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धर्म न मानने की आजादी
Wed, 18 Mar 2020 07:03 PM IST
Raman Singh
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 18 Mar 2020 07:03 PM IST
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मुस्लिम महिलाएं
- फोटो : a
चर्चित संगीतकार ए आर रहमान की बेटी खतीजा रहमान के बुर्के या नकाब की पिछले दिनों मैंने आलोचना की, तो खतीजा ने मुझे लिखा कि सचमुच का नारीवाद किसे कहते हैं, यह जानने के लिए मुझे गूगल करना चाहिए। इसके जवाब में क्या मैं भी यह नहीं कह सकती कि वास्तविक इस्लाम के बारे में जानने के लिए उन्हें भी गूगल करना चाहिए? इससे यह मालूम पड़ जाएगा कि पत्नी द्वारा बात न मानने पर पति उसे किस तरह पीटेगा, कैसे मर्द चार शादियां करेगा, संपत्ति में वह लड़कियों को किस तरह हिस्सेदारी कम देगा, आदि-आदि।
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खतीजा का कहना है कि वह बुर्का अपनी इच्छा से पहनती हैं। लड़कियां या महिलाएं अपनी मर्जी से कपड़े पहनती हैं, तो इस पर कुछ कहने का मुझे सचमुच कोई अधिकार नहीं है। लेकिन खतीजा क्या यह जानती हैं कि अनेक लड़कियां बुर्का दूसरों की मर्जी से पहनती हैं? उन्हें पिता, भाई या फिर अपनी ससुराल के लोगों की इच्छा के मुताबिक बुर्का पहनना पड़ता है। अब तो लड़कियों के कुछ स्कूलों में, यहां तक कि कई दफ्तरों में भी लड़कियों/महिलाओं को हिजाब पहनकर आने का नियम बना दिया गया है। ऐसे अनेक देश हैं, जहां बुर्का या हिजाब को न कहने की आजादी नहीं है। ऐसे अनेक देश हैं, जहां जीन्स-ट्राउजर पहनने की आजादी नहीं है। पहनने पर पुलिस सड़कों पर ही लड़कियों को खुलेआम पीटती है।
भारत में चूंकि लड़कियों की पोशाक के बारे में कोई सख्त कानून नहीं है, इसीलिए खतीजा बुर्का पहनने की अपनी इच्छा या आजादी के बारे में कह पाईं। मुझे नहीं मालूम, बुर्का पहनने के बारे में वह जितनी सजग हैं, बुर्का न पहनने के बारे में वह उतनी ही सजग हैं या नहीं। क्या वह कभी उन लड़कियों/महिलाओं के पास जाकर खड़ी हुई हैं, जो बुर्का नहीं पहनना चाहतीं, लेकिन परिवार, समाज और देश के दबाव के कारण उन्हें बुर्का पहनना पड़ता है? सुरक्षा कारणों से यूरोप के कुछ देशों ने बुर्के पर रोक लगाई है। दरअसल चोर, डकैत, जेल से भागे अपराधी, आतंकवादी और हत्यारों को बुर्के में छिपते देखा गया है, इसी कारण यह आदेश आया है कि बुर्का पहनने पर भी चेहरा नहीं ढका जा सकता। इसके बावजूद यूरोप के उन देशों में जब कुछ महिलाएं बुर्के में मुंह ढककर चलती हैं, उन्हें पुलिस पकड़ या पीट नहीं रही।
हम क्या यह देख नहीं रहे कि आजादी का लाभ सिर्फ एक पक्ष उठा रहा है! नमाज पढ़ने के लिए नई मस्जिद बनाई जा रही है। अगर मस्जिद में जगह नहीं है, तो रास्ता बंद करके भी, वाहनों को रोककर भी, राहगीरों को बाधा पहुंचाकर भी लोग नमाज पढ़ने की आजादी का लाभ उठा रहे हैं। आज के दौर में नमाज न पढ़ने की आजादी बहुत कम रह गई है। गांवों में तो लोग घर-घर जाकर पता करने लगे हैं कि कौन नमाज पढ़ने नहीं गया है। जो नमाज पढ़ने मस्जिद में नहीं जाते, उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। रोजा रखने की आजादी का भी लोग भरपूर लाभ उठाते हैं। लेकिन जो रोजा नहीं रखना चाहते, क्या उन्हें घर से बाहर खाने-पीने की आजादी है?
