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स्वच्छ ऊर्जा: जब पूरी दुनिया खुली हवा में लेगी सांस...आईईए ने बंधाई उम्मीद
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सांकेतिक तस्वीर
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सोशल मीडिया
विस्तार
समूची मानवता के लिए खतरा बन चुकी ग्लोबल वार्मिंग पूर्व-औद्योगिक स्तरों के मुकाबले 1.3 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जुलाई, 2023 अब तक का सबसे गर्म महीना दर्ज किया गया और यह पिछले करीब सवा लाख वर्षों में सबसे गर्म महीना था। तो दूसरी तरफ क्लाइमेट सेंट्रल द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर, 2022 से अक्तूबर, 2023 तक वैश्विक ताप ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। यह अब तक के इतिहास में 12 महीनों की सबसे गर्म अवधि रही। इस अवधि में 170 देशों में औसत तापमान 30 साल के पैमाने से ज्यादा हो गया। इस दौरान 7.8 अरब लोग यानी दुनिया की तकरीबन 99 फीसदी आबादी औसत से ज्यादा गर्म माहौल में रहने को मजबूर हुई।
मगर इसके बीच उम्मीद की एक नई किरण जगमगाई है, जो यह संदेश दे रही है कि मौजूदा नीतियों के चलते वर्ष 2030 तक सौर पैनल, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक कार और हीट पंप जैसी क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में तेजी से हो रही बढ़ोतरी से ऊर्जा जगत में काले कार्बन उत्सर्जन से धूमिल हो चुकी दुनिया की तस्वीर साफ होकर चमकने वाली है। इससे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर विश्व की एक बड़ी आबादी को भी राहत मिलेगी।
गौरतलब है कि दुनिया में घातक हीटवेव, सूखा, दावानल, तूफान और बाढ़ से जीवन और आजीविका को नुकसान हो रहा है। पूरे विश्व के लिए एक व्यापक समस्या बन चुकी ग्लोबल वार्मिंग से कोई भी देश बच नहीं सका है। तमाम शोधों के बाद अब इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि यह जलवायु परिवर्तन की देन है। वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन, जिसमें से करीब 90 फीसदी जीवाश्म ईंधन से होता है, वह 2021-2022 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया।
जिस तरह पूरी दुनिया में आबादी बढ़ रही है और हर देश विकास की दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करने को आतुर है, उससे फिलहाल गर्माती पृथ्वी को राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। लेकिन अब इस अंधकार को दूर कर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक 2023 रिपोर्ट उम्मीद की नई किरण दिखा रही है। इसके मुताबिक, मौजूदा पॉलिसी सेटिंग्स (स्टेप्स) के आधार पर आईईए ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2030 तक पूरी दुनिया में सड़कों पर आज के मुकाबले करीब 10 गुना ज्यादा इलेक्ट्रिक कारें दौड़ेंगी। सोलर पीवी से इतनी ज्यादा बिजली पैदा होगी, जितनी कि अमेरिका की पूरी ऊर्जा प्रणाली इस वक्त उत्पन्न नहीं कर पाती है।
इस दशक के अंत तक विश्व में प्रति वर्ष 1,200 गीगावाट से ज्यादा सोलर पैनल के निर्माण की क्षमता होगी। पर 2030 तक सिर्फ 500 गीगावाट उत्पादन क्षमता को ही स्थापित किए जाने का अनुमान है। वैश्विक स्तर पर उत्पन्न होने वाली कुल बिजली में अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पैदा होने वाली बिजली की हिस्सेदारी मौजूदा 30 फीसदी के स्तर से बढ़कर 50 प्रतिशत के करीब पहुंच जाएगी। सोलर हीट पंप तथा अन्य साफ इलेक्ट्रिक हीटिंग प्रणालियों की बिक्री पूरी दुनिया में जीवाश्म ईंधन से चलने वाले ब्वॉयलर की बिक्री से ज्यादा हो जाएगी। यही नहीं, कोयले और गैस से चलने वाले संयंत्र के मुकाबले नई अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश तीन गुना ज्यादा हो जाएगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी पिछले कई दशकों से 80 फीसदी पर टिकी है, जो 2030 तक घटकर 73 फीसदी हो जाएगी।
दुनिया यदि दशक के अंत तक 800 गीगावॉट नई सौर पीवी क्षमता की स्थापना के लक्ष्य को हासिल कर लेती है तो, 2030 में चीन में कोयला आधारित बिजली उत्पादन में 20 फीसदी की और कमी आएगी। आंकड़ों की नजर से देखें, तो पूरी दुनिया में 2030 तक पर्यावरण की एक सकारात्मक तस्वीर दिखने की पूरी उम्मीद है। लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं, जिनका समाधान ढूंढना होगा। वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए मजबूत नीतियों की आवश्यकता भी होगी।
सोलर, विंड, बायो ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे क्लीन एनर्जी सिस्टम दुनिया को जीवाश्म ईंधन से दूर ले जा रहे हैं। पर, जिस तरह यह दशक कोयले, तेल व प्राकृतिक गैस की वैश्विक मांग के चरम पर पहुंचने का गवाह रहा, उससे चिंता पैदा होनी ही चाहिए।
carbon black world