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खामोशी तोड़ती लड़कियां

Tue, 03 Oct 2017 09:56 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Tue, 03 Oct 2017 09:56 AM IST
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Girls breaking silence
बीएचयू विरोध प्रदर्शन

हर बादल में आशा की एक किरण छिपी रहती है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में छात्राओं का हालिया विरोध प्रदर्शन भी भारत में स्वागतयोग्य बदलते रुझान का संकेत है-युवा लड़कियां और महिलाएं डंडे से लैस वर्दीधारी पुरुषों के साथ-साथ सत्ता से आंखें मिलाकर एक रुढ़िवादी माहौल में एक बात स्पष्ट रूप से कहना चाहती हैं, कि उन्हें भी युवाओं की तरह बराबर अधिकार है। और यह कि वे 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' को एक शिक्षण संस्थान के भीतर  चुप रहने के आदेश के तौर पर नहीं लेंगी, कि वे खुद को अन्याय, अपमान, लैंगिक भेदभाव और छेड़छाड़ का शिकार नहीं होने देंगी।


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हर कोई यह जानता है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में क्या हुआ और राज्य प्रशासन विरोध प्रदर्शन कर रही लड़कियों को धमकी देने के बावजूद परेशान हो गया। बनारस में जो कुछ हुआ, वह एक राष्ट्रीय प्रवृत्ति का हिस्सा है। देश भर की युवा लड़कियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर उनके साथ छेड़छाड़ हुई, तो वे चुप नहीं बैठेंगी, कि वे अपने साथ होने वाले हर अन्याय के खिलाफ बोलेंगी, चाहे उसका नतीजा जो भी हो।

एक ऐसे देश में, जो अब भी पितृसत्तात्मक मूल्यों में जकड़ा हुआ है और जहां लैंगिक पूर्वाग्रह अब भी एक आदर्श है, सामंती सामाजिक संरचनाओं एवं यथास्थिति के खिलाफ हुआ यह मूक विद्रोह दिल को खुश करने वाला है। खासकर तब, जब विरोध करने वाली ये लड़कियां सिर्फ महानगरीय शहरों या समाज के विशेषाधिकार प्राप्त तबके से नहीं हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन की वजह क्या थी? यह विरोध प्रदर्शन एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना पर गैरजिम्मेदाराना रवैये के खिलाफ था। उनकी मांग थी कि हमें उपदेश नहीं, सुरक्षा प्रदान की जाए। जहां तक हॉस्टल के नियमों और सुविधाओं की बात है, उन्हें भी वे सब अधिकार दिए जाएं, जो लड़कों के हॉस्टल में दिए जाते हैं। शायद ही कोई इन मुद्दों को क्रांतिकारी एजेंडा कहेगा।

लेकिन इस विरोध प्रदर्शन का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है और यह रूढ़िवादी भारत को संबोधित था, जिसने महिला शिक्षा और कुछ हद तक रोजगार बाजार में महिलाओं की आकांक्षाओं को स्वीकार कर लिया है, लेकिन जो अब भी महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विकल्प को स्वीकार करने के मामले में अनिच्छुक है। जो इस मामले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दावे के मामूली संकेत को भी कुचल देना चाहता है।

लेकिन अपने अधिकारों के लिए केवल उत्तर प्रदेश में ही युवा लड़कियां या महिलाएं खड़ी नहीं हो  रही हैं, बल्कि कुछ समय पूर्व हरियाणा के रेवाड़ी जिले के सुमा खेड़ा गांव में किशोर उम्र की लड़कियों ने स्कूल जाते वक्त लड़कियों पर हुए हमले और बलात्कार की खबर के बाद विरोध प्रदर्शन किया था। इससे गांव के लोगों ने सुरक्षा के भय से लड़कियों को स्कूल जाने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया। हालांकि लड़कियों ने गांव वालों के निर्देश को चुपचाप मानने से इन्कार कर दिया। उन्होंने मांग रखी कि उनके गांव के स्कूल को अपग्रेड करके हाई स्कूल में तब्दील कर दिया जाए, ताकि वे अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। विरोध कर रही किशोर उम्र की लड़कियों में से एक ने बताया था कि अगर सरकार हमारे गांव के स्कूल को बारहवीं तक अपग्रेड नहीं कर सकती, तो हम लोग अनपढ़ रहेंगे! आखिरकार तीन हफ्ते के विरोध प्रदर्शन के बाद राज्य प्रशासन उनकी मांग मानने के लिए तैयार हो गया। हरियाणा के कम से कम आधे दर्जन गांवों की स्कूली लड़कियों ने अपने मूलभूत अधिकार (शिक्षा का अधिकार) के लिए विरोध प्रदर्शन किए। हरियाणा की उन किशोरवय लड़कियों के विरोध का सकारात्मक परिणाम आया। हरियाणा सरकार ने 122 स्कूलों को अपग्रेड करने की मंजूरी दे दी।

प्रदर्शन कर रही छात्राओं की मांग पर जबाव देते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि 'जब उनके हॉस्टल में वाई-फाई की सुविधा है, तो उन महिला छात्राओं को साइबर लाइब्रेरी तक जाने की क्या जरूरत है? यदि बेटियों के साथ कुछ होता है, तो उसका जवाबदेह कौन है? लड़कों और लड़कियों की सुरक्षा कभी बराबर नहीं हो सकती। अगर हम हर लड़की की मांग सुनने लगे, तो हम विश्वविद्यालय को नहीं चला पाएंगे। महिला हॉस्टल में जितने भी नियम लागू हैं, वे सभी छात्राओं की सुरक्षा के लिए हैं, वे लड़कियों के हित को ध्यान में रखकर लागू किए गए हैं।'

ऐसे बयान असामान्य नहीं हैं। हमारे देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में उच्च पदों पर बैठे लोग वास्तव में मानते हैं कि महिलाओं और युवा लड़कियों को नियंत्रित करना, समान अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उनकी मांग पर रोक लगाना सही है और समाज के हित में है। ऐसी मानसिकता असल में पितृसत्तात्मक समाज के लिए मददगार है, लेकिन यह राष्ट्रहित के खिलाफ है। कोई भी राष्ट्र अपनी आधी आबादी का मुंह बंद करके और उसे अपनी बात कहने की अनुमति न देकर आगे नहीं बढ़ सकता।

यह सही है कि आज भी बहुत-सी लड़कियों को जन्म लेने की इजाजत नहीं मिलती है और कन्या भ्रूण की हत्या की जाती है। लाखों ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें प्राइमरी स्कूल तक भी पढ़ाई की इजाजत नहीं मिलती है या अट्ठारह वर्ष से पहले ही जबरन पढ़ाई छुड़ाकर उनकी शादी कर दी जाती है। बहुत-सी कम उम्र की महिलाएं बच्चे को जन्म देते वक्त अकाल मौत का शिकार बन जाती हैं। सामाजिक नियमों की खातिर बहुत-सी लड़कियों के सपने कुचल दिए जाते हैं। लेकिन इसे देखते हुए, देश की अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त युवतियों और महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता यह दर्शाती है कि शिक्षा (चाहे वह दोषपूर्ण है) का कुछ हद तक असर पड़ रहा है। इस त्योहारी मौसम में जश्न मनाने की यह एक वजह हो सकती है।

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