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सरकार के पास-फेल का हिसाब

Tue, 19 May 2015 06:34 PM IST
निर्मल गुप्त
निर्मल गुप्त Updated Tue, 19 May 2015 06:34 PM IST
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Government pass or fail

बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट आने शुरू हो गए हैं। अब इन परीक्षाओं में इतने अंक लुटते हैं कि कोई फेल नहीं होता। सारे पप्पू-टप्पू टाइप के लोग पास हो जाते हैं। परीक्षक इस उदारता से अंक बांटते हैं कि यदि गणितीय बाध्यता न हो, तो वे छात्रों को सौ में से एक सौ दस नंबर दे डालें। सौ नंबर उत्तर पुस्तिका में लिखाई के और दस अंक अतिरिक्त उस सफाई के, जो हाथ की सफाई भी हो सकती है। बच्चे ज्यादा अंक पाकर कम इतराते हैं, पर अभिभावकों का सीना गर्व से अधिक फूलता है। वे नौनिहालों के नंबरों की लहलहाती फसल में आनुवांशिक कमाल देखते हैं।

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सरकार को सत्ता संभाले एक साल पूरा होने वाला है। मुल्क के समस्त चिंतक सरकार के कार्यकलापों की कॉपी जांचने में लगे हंै। यहां पूर्णांक सिर्फ दस हैं। कुछ तो सरकार बनने के पहले दिन से उसका रिजल्ट बताने में लगे हैं। वे सरकार को लगातार फेल घोषित कर रहे हैं। हवा तेज चली एक नंबर घटा। हवा मंद रही, तो दो नंबर, बारिश हुई, तो तीन अंक घटे और भूंकप आया, तो दस पूर्णांक में से माइनस नौ। ऋणात्मक दस इसलिए नहीं दिए, क्योंकि भूकंप का एपिसेंटर भारत में न होकर नेपाल में था। यदि भूकंप का केंद्र बिंदु देश में होता, तो यकीनन सरकार को माइनस दस अंक मिलने थे और सरकार अपने कार्यकाल के शेष चार साल इनकी भरपाई करती रहती।
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लोकतंत्र में नंबरों का बड़ा महत्व होता है। यहां औसत के आधार पर कुछ नहीं कहा जाता। सबसे बड़ी बात यह कि नंबर चलायमान होते हैं। इसकी मूल्यांकन प्रणाली भी अद्भुत होती है। धारणा के आधार पर नंबर मिलते हैं, पूर्वाग्रह के अनुसार घटते हैं और बदलती निष्ठाओं के अनुरूप रंग बदलते हैं। नंबर गेम के खिलाड़ी कभी हार नहीं मानते। वे अपनी पराजय में से जीत का उचित आंकड़ा ढूंढ लाते हैं। विपक्ष सरकार को विफल घोषित करता रहता है। सरकार का प्रचारतंत्र अपने पास होने का प्रमाणपत्र जनता को दिखाता रहता है। जनता साइबर कैफे वाले की तरह औरों के द्वारा जारी रिजल्ट बिना कोई टिप्पणी किए चुपचाप निहारती रहती है।
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