एफटीए हैं आरसीईपी का जवाब, दुनिया की नजर भारत पर
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इस समय वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय दुनिया के ऐसे विकसित देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को तेजी से आगे बढ़ाने की रणनीति पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिन्हें भारत जैसे बड़े बाजार की जरूरत है और जो उसके विशेष उत्पादों के लिए अपने बाजार के दरवाजे भी खोलने के लिए उत्सुक हों। गौरतलब है कि पिछले दिनों भारत ने दुनिया के सबसे बड़े व्यापार समझौते रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) में शामिल न होते हुए दुनिया के प्रमुख देशों और प्रमुख आर्थिक व कारोबारी संगठनों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की ओर आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई है। इसमें कोई दोमत नहीं है कि कोविड-19 के कारण दुनिया में निर्मित हुए चीन विरोधी नकारात्मक वातावरण का भारत को नए एफटीए में लाभ मिलने की पूरी संभावनाएं हैं।
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निस्संदेह कोरोना काल ने एफटीए को लेकर सरकार की सोच बदल दी है। सरकार बदले वैश्विक माहौल में अब एक साथ तीन बड़े कारोबारी साझेदारों-अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ सीमित दायरे वाले व्यापार समझौते के लिए आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रही है। भारत द्वारा सीमित दायरे वाले ट्रेड एग्रीमेंट के पीछे वजह यह है कि ये मुक्त व्यापार समझौते की तरह बाध्यकारी नहीं होते हैं। यानी अगर बाद में किसी खास कारोबारी मुद्दे पर कोई समस्या होती है, तो उसे दूर करने का विकल्प खुला होता है। भारत ने पूर्व में जिन देशों के साथ एफटीए किए हैं, उनके अनुभव को देखते हुए इस समय सीमित दायरे वाले व्यापार समझौते ही बेहतर हैं।
वस्तुतः भारत का मानना है कि आरसीईपी समझौते में शामिल होने से राष्ट्रीय हितों को भारी नुकसान पहुंचता और यह आर्थिक बोझ बन जाता। पिछले काफी समय से घरेलू उद्योग और किसान इस समझौते का भारी विरोध कर रहे थे, क्योंकि उन्हें चिंता थी कि इसके जरिये चीन और अन्य कई आसियान देश भारतीय बाजार को अपने माल से भर देंगे। इसके अलावा चीन के बॉर्डर रोड इनीशिएटिव (बीआरआइ) की योजना, लद्दाख में उसके सैनिकों की घुसपैठ, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती हैसियत में रोड़े अटकाने की चीन की प्रवृत्ति ने भी भारत को आरसीईपी से दूर रहने पर विवश किया।
वस्तुतः विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के तहत विश्व व्यापार वार्ताओं में जितनी उलझनें खड़ी हो रही हैं, उतनी ही तेजी से विभिन्न देशों के बीच एफटीए बढ़ते जा रहे हैं। एफटीए ऐसे समझौते हैं, जिनमें दो या दो से ज्यादा देश आपसी व्यापार में कस्टम और अन्य शुल्क संबंधी प्रावधानों में एक-दूसरे को तरजीह देने पर सहमत होते हैं। उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ के साथ वर्ष 2013 से एफटीए पर कवायद चल रही है। लेकिन कई मुद्दों पर मतभेद के कारण इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। लेकिन अब बदले वैश्विक आर्थिक परिवेश में भारत और यूरोपीय संघ, दोनों एफटीए से लाभान्वित होने की संभावनाएं रखते हैं। इसी तरह भारत और अमेरिका एक सीमित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहे हैं, ताकि दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को और बढ़ावा मिल सके। भारत अमेरिका से कई तरह की रियायतें चाहता है। इनमें इस्पात और एल्यूमीनियम उत्पादों पर लगाये जाने वाले ऊंचे आयात शुल्क में छूट, पूर्व में दिए जा रहे सामान्यीकृत तरजीही प्रणाली (जीएसपी) के तहत निर्यात लाभ की बहाली तथा भारत के कृषि, वाहन और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए अमेरिका के बाजारों में अधिक पहुंच संबंधी मांग प्रमुख हैं। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि भारत में उसके कृषि और विनिर्मित उत्पादों के लिए भारतीय बाजारों को और अधिक खोला जाए।
निश्चित रूप से आरसीईपी की जगह एफटीए भारत के लिए लाभप्रद होंगे, लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि एफटीए वाले देशों में कठिन प्रतिस्पर्धा के बीच व्यापारिक कदम आगे बढ़ाने के लिए रणनीतिक प्रयास करने होंगे। चूंकि भारत एफटीए क्षेत्र में नया है, इसलिए ध्यान रखना होगा कि एफटीए का लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब देश में विशेषज्ञ अधिकारियों, उद्योगपतियों और पेशेवरों का एक ऐसा समर्पित संगठन खड़ा हो सके, जिससे किसी दोतरफा समझौते में भारत को घाटे का समझौता न करना पड़े।