फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Gandhi is still our strength, put his 50 years for the nation

गांधी आज भी हमारी ताकत, इस तरह देश को किया था जागृत

Sat, 30 Jan 2021 03:11 AM IST
सुरेश भाई सुरेश भाई
सुरेश भाई Published by: सुरेश भाई Updated Sat, 30 Jan 2021 03:11 AM IST
विज्ञापन
Gandhi is still our strength, put his 50 years for the nation
गांधी जी
महात्मा गांधी ने अपने जीवन के 50-60 वर्ष देश की सेवा में लगाए। आजादी के संघर्ष में कांग्रेस में नरम और गरम, दोनों तरह के नेता थे। लेकिन वे सभी गांधी को ही अपना नेता और मार्गदर्शक समझते थे। इस लंबे संघर्ष के चलते जब 1947 में आजादी मिली, तो गांधी का सपना था कि यदि वे 125 वर्ष तक जिंदा रहे, तो वह भारत के गांव को आजादी का आभास करा देंगे। गांधी का यह सपना 30 जनवरी, 1948 के बाद साकार नहीं होने दिया गया। मगर तब से सत्य और अहिंसा का उनका विचार पूरी दुनिया में बहुत तेजी से फैला। देश में 1922 के बाद जगह-जगह विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई थी। इस पर कई लोग उन्हें यंत्र विरोधी कहने लगे। इस पर गांधी का कहना कहना था कि हमारा शरीर भी एक जटिल मशीन है, क्या मैं इसका विरोध कर सकता हूं? उन्होंने स्वयं कपड़ा तैयार कर उसका इस्तेमाल करने की सलाह दी थी और चरखे के पक्ष में यह तर्क पेश किया था कि इससे करोड़ों लोगों को आजीविका मिलेगी। 

loader

1918 में अहमदाबाद में मिल मालिकों और मजदूरों के बीच मंहगाई भत्ते की दर को लेकर विवाद हुआ था। गांधी ने उन्हें हड़ताल करते रहने की सलाह दी और तब-तक हड़ताल करते रहने की प्रतिज्ञा दिलवाई, जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो पाती है। इस पर कई लोगों ने गांधी पर हड़ताल के लिए दबाव बनाने का आरोप भी लगाया था। लेकिन जब इनकी हड़ताल पूरी हुई, तो सबने मजदूरों की मांगों को जायज ठहराया था। तब से आज तक मालिकों और मजदूरों के बीच विवादों के हल के लिए हड़ताल एक माध्यम बनी हुई है। इससे लोकतंत्र को भी मजबूती मिलती है। 1932 में दलितों के लिए जब अंग्रेज सरकार पृथक मतदाता मंडल की व्यवस्था कर रही थी, तो गांधी ने इसके खिलाफ उपवास किया। वह चाहते थे कि समाज में छुआछूत जैसी बीमारी को दूर करना चाहिए। उन्होंने अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों को अपने घर पर रखा। यहां तक कि दक्षिणी अफ्रीका से भारत आने पर जब उन्होंने साबरमती के किनारे आश्रम स्थापित किया, तो उन्होंने एक दलित परिवार को भी आश्रम में बसाया। इस वजह से उनके आश्रम को मिलने वाली मदद भी बंद की गई थी। गांधी जी ने अस्पृश्यता के खिलाफ आमरण अनशन के द्वारा भी जागृति लाई थी। इसके कारण देश में सैकड़ों मंदिरों में दलितों का प्रवेश कराया गया। इसके साथ ही सार्वजनिक कुएं भी दलितों को सुलभ हो पाए थे। 

वर्ष 1931 में भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे क्रान्तिकारी नेताओं को अंग्रेज सरकार द्वारा फांसी दी गई थी। फांसी रूकवाने के लिए गांधी तत्कालीन वाइसराय लार्ड इरविन से चार-पांच बार मिले और उन्हें पत्र भी लिखा था। लेकिन उन्होंने गांधी जी की एक न सुनी। लेकिन आज कई लोग आरोप लगाते हैं कि गांधी ने भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी नहीं रोकी। यह कार्य गांधी जी के बस में था भी नहीं, क्योंकि अंग्रेजों की दमनकारी नीति के खिलाफ कांग्रेस के गरम दल के नेता कुर्बान होने के लिए तैयार थे। इस पर गांधी का कहना था कि हिंसक प्रवृत्ति पर विश्वास रखने वाले लोगों की कुर्बानी भी बहादुरी है। लेकिन स्वयं हिंसा के रास्ते पर नहीं गए। सुभाष चंद्र बोस को भी गांधी ने सलाह दी थी कि वह जिस रास्ते पर चल रहे हैं, यदि उससे भी आजादी मिल सकती है, तो बधाई का सबसे पहला तार मैं भेजूंगा। पर महायुद्ध के दौरान सुभाष बाबू की मौत की खबर सुनते ही गांधी जी बहुत दुखी हुए। दोनों के बीच जो भी मतभेद रहे हों, लेकिन गांधी को राष्ट्रपिता कहने वाले भी सुभाष चंद्र बोस ही थे।

15 अगस्त, 1947 को जब दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, तो देश के कई स्थानों पर लोग विभाजन का दर्द झेल रहे थे। महात्मा गांधी दिल्ली में जश्न मनाने के स्थान पर बंगाल की गलियों में घूम-घूमकर शांति कायम करने का काम कर रहे थे। गांधी के विचार और दर्शन की तरफ दुनिया का झुकाव बढ़ा है। देश की मजबूरी है कि गांधी का स्मरण किए बिना कोई भी कार्य सफल नहीं हो सकता। गांधी हमारी ताकत हैं।

 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed