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कच्चे तेल का खेल

Tue, 03 Apr 2018 06:56 PM IST
महेंद्रबाबू कुरुवा
महेंद्रबाबू कुरुवा Updated Tue, 03 Apr 2018 06:56 PM IST
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Game of Cruide oil
महेंद्रबाबू कुरुवा

एक बार फिर कच्चे तेल की वैश्विक कीमत सुर्खियों में है। बीते 26 मार्च को कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। पिछले छह महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में 55 फीसदी की वृद्धि हुई है, जबकि अकेले जनवरी में कीमत में छह फीसदी की वृद्धि हुई है। इससे निपटने की नीतियां बनाने के लिए तीन सवालों का जवाब जानना उचित लगता है-कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि क्यों हुई। क्या लंबे समय तक उच्च कीमतें बनी रहेंगी और भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?


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तेल की कीमतों में वृद्धि के पीछे कुछ खास वजहें हैं। ओपेक ने नवंबर, 2016 में तेल उत्पादन को सीमित करने के लिए समझौता किया। ओपेक ने रूस जैसे गैर ओपेक देशों को इसमें शामिल किया और लीबिया जैसे देशों को तेल उत्पादन में व्यापक लचीलापन प्रदान किया। इन पहलों ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के लिए पर्याप्त आधार प्रदान किया और 2017 के मध्य में तेल की कीमतों में वृद्धि होने लगी। इसी समय चीन की अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई और उसने अपने ऋण का दायरा बढ़ा दिया, जिससे तेल खपत बढ़ी। वैश्विक अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटने लगी और तेल की खपत को बढ़ाया, जिसने कीमतों में वृद्धि को बल प्रदान किया। इन सबके बावजूद मौजूदा कीमत में वृद्धि के लिए अमेरिकी डॉलर की कमजोरी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
 
एक लंबे समय के बाद यह पहली बार है, जब सभी प्रमुख तेल उत्पादक देश उत्पादन में नियंत्रण और कीमतों में वृद्धि चाहते हैं। दूसरा, वैश्विक आर्थिक विकास का वर्तमान परिदृश्य तेल की कीमतों में वृद्धि के लिए अनुकूल है। ये दोनों कारक बताते हैं कि कच्चे तेल की उच्च कीमतें लंबे समय तक बनी रहेंगी।

वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत असहज महसूस कर रहा है। दिल्ली में सिर्फ जनवरी में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। आम लोगों पर बोझ बढ़ने के साथ-साथ कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। सबसे पहले तो इससे महंगाई बढ़ेगी, क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत बढ़ेगी और विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन लागत भी बढ़ेगी।

कच्चे तेल की कीमतों के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए नीति विकल्पों पर विचार करने का यही उचित वक्त है। सबसे पहले आम आदमी पर कीमतों का बोझ घटाना होगा। इसके लिए पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों पर सब्सिडी दी जा सकती है, लेकिन इससे तेल विपणन कंपनियों की बैलेंस शीट गंभीर रूप से प्रभावित होगी। इसके बजाय पेट्रोल एवं डीजल पर करों को युक्तिसंगत बनाना बेहतर होगा, जो किसी भी मानदंड से बहुत ज्यादा है। यह अल्पकालीन समाधान है। इसलिए दीर्घकालिक रणनीतियों के बारे में सोचने और तेल और इसके उत्पादन की खोज में बड़े पैमाने पर निवेश करने की आवश्यकता भी है। इसके लिए लाइसेंसिंग प्रणाली को आसान बनाना सही होगा। साथ ही भारत को चीन की तरह रणनीतिक तेल भंडार बनाने की जरूरत है। लेकिन तेल की कीमतों में वृद्धि को सकारात्मक ढंग से भी देखना चाहिए। इसका मतलब है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और उपभोक्ता मांग में वृद्धि हो रही है। यह भारतीय निर्यात के लिए अच्छी खबर है। और भारत को अपनी निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार करने की तरफ ध्यान देना चाहिए।

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