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सियासत: दक्षिण में 'इंडिया' का भविष्य और सफलता में संदेह के कुछ आधार

Fri, 28 Jul 2023 07:54 AM IST
r.rajgopalan राजगोपालन आर. राजगोपालन
Updated Fri, 28 Jul 2023 07:54 AM IST
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सार
लोकसभा चुनाव से पहले 'इंडिया' का जन्म आपसी कलह में फंसे विपक्ष का एक स्वागत योग्य कदम है। पर बंगलूरू में जन्मा विपक्षी गठबंधन अपनी नकारात्मकता और कोई साझा कार्यक्रम न होने के कारण दक्षिण भारत में अपनी पैठ बना पाएगा, इसमें संदेह है।
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future of opposition alliance India doubtful whether able to make inroads in South India Lok Sabha election
Bengaluru Opposition Meeting - फोटो : Agency

विस्तार

वर्ष 2024 के संसदीय चुनाव की लड़ाई क्या नवगठित विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलायंस ('इंडिया') के लिए आसान है और नरेंद्र मोदी या भाजपा के लिए कठिन है? इसका उत्तर है कि लोकतंत्र में विपक्ष को जगह मिलनी चाहिए। यदि कोई दक्षिण भारतीय राजनीतिक पार्टियों का विश्लेषण करे, तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। दक्षिण की पार्टियां जाति आधारित, अलगाववादी प्रवृत्ति, हिंदी विरोध के लिए जानी जाती हैं और इस हीनभावना से ग्रस्त हैं कि उत्तर भारतीय राज्य विकसित हैं और दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है।



दक्षिण भारत के छह राज्यों में 12 प्रमुख राज्यस्तरीय पार्टियां हैं। इन छह राज्यों में अलग-अलग पार्टियों का शासन है। इन पार्टियों का कोई साझा एजेंडा नहीं है, पर वे नवगठित विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' का हिस्सा हैं। जब आप अपने कट्टर विरोधियों के साथ गठबंधन करते हैं, तो क्या इससे अवसरवाद की बू नहीं आती है?


दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री पद के कई उम्मीदवार हैं। पहला नाम एमके स्टालिन का है, जो तमिलनाडु की सभी 40 सीटें जीतने और प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वह भी प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक हैं। तो फिर सिद्धरमैया या पी चिदंबरम क्यों नहीं!

जब हम व्यक्तित्व के बारे में बात करते हैं, तो इनमें राष्ट्रवादी चेहरा कहां है? नरेंद्र मोदी से बड़ा कद किसका है? दक्षिण से भारत के दो प्रधानमंत्री बने पीवी नरसिंह राव और एचडी देवगौड़ा। पिछले तीस वर्षों में हरेक केंद्र सरकारों में द्रमुक शामिल रहा है। उत्तर भारत में द्रमुक के बारे में धारणा है कि वह भ्रष्ट पार्टी है। अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया कि कामराज और जीके मूपनार को द्रमुक ने प्रधानमंत्री बनने से रोका था। उत्तर और दक्षिण के विभाजन को खत्म करने के लिए भाजपा वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी के अलावा तमिलनाडु के रामनाथपुरम से चुनाव लड़वाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर ऐसा हुआ, तो द्रमुक बेनकाब हो जाएगी।

अगर तमिल भाषा तक उनकी पहुंच को आंका जाए, तो मोदी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। जैसे वर्ष 2022 में उन्होंने वाराणसी में काशी तमिल संगमम को सफलतापूर्वक आयोजित किया था। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जहां भी अंतरराष्ट्रीय सभा को संबोधित करते हैं, वहां तिरुवल्लुर या सुब्रमण्यम भारती में से किसी एक तमिल कवि का उल्लेख जरूर करते हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान यह मोदी सरकार ही थी, जो युद्धक्षेत्र से 2,500 तमिल छात्रों और सभी छह दक्षिणी राज्यों के 10,500 छात्रों को भारत लाई थी। क्या यह राष्ट्रवाद नहीं है? क्या दक्षिण भारतीय मतदाताओं को यह नहीं समझना चाहिए कि चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो, केंद्र सरकार दक्षिणी राज्यों की परवाह करती है? तो फिर दक्षिण भारतीय पार्टियां उत्तर भारतीय नेताओं से इतना क्यों कतराती हैं?

