समग्र वार्ता का सुनहरा मौका
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भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के 24 अगस्त को इस्लामाबाद में मिलने की घोषणा स्पष्ट संकेत है कि दोनों देश संबंधों पर जमी गर्द खत्म करने और द्विपक्षीय रिश्ते को मजबूत बनाने को लेकर संजीदा हैं। प्रस्तावित बैठक उस विवाद के खत्म होने का भी सूचक है, जो हाल ही में वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार वेद प्रताप वैदिक द्वारा लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद के इंटरव्यू के बाद उपजा था। उस विवादित इंटरव्यू की वजह से न सिर्फ सांसदों को उग्र होते देखा गया, बल्कि मीडिया और विपक्ष के एक वर्ग द्वारा गैरजिम्मेदार भड़काऊ टिप्पणी भी की गई थी। हालांकि अब दोनों देश कह रहे हैं कि 'हम संबंधों को इससे ऊपर ले जाएंगे', पर यह कैसे होगा, अब तक स्पष्ट नहीं है।
पड़ोसी देश के साथ संबंधों में गर्माहट लाने की गंभीर कोशिश विगत मई से तब शुरू हुई, जब नरेंद्र मोदी ने नवाज शरीफ को शपथ ग्रहण समारोह का बुलावा भेजकर दोनों तरफ सबको चौंका दिया था। पहले इस्लामाबाद और फिर थाइलैंड के चिआंग मई में संपन्न ट्रैक-II की हालिया बैठकों में भारतीयों के एक बड़े समूह ने भी पहली बार महसूस किया कि वैचारिक और संस्थागत पूर्वाग्रह से हटकर पाकिस्तानी नरेंद्र मोदी की सकारात्मक पहल के निहितार्थ को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
वहां के कट्टरपंथियों में हालांकि मोदी को लेकर संशय बना हुआ है और दिल्ली यात्रा के दौरान कश्मीर सहित पाकिस्तान से जुड़े अन्य मुद्दों को खुलकर न उठा पाने के लिए वे अपने प्रधानमंत्री की आलोचना भी करते रहे हैं। पर नवाज शरीफ की वतन वापसी के बाद मोदी की उत्साहवर्धक चिट्ठी ने कट्टरपंथियों को निरुत्तर कर दिया।
बेशक अभी माहौल सकारात्मक है, पर यह याद रखने की जरूरत है कि दोनों देशों की सत्ताधारी पार्टियों की राजनीतिक क्षमता में फर्क होने के कारण शांति स्थापित करने की पिछली कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं। वर्ष 1998 में जब राजनीतिक रूप से मजबूत अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान पहुंचे थे, तब पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार सेना को अपने साथ जोड़ने में विफल रही। उसका नतीजा कारगिल युद्ध के रूप में सामने आया था। इसी तरह, सत्ता के शुरुआती दौर में परवेज मुशर्रफ बेहद शक्तिशाली थे, क्योंकि वह राष्ट्रपति के साथ सेना प्रमुख भी थे, लेकिन तब भारत में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कमजोर यूपीए सरकार द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने का साहस नहीं जुटा सकी। 1980 के दशक के मध्य के बाद पहली बार देश में एक मजबूत सरकार दिख रही है। मोदी को पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ने का राजनीतिक बहुमत भी प्राप्त है। पर भारत के साथ संबंध सामान्य बनाने को लेकर पाकिस्तान सेना क्या अपने प्रधानमंत्री का साथ देगी?
ट्रैक-II की बैठक में ही पाकिस्तानी विश्लेषकों की आशंका समझ में आ गई थी। वे सोचते हैं कि भारत बातचीत की प्रक्रिया में दो 'टी' यानी टेररिज्म (आतंकवाद) और ट्रेड (व्यापार) को महत्व देकर कश्मीर की अनदेखी करना चाहता है। यह वे भी जानते हैं कि द्विपक्षीय व्यापार पर सहमति बनाना वक्त का तकाजा है, पर कश्मीर मुद्दे को अलग कर बातचीत की किसी भी कोशिश को पाकिस्तान में कभी मान्यता नहीं मिलेगी। ऐसी किसी भी वार्ता की सफलता पर पाकिस्तानियों को इसलिए भी संदेह है, क्योंकि भारत 'समग्र वार्ता' वाले फॉर्मूले की, जिसमें कश्मीर सहित सभी मुद्दों पर एक-एक कर चर्चा की बात कही जाती है, उपयोगिता खोने और उसे खत्म करने की बात कहता है। समग्र वार्ता के प्रति भारत की उदासीनता उसकी मुश्किलों को लेकर नहीं, बल्कि इसलिए थी, क्योंकि पूर्व की मनमोहन सरकार पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का मजबूत हाथ बढ़ाने के लिए जरूरी राजनीतिक विश्वास खो चुकी थी।
ऐसा नहीं है कि भारत पाकिस्तान के साथ समग्र बातचीत का इच्छुक नहीं है। कश्मीर पर नई दिल्ली का नजरिया ठोस है और इस मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ बातचीत टालने का कोई कारण नहीं है। इस मुद्दे पर बैठकों के कई दौर पहले भी हो चुके हैं, जिसमें बाद की कई बैठकें फलदायी भी रहीं। लिहाजा मोदी सरकार पहले उन सभी बैठकों के परिणामों की समीक्षा करे और तभी यह फैसला ले कि वार्ता का स्वरूप क्या होगा और उसमें कश्मीर और आतंकवाद जैसे मुद्दे जोड़े जाएंगे या नहीं। इस कड़ी में 'क्षेत्रीय यथास्थिति और सॉफ्ट बॉर्डर' जैसी यूपीए सरकार की पहल पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है।
द्विपक्षीय कारोबार की बात करें, तो भेदभाव रहित बाजार उपलब्ध कराने और भारतीय सामान की पहुंच पाकिस्तानी बाजारों तक सुनिश्चित कराने जैसी पुरानी मांगों का हल निकालकर दोनों देशों ने चुनाव से पहले एक अनौपचारिक समझ विकसित कर ली थी। थिंपू में हो रही साफ्टा की बैठक में दोनों देशों के वाणिज्य मंत्री इस समझ के आधार पर अगर किसी ठोस समझौते तक पहुंचते हैं, तो दोनों देशों को इससे फायदा होगा। संबंध प्रगाढ़ करने का आसान तरीका यही होगा कि बिना किसी टालमटोल के समग्र वार्ता की बहाली की ओर कदम बढ़ाया जाए।
पाकिस्तान की जमीन से भारत पर हो रही आतंकी कार्रवाई बेशक एक बड़ी चुनौती है, पर पिछले कुछ वर्षों से जमीनी हालात में हो रहे सुधार की भी अनदेखी नहीं कर सकते। पाकिस्तान के भीतर बढ़ती आतंकी हिंसा और नागरिक-सैन्य संबंधों में बढ़ते असंतुलन से साफ है कि निकट भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी राजनीतिक सफलता नहीं मिलने वाली। पर मोदी सरकार चाहे, तो व्यापार, ऊर्जा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के मोर्चे पर बेहतर संबंध बनाकर दोनों तरफ उम्मीद पैदा कर सकती है।
(लेखक शिव नडार यूनिवर्सिटी में सीनियर फेलो हैं)