अपने इलाके में अपने स्कूल के बच्चों को व्याख्यान सुनने दें या न सुनने दें। जब कोई नया गुरु अपने अधिकार का दुरुपयोग करने लगे तथा जबर्दस्ती बच्चों को पढ़ाने की जिद करने लगे, तो भला उसे स्वीकार कैसे किया जा सकता है? आखिर ओरिजिनल सर्टिफिकेटधारी गुरुओं के भी अपने अधिकार हैं, जिन्हे लोकतंत्र में झुठलाया नहीं जा सकता। हालांकि तमाम विवादों ने व्याख्यान देने से पहले ही गुरु को सुर्खियों में ला दिया है।