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कमर कसिए, बजट आ गया

Wed, 27 Feb 2013 12:52 PM IST
शरद उपाध्याय
शरद उपाध्याय Updated Wed, 27 Feb 2013 12:52 PM IST
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get ready, budget has come

लीजिए एक बार फिर बजट आ गया। जब वो आ ही गया है, तो भला कोई क्या कर सकता है। 'बजट' शब्द से मैं काफी समय से परेशान रहता हूं। इसके बारे में लाख सोचता हूं, पर इसकी व्याख्या करने में खुद को असमर्थ पाता हूं। जीवन के अनेक अवसरों पर बजट बनाते समय, मैंने इसे सीमाओं में बांधने का प्रयास किया, किंतु हर बार विफल रहा।

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बजट के व्यय की निश्चित मदें कुछ और रहीं, लेकिन व्यय किसी और पर हुआ। जरूरतें अगले बजट सत्र के लिए टलती रहीं। कई तो ऐसी रहीं, जो दसियों बजट के बाद भी पूरी नहीं हुईं और अंततः कालचक्र के भंवर में फंसकर समाप्त हो गईं। देश की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा के आसपास ही निवास करती है। बजट के आक्रमण से वे पस्त हो जाते हैं, पर क्या करें। यहां आध्यात्मिक पृष्ठभूमि हमारी मदद करती है। लोगों को दुःखों में सुख ढूंढने की अदभुत कला आती है।
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जनता के सुख बहुत छोटे-छोटे से है। महंगाई से त्रस्त शर्माजी खुश हैं कि चलो अच्छा है कि शक्कर के दाम बढ़ने से पहले ही पांच किलो शक्कर ले आया हूं। गाड़ी में पेट्रोल भी भरा हुआ है और परचूनी सामान भी काफी है। बजट के दिनों का चिंतन सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है। व्यक्ति छोटी से छोटी बातों का चिंतन करता है। उसके आर्थिक ज्ञान में आश्चर्यजनक वृद्धि हो जाती है। वह प्रत्येक उन बातों के संदर्भ में, जिस पर वह टैक्स कम करना चाहता है, तर्क जुटाता रहता है। वह प्रार्थना करता है कि जिन चीजों को वह भविष्य में खरीदना चाहता है, उनके टैक्स में वृद्धि न हो।
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‘न्यूनतम आवश्यकता प्रोग्राम’ हमारे समाज का व्यावहारिक दर्शन है। संतोषं परम सुखम् का दर्शन हमें विरासत में मिला है। प्रत्येक बजट पर हमारा बजट बिगड़ जाता है, किंतु हम कुछ कर नहीं पाते। इस बार पुनः बजट आ रहा है, किंतु दिनचर्या में कोई फर्क नहीं आएगा।


दूसरे दिन की सुबह, आम सुबहों से कुछ अलग होगी। दूसरे से उधार मांगने का चरित्र भले ही हमारी सरकार का हो, लेकिन आम लोगों का नहीं है। इसलिए बजट में अपने ही व्ययों में कटौती की जाएगी। स्कूटर कम चलाए जाएंगे, चाय की मात्रा घट जाएगी, नए कपड़े नहीं खरीदे जाऐंगे। विलासिता का त्याग करना होगा। इस बजट के बाद यह सब कुछ होगा, आखिर पेट तो भरना ही है। सो कमर कस लीजिए, बजट आ गया है।

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