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जिंदगी के रेस्तरां में कुछ आपसदारी तो है!

Sat, 08 Feb 2014 10:53 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 08 Feb 2014 10:53 PM IST
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gazal book review

फारसी की चर्चित विधा गजल का भारत से रिश्ता तेरहवीं सदी में अमीर खुसरो के साथ बना। इसके शेरों की संक्षिप्तता, सादगी, सुनते ही सीधे दिल में उतर जाने की खूबी और कुल मिलाकर गजल से पैदा होने वाली करुणा के कारण शुरुआत से ही यह खूब पसंद की जाने लगी।

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आधुनिक भारत की प्रगतिशील कविता जितने पुरअसर तरीके से फैज अहमद फैज, अली सरदार जाफरी, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी, मजाज, मख्दूम मोहिउद्दीन आदि की नज्मों, गजलों और रचनाओं में है, उतने प्रभावी तरीके से नागार्जुन, त्रिलोचन और नरेंद्र शर्मा जैसों की हिंदी कविताओं में नहीं है। हिंदी फिल्मों का सौ साल का सफर उतना सुरीला नहीं होता, अगर उसमें साहिर और कैफी के अलावा शकील बदायूंनी और हसरत जयपुरी जैसे गीतकारों का साझा न होता। यह गजल के असर का ही सुबूत है कि दुष्यंत कुमार का 'साये में धूप' मोहभंग पर हिंदी की दर्जनों लंबी कविताओं पर भारी पड़ता है। एस.सी.चतुर्वेदी की किताब, कारवां-ए-गजल, गजल की नई जमीन नहीं तोड़ती, बल्कि इसमें वली दक्कनी से लेकर बशीर बद्र तक उन तमाम गजलगो की एक-दो गजलें हैं, जिनके आधार पर भारत में गजलों की पूरी परंपरा के बारे में संक्षिप्त में जाना जा सकता है।
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गजल के दिल्ली स्कूल के तीनों नामचीन-ख्वाजा मीर दर्द, मीर तकी मीर और सौदा यहां हैं, तो गालिब, मोमिन, बहादुरशाह जफर, अल्लामा इकबाल, कतील शिफाई और रामप्रसाद बिस्मिल भी यहां हैं। हालांकि एक या दो गजलों के आधार पर किसी की रचनात्मकता को नहीं आंका जा सकता, लेकिन वली दक्कनी की ठेठ प्रयोगवादी गजल से लेकर ख्वाजा मीर दर्द और नजीर अकबराबादी की अलंकृत गजलों को यहां साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है, जहां चमत्कार पर ज्यादा जोर है। नासिर काजमी की छोटी बहर वाली गजल ध्यान खींचती है, तो इब्ने इंशा की वह चर्चित गजल, कल चौदहवीं की रात थी...भी यहां है, जिसे गुलाम अली ने अमर कर दिया है। अलबत्ता जावेद अख्तर, मीना कुमारी और परवीन शाकिर की गजलों के चुनाव में थोड़े और पैनेपन की दरकार थी।
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दूसरी किताब पर संग्रहकर्ता की मौलिकता की छाप दिखती है, जहां उन्होंने अलग-अलग वस्तुओं और मनोभावों पर बेहतरीन अशआर चुन-चुनकर इकट्ठा किए हैं। यहां आईना, चराग, दहलीज, किताब, रौशनी, पत्थर और फूल पर कुछ चुनिंदा शेर हैं, तो खुशी, मौत, आंसू और जिंदगी पर भी। जिंदगी के रेस्तरां की यही आपसदारी तो विविधता लाती है। इन किताबों से सुविधा यह है कि पाठकों को एक ही जगह एक विषय पर कई शेर एक साथ मिल जाते हैं। यह प्रयास अच्छा है।

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