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G20: सिर्फ चकाचौंध काफी नहीं, एजेंडा पूरा करने के लिए बदलनी होंगी नीतियां या सरकार

Sun, 17 Sep 2023 06:48 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 17 Sep 2023 06:48 AM IST
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सार
सरकार खुद को पीठ ठोंकने वाले अंदाज में पेश तो कर रही है, पर आंकड़ों की मानें, तो पता चलेगा कि जिन एजेंडों की घोषणा हो रही है, उन्हें पूरा करने के लिए या तो सरकार को नीतियां बदलनी होंगी, या लोगों को सरकार।
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G20 Summit and glamor government to change its policies, or people to change government to fulfill the agenda
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : ट्विटर/@raghav_chadha

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाकई एक शो-मैन हैं। जी-20 सम्मेलन में तमाम वैश्विक नेताओं की मौजूदगी में भी वह विश्वास से भरे और सहज लग रहे थे। उनके पास एक टीम है, जो उनके बोलने के लिए नोट्स तैयार करती है, ताकि उनके मुंह से कोई गलत शब्द न निकले। इतना ही नहीं, अपने किसी मंत्री को एक इंच भी जगह दिए बगैर कैमरे के पूरे फ्रेम पर कब्जा कैसे करना है, यह कोई उनसे सीखे! माननीय प्रधानमंत्री ने अपनी आदत के अनुसार न सिर्फ मीडिया को खुद से दूर रखा, इसके साथ ही, उनकी सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया, कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन उत्साही पत्रकारों से सवाल न ले पाएं। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की निराशा समझी जा सकती है, जब उन्हें यह बताया गया कि बाइडन अब अगले पड़ाव वियतनाम में जी-20 सम्मेलन से जुड़े सवालों का जवाब देंगे।



चकाचौंध से भरी शैली
पैसों की तो कोई कमी है ही नहीं। पूरी दिल्ली की सड़कों की मरम्मत की गई, गमले, पेड़-पौधे, घास लगाई गईं। मूर्तियां और होर्डिंग्स लगाए गए और पूरी दिल्ली को रोशनी से नहला दिया गया। एक शहर में जितनी सजावट की जरूरत होती है, उससे ज्यादा की गई। आलम यह है कि सजावट की जो सामग्री बच गई है, उनका अगले आयोजन स्थल रियो डि जेनेरियो में भी उपयोग किया जा सकता है! हर तरफ एक ही चेहरा था। यहां तक कि दौरे पर आए नेतागणों को भी किसी विज्ञापन बोर्ड में रत्ती भर जगह नहीं दी गई।


भारी-भरकम घोषणाएं
ऐसे सम्मेलनों के बाद भारी-भरकम घोषणापत्र अमूमन जारी किए ही जाते हैं, दिल्ली घोषणापत्र भी इसका अपवाद नहीं रहा। मिसाल के लिए, इसकी कुछ पंक्तियां :  ‘हम इतिहास के एक निर्णायक क्षण में खड़े हैं, और यहां हम जो फैसले लेंगे, वे हमारे लोगों और हमारे ग्रह के भविष्य को निर्धारित करेंगे।’ मुझे लगता है कि यही शब्द पिछले सम्मेलनों में भी उपयोग में लाए गए होंगे और निस्संदेह, भविष्य में भी लाए जाएंगे।

सकारात्मक उपलब्धियां
 यूक्रेन पर युद्ध थोपा गया है, सीधे-सीधे यह न कहते हुए भी यूक्रेन में युद्ध के लिए सही शब्दों का इस्तेमाल करना। फिर, रूस और अमेरिका (सहयोगियों समेत) को शब्दों के इस हेर-फेर पर सहमत करना वाकई उपलब्धि है। पुतिन और जिनपिंग की गैर-मौजूदगी ने शायद यह काम आसान कर दिया। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कोई भी यूक्रेन पर बात नहीं करना चाहता था, ताकि आर्थिक मुद्दे सम्मेलन में केंद्रीय महत्व के बने रहें, जो कि जी- 20 का मुख्य क्षेत्र है।

सभी देशों के लिए व्यापार व निवेश का एक अनुकूल माहौल तैयार करने और 2024 तक सभी सदस्य देशों के लिए एक पूर्ण व बेहतर ढंग से संचालित होने वाली विवादों के निपटान की व्यवस्था तैयार करने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रति सशक्त प्रतिबद्धता व्यक्त करना। विश्व व्यापार संगठन की महानिदेशक सुश्री नगोजी ओकोन्जो-आइवियेला ने जी-20 पर जरूर नजर रखी होंगी।

