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जीएसटी की ‘पॉपकॉर्न’ कथा: इसका बुनियादी दर्शन था टैक्स दरों में कमी, पर ब्रांडिंग दिखा रही कुछ और ही रंग
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विस्तार
यूनानी दार्शनिकों के अड्डे पर इस तरह की पहेलियां आती रहती थीं। यह पहेली प्लूटार्क लेकर आया। महान नायक थीसियस का एक जहाज पुराना हो गया था। उसके पुर्जे बदलने लगे। होते-करते जहाज के पुर्जे पूरी तरह बदल गए। प्लूटार्क ने पूछा कि क्या यह वही जहाज है, जिस पर चढ़कर थीसियस ने जंग जीती थी या अब यह एक नया जलपोत है? जीएसटी की उलझनें इसे थीसियस का पैराडॉक्स बना रही हैं। जो जीएसटी भुगत रहे हैं, वह पसोपेश में हैं कि यह कथित महान सुधार नया है या पुराने से ज्यादा दर्दनाक है?
जीएसटी पर खीझ और असमंजस लाजिमी है। दरअसल, जीएसटी के तीन मकसद थे। पहला कर ढांचे को सरल करना, क्योंकि इससे पहले कई तरह के दूसरे टैक्स थे। मगर हुआ कुछ और ही। नमकीन पॉपकॉर्न पर पांच फीसदी, पैकेज्ड पर 12 फीसदी और मीठे चॉकलेटी पॉपकॉर्न पर 18 फीसदी से समझा जा सकता है कि जीएसटी में सहजता का पॉपकॉर्न बन गया है। बकौल वर्ल्ड बैंक जीएसटी अब दुनिया का सबसे जटिल टैक्स सिस्टम है। दूसरा मकसद था टैक्स सिस्टम को तकनीक से जोड़कर उत्पीड़न रहित करना। मगर इंस्पेक्टर राज का हाल यह है कि सरकार के पुराने कारिंदे और सलाहकार (अरविंद सुब्रमण्यन) जीएसटी को नया टैक्स आतंक कह रहे हैं। तीसरा उद्देश्य था टैक्स चोरी रोकना। पर जीएसटी इंटेलिजेंस की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2023-24 में दो लाख करोड़ की जीएसटी चोरी पकड़ी (जो नहीं पकड़ी गई, उसका क्या ही हिसाब!) गई। यह आंकड़ा मासिक जीएसटी संग्रह से ज्यादा है।
आपकी झुंझलाहट और बढ़ जाएगी, जब पता चलेगा कि पॉपकॉर्न से जीएसटी के टैक्स संग्रह का केवल 0.013 फीसदी राजस्व आता है। यह अकेला नमूना नहीं है। देसी मिठाई पर पांच और केक पेस्ट्री पर 18 फीसदी, रोटी पर पांच और पराठे पर 18, गैर-एसी रेस्टोरेंट में खाने पर पांच और एसी पर 18 फीसदी, कपड़ा हाथ से बना, तो टैक्स नहीं, पर अगर बिजली वाली मशीन लग गई, तो जीएसटी, यूनिवर्सिटी एफिलिएशन पर 18 फीसदी टैक्स, मगर हेलिकॉप्टर सर्विस पर पांच फीसदी... बड़ी लंबी फेहरिस्त है। जीएसटी में 2017 के बाद 600 से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं। जीएसटी काउंसिल की 55 बैठकें हुई हैं, हर बैठक में नियम बदले गए हैं। दरअसल, जीएसटी भारतीय टैक्स सिस्टम के बुनियादी अंतर्विरोध का शिकार हो गया है, जहां सहजता के आग्रहों पर राजस्व उगाहने की जिद हमेशा से भारी पड़ती है। जीएसटी का बुनियादी दर्शन था टैक्स दरों में कमी, आसान टैक्स क्लासीफिकेशन और इनपुट टैक्स (कच्चे माल और सेवाओं पर) की वापसी। इस सुधार से मांग, खपत और पारदर्शिता बढ़नी थी। ऐसा होते ही टैक्स संग्रह अपने-आप बढ़ना था। लेकिन वन नेशन-वन टैक्स की ब्रांडिंग में जो जीएसटी हमें मिला, वह बुनियादी तौर पर पेचीदा था। उसमें कई टैक्स स्लैब थे, जिनमें जटिल क्लासीफिकेशन ठूंसकर भरे गए। ऐसा इसलिए, क्योंकि इनपुट टैक्स (कच्चे माल और सेवाओं पर) की वापसी से राजस्व के नुकसान की भरपाई जो करनी थी। जटिल वर्गीकरण से अधिकाधिक टैक्स उगाही जीएसटी की तासीर में है। पुराने एक्साइज टैक्स में पेचीदा क्लासीफिकेशन का रोना था, जिस पर विवाद होते थे, जीएसटी में भी वही हो रहा है।
