शिलान्यास, ध्वंस और सियासत
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मैं विवादित इमारत से कोई सौ गज दूर खड़ा था। सब कुछ नष्ट हो गया। हमारे सांप्रदायिक मूल्य राख हो गए। चारों तरफ नफरत, उन्माद और सांप्रदायिकता का नशा था। भयावह दृश्य था। 46 एकड़ का पूरा इलाका ध्वंस के पागलपन के जुनून में था। समूचा दृश्य दिल दहलाने वाला था। मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर हर कोई अमर्यादित था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि जो मैं देख रहा हूं वह हकीकत है या एक बुरा सपना। बाबरी ढांचे पर कारसेवकों का हमला हो चुका था। विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी के नेता सन्न और अवाक थे। पुलिस प्रशासन को काटो तो खून नहीं। किंकर्तव्यविमूढ़। बेबस और लाचार। मैंने पुलिसवालों का ऐसा गांधीवादी चेहरा पहली बार देखा था। कोई दो सौ कारसेवक विवादित इमारत के तीनों गुंबदों पर चढ़ लोहे के रॉड, गैतें और सरिये से चोट कर रहे थे। नीचे कोई एक लाख कारसेवकों ने इमारत को घेर रखा था। एक-एक करके तीनों गुंबद टूटे। ध्वंस की उस धूल के गुबार ने हमारी गंगा-जमनी तहजीब को ढक लिया। उस रोज सिर्फ साढ़े चार सौ साल पुराना बाबरी ढांचा नहीं टूटा था। विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की मर्यादाएं भी टूटी थीं। छह दिसंबर को गीता जयंती थी। द्वापर में महाभारत इसी रोज हुई थी।
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अयोध्या में ध्वंस से पहले जिस मामले को लेकर जमकर राजनीति हुई वह था-शिलान्यास। शिलान्यास को लेकर दोनों तरफ से आग उगलने वाले भाषण आने लगे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। व्यक्ति के तौर पर वह सीधे और सरल थे। उनके चंपूओं ने उन्हें समझाया कि बहुल हिंदू भावनाओं को ध्यान में रख शिलान्यास करवा देना चाहिए। इससे पहले कि यह मुद्दा भाजपा लपक ले आप स्वयं पहल करें। लोकसभा चुनाव अगले साल मार्च तक होने थे। राजीव गांधी को यह समझाया गया कि शिलान्यास करवा कर वक्त से पहले चुनाव कराएं और अयोध्या से ही अपने चुनाव अभियान की शुरुआत करें। राजीव गांधी ने अपना चुनाव अभियान अयोध्या से ही शुरू किया और भाषण में कांग्रेस पार्टी की प्रतिबद्धता ‘राम राज्य’ के प्रति दुहराई। उस वक्त राजीव गांधी के भाषण लेखक मणिशंकर अय्यर होते थे। उनका कहना है कि भाषण में राम राज्य का कहीं जिक्र ही नहीं था। राजीव गांधी ने इसे खुद से जोड़ा था। राजीव जी ने ऐसा 'समरसॉल्ट' किया क्यों? इसका जवाब मुझे समाजवादी नेता मधु लिमये से मिला। उन्होंने कहा,'धर्म की उपेक्षा आप कैसे कर सकते हैं। सोवियत संघ ने भी 70 साल तक धर्म को नजर अंदाज किया और नतीजा हमारे सामने हैं।' अब लौटते हैं अपनी कहानी पर, राजीव गांधी बोफोर्स घोटाले को लेकर अपनी विश्वसनीयता और लोकप्रियता दोनों खो रहे थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह, अरुण नेहरू, आरिफ मोहम्मद खान और विद्याचरण शुक्ल आदि के गठबंधन से उन्हें भारी चुनौती मिल रही थी। दूसरी तरफ चुनाव से ठीक पहले 11 जून, 1989 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई। वहां भाजपा ने एक प्रस्ताव पास कर अयोध्या की रामजन्मभूमि को हिंदुओं को सौंपने की मांग की। 24 सितंबर, 1989 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विश्व हिंदू परिषद के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की, इसमें केंद्रीय गृह मंत्री भी मौजूद थे। सरकार का विश्व हिंदू परिषद पर दबाव था कि शिलान्यास तो हो पर जगह बदल दी जाए, ताकि सांप भी मरे और लाठी न टूटे।
विहिप ने इसे सिरे से खारिज कर दिया और देवरहा बाबा से संपर्क कर उनसे दखल देने को कहा। प्रधानमंत्री राजीव गांधी और विश्व हिंदू परिषद के बीच शिलान्यास को लेकर देवरहा बाबा ही मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे। राजीव गांधी के सभी साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया था। वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। उन्हें किसी ने देवरहा बाबा से संपर्क करने को कहा। देवरहा बाबा अवतारी पुरुष थे। वह धरती पर नहीं रहते थे, हमेशा पानी में 12 फुट ऊंचे मचान पर रहते थे। राजीव गांधी की मां इंदिराजी भी जब किसी समस्या से घिरतीं, तो समाधान के लिए बाबा के पास ही जाती थीं। राजीव गांधी छह नवंबर को वृंदावन में बाबा से मिलने गए। बाबा ने कहा मंदिर बनना चाहिए। आप शिलान्यास करवाएं और शिलान्यास की जगह बदली न जाए।
लेकिन पेच एक और था। दरअसल, आज्ञाकारी और चापलूस छवि के होने के बावजूद मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी शिलान्यास के लिए राजी नहीं थे। ये वही नारायण दत्त तिवारी थे, जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान खुशामदी में राजीव गांधी के छोटे भाई संजय गांधी की चप्पल उठाई थी। मतलब साफ था, वह शिलान्यास से कांग्रेस पार्टी को होनेवाले नुकसान को देख रहे थे। चुनाव का एलान भी हो चुका था, नारायण दत्त तिवारी रोज प्रचार के लिए निकलते थे। उसी रात मेरे पास उनका फोन आया। कहा, 'कल जनसभा के लिए झांसी जा रहा हूं। आप चलेंगे क्या?' मैंने हामी भर दी। मैं सुबह नौ बजे कालिदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पहुंचा। लखनऊ से हेलीकॉप्टर से हमें झांसी जाना था। लंबे इंतजार के बाद तिवारीजी एक झटके से कमरे के बाहर निकल मेरे सामने से बाहर की ओर चले गए। वह गुस्से में थे। रास्ते में मैं यह सोच ही रहा था कि वह अब बोलेंगे, मुंह खोलेंगे पर एयरपोर्ट आ गया, पर वह कुछ नहीं बोले। मैंने खुद ही पूछ लिया। शिलान्यास पर कुछ तय हुआ? उन्होंने कुढ़ते हुए कहा, 'बूटा सिंह से पूछिए। वह शिलान्यास करवाने आए हैं।' बाद में अयोध्या के इसी शिलान्यास ने दिल्ली का तख्त बदल दिया। देश की राजनीति बदल दी। शिलान्यास के साथ खड़ी होकर भाजपा दो सीटों से 85 पर पहुंच गई। शिलान्यास का विरोध करने वाले वीपी सिंह अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि के साथ देश के प्रधानमंत्री बन गए।
लेखक की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘अयोध्या: एक चश्मदीद की गवाही’ का एक हिस्सा