श्रम बल भागीदारी में अंतराल में कमी लाने, रोजगार के अवसरों तक समावेशी पहुंच को कायम करने, वेतन में लिंगाधारित फर्क में कमी लाने, यौन हिंसा, महिलाओं के खिलाफ होने वाले दुव्यर्वहार और उत्पीड़न सहित सभी तरह की लिंगाधारित हिंसा में कमी लाने, कार्य-स्थलों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने और लैंगिक असमानताओं को कायम रखने वाली रूढ़ियां खत्म करने के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई।

आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई। इसमें जाति संहार, नस्लवाद और असहिष्णुता के दूसरे सभी रूपों के आधार पर धर्म के नाम पर किया जा रहा आतंकवाद शामिल है। शांति के लिए सभी धर्मों के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर की गई। कुल मिलाकर 34 पृष्ठों और 83 पैराग्राफों वाली यह घोषणा, पहले की गई घोषणाओं और पहलों का पुनर्पाठ मात्र थीं।

चुनौतियां
सरकार के इस दावे को मीडिया ने भी श्रद्धापूर्वक कवर किया कि भारत ने जी-20 देशों के बीच एक प्रमुख दर्जा हासिल कर लिया है और 2023 की भारतीय अध्यक्षता सही मायनों में ऐतिहासिक रही। भारत ने यह दावा भी किया है कि इस दर्जे को पाने की मुख्य वजह आर्थिक मोर्चे पर किया गया उसका असाधारण प्रदर्शन और प्रधानमंत्री का नेतृत्व है। सबको पता है कि जी-20 की अध्यक्षता किसी प्रतिस्पर्धी बोली से नहीं जीती जाती। यह तो चक्रीय क्रम में चलती है। वर्ष 2024 में ब्राजील अध्यक्ष होगा और फिर, 2025 में दक्षिण अफ्रीका। 2026 में अमेरिका के अध्यक्ष बनने के साथ नया चक्र
शुरू होगा।

इसके अलावा, पिछले नौ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन असाधारण भी नहीं रहा है। भारत की विकास दर तो मध्यम (औसतन 5.7 फीसदी) रही है। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. अशोक मोदी सहित अन्य लोगों ने भी वृद्धि के बताए जा रहे आंकड़े की आलोचना की है। उन्होंने बताया है कि 2023-24 की पहली तिमाही में 7.8 फीसदी की वृद्धि 'उत्पादन से आय' पर आधारित थी, जबकि व्यय पक्ष में वृद्धि केवल 1.4 फीसदी थी, और इस त्रुटि की व्याख्या तक नहीं की गई।

एनएसओ ने पहले आंकड़े को सही माना है और यह भी, कि दूसरे नंबर को समय आने पर सही कर लिया जाएगा। प्रोफेसर मोदी के अनुसार, 'जब हम भारतीय आंकड़ों पर बीईए पद्धति लागू करते हैं, तो सबसे हालिया विकास दर 7.8 प्रतिशत से गिरकर 4.5 प्रतिशत हो जाती है।' हमें प्रोफेसर मोदी के निष्कर्ष को स्वीकार करने की जरूरत नहीं है, लेकिन धीमी वृद्धि, बढ़ती असमानताओं और नौकरियों की कमी के बारे में उनकी टिप्पणियां निर्विवाद हैं। मैंने अपने पिछले लेख में असमानता और बेरोजगारी के बारे में टिप्पणियों का समर्थन करने के लिए आंकड़े दिए थे।

विकास के आंकड़ों को एक तरफ रखते हुए मुझे भारत द्वारा किए गए कुछ वायदों और प्रतिबद्धताओं से सुखद आश्चर्य हुआ : केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता; सूक्ष्म और मध्यम उद्योगों द्वारा अपनाया जा रहा नवाचार, जिससे रोजगार पैदा हो रहे हैं; संरक्षणवाद और बाजार को विकृत करने वाली प्रथाओं को हतोत्साहित करना;  सामाजिक सुरक्षा लाभों का सभी को मिलना, और यह सुनिश्चित किया जाना कि कोई भी पीछे न छूटे। मेरा मानना है कि इस मुश्किल एजेंडे से निपटने के लिए या तो सरकार को अपनी नीतियां बदलनी होंगी या लोगों को सरकार बदलनी होगी। वर्तमान में, भारत जी-20 समूह में शीर्ष पर तो छोड़िए, आस-पास भी नहीं फटकता। यह प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर), वैश्विक भूख सूचकांक और कुछ अन्य मापदंडों के मामले में सबसे नीचे है। मुझे उम्मीद है कि भारत जी-20 में की गई घोषणाओं पर अमल करेगा और एक दिन शीर्ष पर जरूर पहुंचेगा।
  

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