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देने वाला मांग रहा है
सहीराम
Updated Wed, 08 Jul 2015 08:46 PM IST
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यह मांग उस तरह नहीं उठी, जिस तरह मजदूरी बढ़ाने के लिए उठती है। वैसे हायर ऐंड फायर के इस जमाने में अब वह भी कहां उठती है? यह मांग उस तरह भी नहीं उठी, जिस तरह किसान अपनी फसल की अधिक कीमत के लिए उठाते हैं। यह जवान होते बच्चे द्वारा अपना जेबखर्च बढ़ाने की मांग जैसी भी नहीं है। उस तरह भी यह मांग कतई नहीं की गई, जैसे कोई बीवी के हाथ में तनख्वाह पकड़ाते हुए महंगाई का रोना रोकर अपना ऑफिस खर्च बढ़ाने की मांग करता है। हालांकि इस मांग के साथ समस्या यह भी है कि महंगाई का रोना आखिर किसका ज्यादा जेनुइन माना जाए? घर चलाने में हलकान होती बीवी का या चाय और पान के लिए मियां का?
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यह मांग वैसे ही उठी है, जैसे किसी खाऊ का पेट भरने के बाद भी मन तृप्त न हो तथा वह और मांगने लगे। पर यहां मांगनेवाले का कोई मालिक नहीं है। न कोई दाता है। यहां तो वे खुद ही मालिक हैं। खुद ही दाता हैं। वे हमारे भाग्य विधाता हैं। पूरा देश उनसे मांगता है। वे किससे मांगें? सो वे खुद से ही मांगते हैं। जी नहीं, वे वैसे नहीं मांग रहे, जैसे खर्चा-पानी मांगा जाता है, जैसे चंदा मांगा जाता है। जो मांगा जा रहा है, कायदे से मांगा जा रहा है। बाकायदा डिमांड की जा रही है।
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पर अभी तो कर्मचारियों ने उनसे नए वेतन आयोग की मांग भी नहीं की है। पर देखिए, हमारे सांसदों और विधायकों ने अपना वेतन बढ़ाने की मांग कर दी। अभी तो बेचारे पूर्व सैनिक, वन रैंक-वन पेंशन की ही मांग कर रहे हैं और सरकार कह रही है उनकी मांग बड़ी जटिल है। उसका जल्दी हल नहीं निकल सकता। पर सांसदों और विधायकों की मांग तो बिल्कुल सीधी है। वे कह रहे हैं अमेरिका को देखो, यूरोप को देखो। वहां जनप्रतिनिधियों को कितनी सुविधाएं मिलती हैं। कोई उनसे यह न कहे कि गरीब को देखो, गांव को देखो, जिनकी किस्मत आज तक नहीं बदली है। वे कह रहे हैं कि हम तो अपने यहां आनेवाले लोगों को चाय भी नहीं पिला सकते। उनका सत्कार भी नहीं कर पाते। पर गरीब की कौन सुने? सांसदों और विधायकों की ही सुनो। भले ही वे हमारी सुनें, न सुनें।
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