आज बांग्लादेश या पाकिस्तान में क्या हो रहा है? मस्जिदों में, मदरसों में, महफिलों में इस्लाम का प्रचार हो रहा है। कुरान और हदीस की मन मुताबिक व्याख्याएं की जा रही हैं। लाखों लोग इन्हें सुन रहे हैं, लेकिन उनमें से किसी के भी पास मजहब की आलोचना करने का अधिकार है क्या? आलोचना करने वाले जिंदा नहीं बचेंगे। इसी कारण मैं कह रही हूं कि यह आजादी एकतरफा है। जो धार्मिक हैं, उन्हें आजादी है। लेकिन जो धार्मिक नहीं हैं, उन्हें धर्म की आलोचना करने की आजादी नहीं है। वे अपना मुंह बंद रखते हैं। मुंह खोलने पर वे जेल या निर्वासन में होते हैं, या फिर उन्हें खत्म कर दिया जाता है।
इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि जो धर्म को नहीं मानते या उसकी आलोचना करते हैं, उन्हें वह आजादी नहीं है, जो धार्मिकों को है। खुद को इस्लाम का सच्चा सेवक कहने वालों की सच्चाई यह है कि इस्लाम के ज्यादातर नियमों का वे पालन नहीं करते। वे रिश्वत लेते हैं, शराब पीते हैं, झूठ बोलते हैं, हत्या करते हैं और बलात्कार में भी लिप्त होते हैं। सिर को हिजाब से ढक लेने, टोपी पहनने और दाढ़ी बढ़ा लेने भर से कोई सच्चा मुसलमान नहीं हो जाता। सच्चा मुसलमान होने के लिए इस्लाम के तमाम आदर्श मानने होंगे। कितने मुसलमान हैं, जो इन सबका पालन करते हैं? मनुष्य की भावना के प्रभाव की जांच-पड़ताल करने में लेन-देन, खरीद- बिक्री या मांग और उत्पत्ति के नियम का ज्ञान कुछ काम नहीं आता।
बांग्लादेश में बाउल गीत गाने वाले एक कलाकार शरीयत को जेल में डाल दिया गया है। उनका अपराध क्या है? उन्होंने कहा है कि कुरान में संगीत की मनाही नहीं है। लोकतंत्र में तो धर्म को मानने वाले और न मानने वाले, दोनों को समान आजादी मिलनी चाहिए। लोकतंत्र का मतलब क्या एक धार्मिक समुदाय को उत्साहित करना, उसकी तमाम मांगें और निर्देशों को मान लेना है? अगर नहीं, तो बांग्लादेश या पाकिस्तान में ऐसा क्यों हो रहा है? वहां बहुसंख्यकों की बातें मानते हुए अल्पसंख्यकों की उपेक्षा क्यों हो रही है? लोकतंत्र में तो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक-दोनों को समान दृष्टि से देखना चाहिए। व्यवहार में ऐसा क्यों नहीं हो रहा? उल्टे धर्म की गलत व्याख्या की जाती है। कुरान में अगर नाचने, गाने, बाजा बजाने, मनुष्य की तस्वीर बनाने की सचमुच मनाही है, तो फिर क्या सभी जगह इसका पालन हो रहा है?
इस लिहाज से देखें, तो बांग्लादेश या पाकिस्तान में सिर्फ नाम का ही लोकतंत्र है, काम का नहीं। वहां एक ही पक्ष को अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार है, दूसरे पक्ष को नहीं है। दूसरा पक्ष अगर ऐसा करता है, तो उसे जबरन जेल में ठूंस दिया जाता है। इस बारे में इन देशों को समझाने वाला क्या कोई नहीं है? विश्व बाजार में अलबत्ता लोकतंत्र की कीमत अधिक है। ऐसे में धर्मतंत्र या राजतंत्र को एक न एक दिन अपना तौर-तरीका बदलना ही पड़ेगा।