उदाहरण के लिए, विपक्षी दलों की पहली बैठक में नीतीश कुमार के साथ नजर आने से बचने के लिए एमके स्टालिन पटना में नहीं रुके। प्रवासियों के मुद्दे पर दक्षिण की पार्टियों को चूंकि 'बिहारी भैया' से नफरत है, इसलिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने हिंदी पर निशाना साधा, तो द्रमुक ने तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि को खुलेआम 'बिहारी बेचारा' कहा। एक द्रमुक नेता ने पिछले दिनों कहा था कि 'बिहारी और उत्तर प्रदेश के भैया पानी पूरी बेचते हैं। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की मौजूदगी में द्रमुक मंत्री पोनमुंडी ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगला। लेकिन नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के हस्तक्षेप के बावजूद तमिलनाडु में प्रवासी बिहारियों को चुप नहीं कराया जा सका और वहां राजनीतिक विस्फोट हो गया। बहुत संभव है कि अगले एक दशक में तमिलनाडु सरकार में कोई बिहारी मंत्री हो, क्योंकि बड़ी संख्या में प्रवासी उत्तर से दक्षिण जाते हैं। दक्षिण के महत्वपूर्ण राज्यों में कृषि, आतिथ्य और कपड़ा क्षेत्रों में इन प्रवासियों का वर्चस्व है।

दक्षिण की विपक्षी पार्टियां सिकुड़ रही हैं, कमजोर हो रही है और उनके पास नरेंद्र मोदी को उखाड़ फेंकने के अलावा और कोई सोच नहीं है। पटना और बंगलूरू में 26 पार्टियों के विपक्षी गठबंधन का आंतरिक विरोधाभास सुलझ नहीं सका। द्रमुक समेत 'इंडिया' में शामिल होने वाली दक्षिण की अन्य पार्टियों पर टिप्पणी करते हुए भाजपा के तमिलनाडु प्रमुख अन्नामलाई ने कहा, 'इंडिया' में मौजूद पार्टियों को देखकर यही ख्याल आता है कि उनका अतीत क्या था और आज उनका प्रिय कौन है।' द्रमुक जैसी पार्टियों को दूर रखने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू को संविधान में 16वां संशोधन लागू करना पड़ा था, जो 1960 के दशक के प्रारंभ में देश तोड़ने पर आमादा थीं। 'इंडिया' में शामिल द्रमुक के नेता क्या इस बात से इन्कार कर सकते हैं कि हाल में भी उन्होंने ऐसी ही भाषा का प्रयोग किया था? इस गठबंधन में शामिल दल अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ वकालत करके केवल यह जाहिर करते हैं कि उनका हित कहां है।

संक्षेप में कहें, तो बंगलूरू में जन्मा विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' अपनी नकारात्मकता और कोई साझा कार्यक्रम न होने के कारण दक्षिण भारत में अपनी पैठ नहीं बना सकता। इसका श्रेय मोदी, शाह, नड्डा और योगी की दक्षिण भारत में लोकप्रियता को दिया जा सकता है, खासकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के कारण। यह बात दक्षिण भारतीयों के मानस में गहराई तक उतर गई है।

विभिन्न कारणों से तमिलनाडु और कर्नाटक में मुस्लिमों के बीच भाजपा की पैठ बढ़ी है। दक्षिण में मुस्लिम युवाओं ने यह सोचना शुरू कर दिया है कि अल्पसंख्यकों की समृद्धि के लिए एक मजबूत केंद्र सरकार होनी चाहिए और मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक नहीं माना जाना चाहिए। बहरहाल, लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' का जन्म आपसी कलह में फंसे विपक्ष का एक स्वागत योग्य कदम है। दक्षिण भारत में घमासान जारी रहेगा।

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