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वैश्विक संकट और स्थानीय चुनौतियां: चिंताएं अब असल में दिखने लगीं, सबसे ज्यादा मार गरीबों पर ही

Thu, 21 May 2026 06:22 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Thu, 21 May 2026 06:22 AM IST
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सार
पश्चिम एशियाई संकट के दौर में छोटे किसानों व करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों के हितों के मद्देनजर लक्षित सहायता उपाय भी जरूरी हैं।
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भारत में दिखने लगा पश्चिम एशिया संकट का असर - फोटो : PTI

विस्तार

हममें से जो लोग घूम-घूमकर आम भारतीयों से बातचीत करते हैं, वे काफी समय से पश्चिम एशिया के संकट को लेकर जिन चिंताओं की बात कर रहे थे, वे अब असल में दिखाई पड़ने लगी हैं। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी संकट की गंभीरता को देखते हुए देशवासियों से ईंधन की खपत कम करने, सार्वजनिक परिवहन और वर्क फ्रॉम होम (घर से काम करना) को बढ़ावा देने की अपील की। विदेशी मुद्रा भंडार की रक्षा के लिए उन्होंने एक वर्ष तक सोना न खरीदने और गैर-जरूरी विदेश यात्राओं पर रोक लगाने का अनुरोध किया। साथ ही, खाद्य तेल और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की अपील की, ताकि आयात और सब्सिडी का बोझ कम हो सके। उन्होंने स्वदेशी उत्पादों को अपनाने पर भी जोर दिया और इन कदमों को वैश्विक संकटों के खिलाफ भारत की ‘आर्थिक आत्मरक्षा’ बताया।


प्रधानमंत्री की अपील ने मुझे राजस्थान के भरतपुर में किसानों से हुई बातचीत की याद दिला दी। दस बीघा जमीन वाले एक गेहूं उत्पादक किसान ने कहा कि उसे उर्वरकों की कमी का डर है और वह सरसों तथा आने वाले खरीफ मौसम के लिए पहले से उर्वरक का ‘भंडारण’ कर रहा है। उसने कहा, ‘पता नहीं कि आगे क्या होने वाला है।’ उसे हर चीज की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी का डर सता रहा था। इस वर्ष अप्रैल में, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो प्रेरणा गांधी के एक लेख में यह बात सामने आई कि तेल की तुलना में दूसरे रास्तों से गैस की आपूर्ति ज्यादा मुश्किल है। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू रिफाइनरियों को फिर से व्यवस्थित करके घरेलू एलपीजी उत्पादन में लगभग 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि, एलएनजी पर निर्भरता अब भी बनी हुई है, क्योंकि सिटी गैस वितरण, उर्वरक संयंत्रों और कांच/सिरेमिक उद्योगों का एक बड़ा हिस्सा एलएनजी पर ही निर्भर है। भारतीय उर्वरक संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाली 86 फीसदी एलएनजी पश्चिम एशिया से आती है। इसकी आपूर्ति में बाधा खरीफ की फसल को खतरे में डाल सकती है। भारत अब जॉर्डन और मिस्र से फॉस्फेट आयात कम करके मोरक्को, सेनेगल और रूस की ओर रुख कर रहा है। साथ ही, अमोनिया की जरूरतों का लगभग 60 फीसदी हिस्सा तथा सल्फर आधारित उर्वरकों का 70 फीसदी सऊदी अरब व ओमान से खरीदता है। ये दोनों ही किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।


प्रधानमंत्री ने संयम बरतने की यह अपील तब की है, जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं पहले से ही कमजोर बनी हुई हैं और लाल सागर क्षेत्र में जारी बाधाओं ने माल ढुलाई की लागत व महंगाई को बढ़ा दिया है। पहले ही मानसून की अनिश्चितता और खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे ग्रामीण परिवार इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे। ऐसे में, छोटे किसानों और करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों की सुरक्षा के लिए लक्षित सहायता उपाय जरूरी हैं। इसमें जैविक कृषि इनपुट को बढ़ावा देना, स्थानीय स्तर पर उर्वरक उत्पादन और चरणबद्ध तरीके से सब्सिडी सुधार शामिल हो सकते हैं। बेशक स्थिति गंभीर है, पर निराशा विकल्प नहीं है।

अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री की अपील के मद्देनजर चुने हुए प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी खुद मिसाल कायम करते दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों से वर्क फ्रॉम होम अपनाने की अपील की है, लेकिन हर कोई घर से काम नहीं कर सकता। ऐसे में गिग वर्कर्स, डिलीवरी कर्मियों, निर्माण मजदूरों और किसानों का क्या होगा? हर संकट में, सबसे ज्यादा मार गरीबों पर ही पड़ती है। भारत की अर्थव्यवस्था असंगठित क्षेत्र पर टिकी है, जिसमें लाखों दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के अनुसार, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में सामने आया कि 2024 में आत्महत्या करने वालों में 31 फीसदी दिहाड़ी मजदूर थे, जो पिछले एक दशक में सर्वाधिक है। 2024 में कुल 52,910 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की। हालात पहले से ही ठीक नहीं थे, युद्ध ने और उसे भी बदतर बना दिया।

इसमें संदेह नहीं कि भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, पर वह युवाओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा नहीं कर पा रही। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग में स्नातक बेरोजगारी दर लगभग 40 फीसदी और 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग में करीब 20 फीसदी है। भारत की जनता बड़े-बड़े संकटों को झेलती आई है, लेकिन वर्तमान स्थितियों को देखते हुए उनमें भरोसा कायम करना जरूरी है।
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