एक नजीर और। टैक्स नौकरशाही ने पहले तो जीएसटी पर राज्यों को मनाने के लिए पांच साल तक टैक्स नुकसान से भरपाई का वादा किया और फिर इसके जीएसटी पर कंपनशेसन सेस लगा दिया, क्योंकि केंद्र सरकार अपने खजाने से इस नुकसान को भरना नहीं चाहती थी। यह टैक्स पर टैक्स था, जिसे 2022 में खत्म होना था, मगर इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया। राज्य चाहते हैं कि इसे खत्म कर दिया जाए, क्योंकि अब टैक्स वसूली से उन्हें कुछ नहीं मिलता। मगर केंद्र सरकार इस सेस के बदले लग्जरी उत्पादों पर टैक्स बढ़ाने की जुगत में है। सनद रहे कि राजस्व के लालच में ही मोटे टैक्स वाले पेट्रोल, डीजल या जमीन की खरीद-बिक्री को जीएसटी से बाहर रखा गया। टैक्स जटिलताएं टैक्स सिस्टम को विवेकाधिकार और भ्रष्टाचार का अभयारण्य बनाती हैं। यदि किसी रेस्टोरेंट में एक हिस्सा एसी और दूसरा नॉन एसी है, तो कहां से कितनी बिक्री किस टैक्स दर के दायरे में होगी, यह जीएसटी अफसर की मेहरबानी पर निर्भर है।
एक उत्पाद के कई टैक्स क्लासीफिकेशन, एचएसएन कोड, एसएसी कोड, प्लेस ऑफ सप्लाई रूल्स की पहेलियां, इनपुट क्रेडिट के दावों का ‘मिसमैच’ और क्रेडिट की उलटी वसूली, ई-वे बिल की उलझन और पुरानी कारों की बिक्री पर टैक्स का नया पेचीदा फरमान-इंस्पेक्टर राज के दांत-नाखून तेज करने वाले फैसले बढ़ते जा रहे हैं। पारदर्शिता की कसम खाते-खाते जीएसटी फर्जीवाड़े का जखीरा बन गया है। बीते अक्तूबर में 18,000 फर्जी कंपनियों में 25,000 करोड़ की टैक्स चोरी मिली। आधार और पैन चुराकर हजारों शेल कंपनियां बनाई जा रही हैं, जिन पर फर्जी इनवॉयस जारी कर इनपुट टैक्स क्रेडिट वसूले जा रहे हैं। क्या सरकारी और क्या निजी कंपनियां, सब जीएसटी में सेंधमारी कर रही हैं। एलआईसी पर वसूली के नोटिस बरस रहे हैं। बीमा कंपनियां, आईटी, ई-कॉमर्स, स्टील, मेटल, सिगरेट, बीड़ी, पान मसाला, जिसे देखो वही जीएसटी लूटे जा रहा है। डार्क वेब और वीपीएन से चल रहा कारोबार भारत की ‘मजबूत’ साइबर सिक्योरिटी की खिल्ली उड़ाता है।
बीमा प्रीमियम पर टैक्स अनुचित है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा था। केवल पांच वर्षों में इन बीमा उत्पादों पर टैक्स से सरकार की कमाई 680 फीसदी बढ़ गई! अगर बीमा प्रीमियम पर जीएसटी घटाकर पांच फीसदी कर दिया जाए, तो करीब 2500-2600 करोड़ का नुकसान होगा। न केंद्र इस नुकसान को उठाना चाहता है और न राज्य। पारदर्शिता, सहजता, टैक्स के बोझ में कमी की बातें मोह-माया हैं। जीएसटी राजस्व बढ़ाने का मकसद हासिल कर रहा है। जीएसटी की वसूली कंपनियों की कमाई पर लगने वाले कॉरपोरेट टैक्स से ज्यादा है। जीएसटी को बदलने और टैक्स बोझ घटाने के लिए सरकार को अपने खर्च का ढांचा बदलना होगा, मगर यह होने से रहा। जीएसटी में टैक्स स्लैब घटाने पर चर्चा दो साल से चल रही है, पर फैसला नहीं हो रहा, क्योंकि राजस्व चाहिए। अब जबकि जीएसटी का संग्रह ढलान पर है, तो टैक्स रियायतों यानी राजस्व का बलिदान मांगने वाले सुधारों की उम्मीद टूटती जा रही है।