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सौ साल जीना भूल जाइए

Wed, 14 Oct 2015 08:38 PM IST
सहीराम
सहीराम Updated Wed, 14 Oct 2015 08:38 PM IST
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Forget live hundred years

सौ का अपना महत्व है जी। क्रिकेट में शतक लगता है, तो तालियां बजती है। सौ पुत्र पैदा हो जाएं, तो महाभारत हो जाता है। वैसे तो महाभारत के लिए पांच भी काफी हैं। बल्कि इधर तो दो भी ज्यादा हैं। पर सौ का अपना महत्व है। शतजीवी होने के आशीर्वाद दिए जाते हैं। इधर यह तय हो गया है कि लेखक-बुद्धिजीवी टाइप के लोगों को सौ साल कोई जीने नहीं देगा, चाहे उनके लिए कितनी ही दुआएं मांग ली जाएं। हाथों में बंदूकें लिए दनदनाते मोटरसाइकिल सवार उनकी तलाश में घूम रहे हैं।

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फिर भी सौ का महत्व है। खास तौर से लेखकों और कलाकारों के लिए। क्योंकि अगर उनकी हत्या नहीं हुई, तो उन पर कम से कम सौ मुकदमे तो अवश्य ही दर्ज हो जाएंगे। प्रोफेसर कलबुर्गी के मित्र के एस भगवान को यही धमकी दी गई है। यह धमकी उन्होंने दी, जो लेखकों-कलाकारों पर मुकदमे ठोकने के लिए मशहूर हैं। लेखक-कलाकार मशहूर होते हैं, तो इन्होंने मशहूर होने के लिए यह तरीका निकाल लिया है कि चलो, लेखकों-कलाकारों पर मुकदमे ठोक देते हैं।
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लोग कह रहे हैं कि यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। जो भी है, पर जमाना इसी का है। यह नया ट्रेंड है। पर इतना नया भी नहीं है। हुसेन पर ही पता नहीं, पूरे देश में कितने मुकदमे दर्ज हुए थे। इस मुकदमेबाजी से परेशान हो वह देश छोड़ गए और फिर हिंदुस्तान कभी नहीं लौट पाए। इसके बाद से मुकदमे ठोकने वालों के हौंसले इतने बुलंद हैं कि खुलेआम कह रहे हैं कि तुम पर सौ मुकदमे ठोकेंगे, भागते रहना-यहां से वहां।
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लोग जिंदगी में एक मुकदमा भुगतते-भुगतते इतने तंग हो लेते हैं कि दूसरों को सीख देने लगते हैं कि भैया, कोर्ट-कचहरी के चक्कर में मत पड़ना। और यहां सौ-सौ मुकदमे ठोके जा रहे हैं। तमिल लेखक मुरुगन ने इन सब से तंग आकर खुद ही घोषणा कर दी थी कि लेखक मर गया है। लेखकों-कलाकारों के भाग्य में लगता है कि अब यही लिखा है कि या तो मार दिए जाओगे, या खुद मर जाओगे। फिर भी बचे रहे, तो मुकदमे भुगतो और मरो।

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