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भारत के हितों के लिए

Mon, 11 Nov 2019 07:00 PM IST
Raman Singh सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत Published by: Raman Singh Updated Mon, 11 Nov 2019 07:00 PM IST
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For the interests of India
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत - फोटो : A

मीडिया के एक हिस्से में पिछले कुछ समय से जताई जा रही आशंका सही साबित हुई है कि भारत क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर सकता है, क्योंकि उसे भय है कि इसका प्रभाव उसके घरेलू बाजार पर पड़ सकता है। सात वर्षों की सघन वार्ता तथा तीन शिखर बैठकों के बाद चार नवंबर को आरसीईपी की बैंकाक में हुई बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने एक सशक्त बयान के जरिये दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते से भारत के अलग होने के निर्णय की घोषणा की। उन्होंने कहा,'भारत व्यापक क्षेत्रीय एकीकरण के साथ ही मुक्त व्यापार और नियम आधारित व्यवस्था का हिमायती है।


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आरसीईपी का मौजूदा स्वरूप इसके मार्गनिर्देशक सिद्धांत और इसकी मूल भावना से पूरी तरह से मेल नहीं खाता। ऐसे फैसलों से हमारे किसानों, व्यापारियों, पेशेवरों और उद्योगों के हित जुड़े हुए हैं। कामगारों और उपभोक्ताओं के हित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जो कि भारत के बड़े बाजार का निर्माण करते हैं। जब मैं आरसीईपी समझौते को सारे भारतीयों के हितों की कसौटी पर कसता हूं, तो मुझे कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता। इसलिए न तो गांधी जी की सीख और न ही मेरी अंतरात्मा मुझे आरसीईपी में शामिल होने की इजाजत दे रही है।' इस तरह मोदी ने अन्य 15 भागीदार देशों के नेताओं में कोई संदेह नहीं छोड़ा कि वह क्यों इससे अलग हो रहे हैं। उन्होंने इसे बहुत ही सम्मानजक ढंग से अंजाम दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस कदम के जरिये विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव डाला है। उनकी छवि एक ऐसे मजबूत और दृढ़ नेता के रूप में उभरी है, जिन्हें भारत के राष्ट्रीय हितों से समझौता करने के लिए डिगाया नहीं जा सकता। मोदी के इस कदम का पार्टी लाइन से इतर व्यापक समर्थन किया गया है। भारतीय उद्योग जगत की प्रतिक्रिया में यह देखा जा सकता है। सीआईआई तथा अन्य कारोबारी संगठनों ने आरसीईपी के मौजूदा स्वरूप के नकारात्मक नतीजों को लेकर आगाह किया था।

आरसीईपी के 15 नेताओं के उलट मोदी के कदम ने रेखांकित किया है कि 2015 में बाली में विश्व व्यापार संगठन की बैठक के दौरान खाद्यान्न खरीद के मुद्दे पर भारत की वार्ता से अलग होने की चेतावनी अपवाद नहीं थी। इसने दिखाया कि यदि भारत की चिंताओं और आशंकाओं पर गौर नहीं किया जाएगा, तो वह धारा के विपरीत जा सकता है। भारत ने चीन की महत्वाकांक्षी बीआरई (बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव) परियोजना में शामिल नहीं होने का फैसला किया, जबकि इसमें करीब 64 देश शामिल हैं और इनमें आसियान के भी कई देश हैं। आरसीईपी में शामिल होने से मोदी के इनकार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा अन्य नेताओं के लिए संदेश माना जाना चाहिए कि मेहमान के रूप में उनके स्वागत-सत्कार के बावजूद वह उन्हें हल्के में नहीं ले सकते। 'मोदी है तो ना कहना भी मुमकिन है', यह अब नई टैगलाइन होनी चाहिए !

आरसीईपी देशों के साथ व्यापार के सारे उपलब्ध आंकड़े भारत के तर्कों की पुष्टि करते हैं। आरसीईपी के अस्तित्व में आने से पहले ही भारत का 10 आसियान देशों तथा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ 105 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है। अकेले चीन के साथ 2018-19 में भारत का 53 अरब डॉलर का व्यापार घाटा था। ऐसे में आसियान देशों, दक्षिण कोरिया तथा जापान से आने वाले सामान पर 90 फीसदी शुल्क में कमी, तथा चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से आने वाले सामान पर 74 फीसदी शुल्क में कमी से यह आशंका सही साबित हो जाएगी कि भारतीय बाजार में आरसीईपी के सदस्यों के यहां से आयात होने वाले सामान की बाढ़ आ जाएगी। उत्पादों के मूल को लेकर भी उसकी आशंकाएं वाजिब हैं, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि चीन का सस्ता माल वियतनाम या थाईलैंड जैसे किसी तीसरे देश से होकर भारत में नहीं आएगा। 2020 में जब समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, अन्य देश शुल्क घटाने के लिए 2014 को आधार वर्ष बनाए जाने के पक्ष में हंै, जबकि भारत का कहना है कि इसका उस पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और वह 2019 को आधार वर्ष बनाए जाने के पक्ष में है।

ऐसे तमाम वैध कारणों के बावजूद क्या एक बड़ी वैश्विक ताकत बनने की आकांक्षा रखने वाले भारत को इतने बड़े व्यापारिक ब्लॉक का हिस्सा नहीं बनना चाहिए? जब भारतीय प्रधानमंत्री वैश्वीकरण, बहुपक्षवाद और साउथ-साउथ कोऑपरेशन की वकालत करते हैं, तो आरसीआईपी से भारत के अलग होने से वैश्वीकरण तथा मुक्त व्यापार का समर्थन करने वाले देश के रूप में उसकी साख को धक्का नहीं लगेगा? क्या दीर्घकाल में इसका प्रभाव भारत के निर्यात पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा नहीं होगा? गरीबों, कामगारों और किसानों के हितों की सुरक्षा समझी जा सकती है, लेकिन हम कब तक क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से अपने उद्योग की रक्षा कर सकेंगे? क्या हमने वह दौर नहीं देखा है, जब दशकों तक भारतीय सड़कों पर सिर्फ एंबेसडर और फिएट कारें दौड़ा करती थीं, क्योंकि इसके निर्माता बाहरी प्रतिस्पर्धा से बाहर थे? यदि हम विदेशी कंपनियों को अपने यहां आने और भारतीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करने का मौका नहीं देंगे, तो क्या हम विभिन्न ब्रांड की कारें देख पाएंगे? क्या घरेलू क्षमता और प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन देने और किसी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समझौते का हिस्सा बनने में कोई बुनियादी टकराव है? इसका जवाब है नहीं।

यदि हम भारत के निर्णय का भू-रणनीतिक महत्व के साथ विश्लेषण करें तो हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि आरसीईपी समूह से अलग होकर हमने चीन के लिए मैदान खुला छोड़ दिया है, जिसका दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़ेगा। भारत को आरसीईपी के साथ भविष्य की वार्ता बंद नहीं करनी चाहिए। आरसीईपी और चीन के बयानों से भी साफ है कि वे भारत से नाउम्मीद नहीं हैं। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी संकेत दिए हैं कि यदि भारत की चिंताओं पर गौर किया गया, तो वह आरसीईपी में शामिल होने पर विचार कर सकता है। गेंद अब उन देशों के पाले में है कि वे भारत के हितों पर गौर करें।

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