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बिहार में अच्छे दिन
तवलीन सिंह
Updated Sun, 30 Jul 2017 06:58 PM IST
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तवलीन सिंह
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कहते हैं कि राजनीति में जब परिवर्तन आता है, तूफान बनकर आता है, पर पिछले सप्ताह बिहार में जो परिवर्तन आया, उसने तूफानों को भी पीछे छोड़ दिया। सारी राजनीतिक बिसात ही बदल गई है। अब वह महगठबंधन, जिसके साथ तमाम विपक्षी दलों ने अपनी आशाएं बांध रखी थीं, रुई की बत्ती की तरह हवा में उड़ गया है। सो, क्या हुआ बिहार में? क्यों हुआ? क्या नीतीश कुमार ने वास्तव में अपने साथियों के साथ धोखा किया है?
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मेरी अपनी राय में बिहार के मुख्यमंत्री को अपनी छवि की ज्यादा चिंता थी और सत्ता में रहने की कम। सत्ता में वह राजद के साथ भी रह सकते थे, क्योंकि तेजस्वी यादव पर आरोप ही लगा है और ऐसे आरोप कई राजनेताओं पर लगे हुए हैं। त्यागपत्र की बात छेड़ी थी नीतीश कुमार ने, लेकिन अगर उनको निजी तौर पर छवि की चिंता न होती, तो इसकी आवश्यकता नहीं थी। अपनी बेदाग छवि के लिए ही नीतीश जाने जाते हैं, सो यही उनकी राजनीतिक संपत्ति हैं। सवाल यह है कि अब उस सेक्यूलरिज्म का क्या होगा, जिसके कारण नीतीश ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा का साथ छोड़ा था। क्या मान लिया जाए कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी सेक्यूलर हो गए हैं? या इस मुद्दे की अहमियत जनता की दृष्टि में कम हो गई है? कुछ ऐसा हुआ तो है, लेकिन नीतीश कुमार ने इतना बड़ा कदम यह सोचकर उठाया कि जब तक वह लालू यादव और उनके परिवार के साथ सरकार चलाने का प्रयास करते रहेंगे, तब तक बिहार में असली विकास और परिवर्तन नहीं आएगा।
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जब तक बिहार की बागडोर लालू और राबड़ी देवी के हाथ में थी, तब तक विकास का काम वहां इतना कम हुआ कि बिहार और भी पिछड़ गया। यह वह जमाना था, जब लाइसेंस राज की समाप्ति के कारण भारत की अर्थव्यवस्था में बहार आई थी। अन्य राज्यों में निवेशकों की कतार लगी हुई थी, लेकिन बिहार में नहीं, क्योंकि वहां न तो कानून-व्यवस्था का हाल अच्छा था और न सुशासन दिखता था। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद बिहार की अर्थव्यवस्था ऐसी दौड़ने लगी कि एक दो वर्ष तो बिहार की विकास दर अन्य राज्यों से आगे थी। कानून-व्यवस्था में भी सुधार आ गया था, क्योंकि नीतीश ने बिहार के तमाम माफिया तत्वों को जेल में बंद कर दिया था। इन लोगों में कुछ ऐसे बाहुबली भी हैं, जो लालू यादव और उनके परिजनों के दोस्त माने जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के बीच जब मैं पटना गई थी, तो ऐसे कई लोग मिले थे, जिन्होंने चिंता व्यक्त की थी कि लालू यादव की वापसी से फिर से जंगल राज आ जाएगा। इस बारे में सोचकर भी नीतीश कुमार ने यह कदम उठाया होगा।
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सो अब बिहार में क्या होने वाला है? पहली बात यह कि नीतीश विकास और परिवर्तन लाने की पूरी कोशिश करेंगे और इस काम में केंद्र सरकार का पूरा समर्थन उन्हें मिलेगा। पर लालू यादव इस नेक काम में रोड़ा बन सकते हैं। वह बिहार के गांवों में घूमकर लोगों के सामने साबित करनेवाले हैं कि उनके और उनके परिवार के साथ-साथ जनता के साथ भी घोर अन्याय हुआ है, क्योंकि जो जनमत मिला था, उसकी परवाह न करके नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ दोबारा हाथ मिलाया है। बिहार को जितनी जरूरत असली विकास और परिवर्तन की है, उतनी शायद ही किसी अन्य राज्य को होगी। यह विकास लाकर दिखाना नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन केंद्र सरकार की सहायता से बिहार में अच्छे दिन लाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।