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बातचीत से ही बात बनेगी
मरिआना बाबर
Updated Thu, 18 Jun 2015 08:38 PM IST
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रमजान का पवित्र महीना शुरू हो गया है। इस बार रमजान गर्म दिनों में आया है, इसलिए रोजा रखने वालों के लिए यह सचमुच कठिन होगा। रमजान की पूर्वसंध्या पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सुखद आश्चर्य हुआ, जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीफोन कर उन्हें पवित्र रमजान की मुबारकबाद दी। मुबारकबाद का सुखद आदान-प्रदान कइयों के लिए सुकूनदेह है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में द्विपक्षीय रिश्ते इतने बिगड़ गए थे कि एक सामान्य टेलीफोन ही रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने के लिए काफी था।
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बहरहाल, दोनों मुल्कों के अवाम का जीवन सामान्य ढंग से चल रहा है। पहली बार करीब पचास पाकिस्तानी युवा विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों में इंटर्न (प्रशिक्षु) के रूप में भारत में काम कर रहे हैं। यह इन युवाओं की व्यावहारिकता का सुबूत है, जो दोनों मुल्कों की सरकारों के बीच बेहतर रिश्ते न होने के बावजूद अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जब बाद में वे नौकरी के लिए कहीं आवेदन करेंगे, तो भारतीय कंपनियों के साथ काम करने का अनुभव उनके सीवी का खास पक्ष होगा।
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मुंबई को छोड़कर, जहां अब भी लोग पाक आतंकी गुट के हमलों को नहीं भूले हैं, पाकिस्तानी पर्यटकों का भारत के तमाम नगरों में स्वागत किया जाता है। अगर पाकिस्तान में मुंबई हमलों से संबंधित मुकदमे की सुनवाई पूरी हो जाती, तो पाकिस्तानी पर्यटकों के प्रति मुंबईवासियों के व्यवहार में भी काफी बदलाव आता। इस मामले को लंबे समय तक घसीटा गया, और संदिग्ध लोग जमानत पर बाहर घूम रहे हैं। पाकिस्तान के लोगों ने खुद मांग की है कि मुंबई हमले मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी की जाए और दोषियों को सजा मिले। जब भी किसी भारतीय राजनेता का कोई कठोर बयान आता है, तो पाकिस्तान में ऐसे समझदार लोग भी हैं, जो महसूस करते हैं कि सरकार को इन बयानों की अनदेखी करनी चाहिए।
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हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें सार्क देशों के राजदूत पाकिस्तान आए थे। वरिष्ठ राजनयिकों ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सुझाव दिया कि चाहे भारत की ओर से कितना भी उत्तेजक बयान क्यों न आए, पाकिस्तान को उसका जवाब नहीं देना चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि कूटनीति को एक मौका देना चाहिए और शांतिपूर्ण पड़ोसी की जिस नीति में नवाज शरीफ भरोसा करते हैं, उसे जारी रखना चाहिए।
सभी देशों की पड़ोसियों से समस्याएं रहती हैं, पर यदि बातचीत ही खत्म कर दी जाए, तो इन समस्याओं का समाधान कैसे होगा? अतीत में भारत की सरकारों ने जम्मू-कश्मीर समेत सियाचिन ग्लेशियर, सर क्रीक, पानी की कमी और आतंकवाद जैसे तमाम मुद्दों पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की है। हालांकि विवादित मुद्दों में से किसी का पूरी तरह समाधान नहीं निकल पाया, लेकिन वार्ता के जरिये कुछ प्रगति हुई थी और अगर बातचीत के दौरान कुछ हालिया मुद्दे सामने आते हैं, तो उस पर विचार किया जा सकता है। अगर भारत अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ बातचीत नहीं करेगा, तो पाकिस्तान में वैसे तत्व मजबूत होंगे, जो दोनों मुल्कों के बीच बेहतर रिश्ते नहीं चाहते।
आतंकवाद यहां एक ज्वलंत समस्या है। इस क्षेत्र में कोई भी देश अकेले इससे नहीं निपट सकता। यदि सार्क के सभी देश इस पर विचार-विमर्श के लिए इकट्ठा होते हैं, तो वे दुनिया को भी दिखा देंगे कि आतंकवाद के मुद्दे पर यह क्षेत्र गंभीर है। लेकिन इससे पहले सभी देशों को एक-दूसरे पर पूरा भरोसा करना होगा और संदेहों को दूर करना होगा। तभी वास्तविक समस्याओं पर चर्चा हो सकती है।
पाकिस्तान लंबे समय से शिकायत करता रहा है कि भारत बलूचिस्तान में हस्तक्षेप करता है और अफगानिस्तान में बलूच अलगाववादियों की मदद करता है। ईरान पाकिस्तान पर आरोप लगाता है कि वह पाकिस्तान-ईरान सीमा पर ईरान-विरोधी गुटों को सीमा पार करने की अनुमति देता है, जिनका मकसद ईरान को अस्थिर करना है। अतीत में इन आतंकी गुटों को वाशिंगटन से बुश प्रशासन द्वारा वित्तीय सहायता मिलती थी। भारत इस बात के प्रति सतर्क है कि पाकिस्तानी आतंकी गुटों द्वारा फिर से मुंबई हमले जैसी कोई घटना नहीं हो।
सार्क देशों के बीच इस तरह की समझदारी संभव है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि वर्षों के मतभेद को भुलाकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसियां आतंकवाद के आम खतरे से निपटने में सहयोग के लिए सहमत हो गई हैं। दोनों मुल्क अपने अतीत की उन नीतियों को सुधारने में लगे हैं, जिसने किसी को फायदा नहीं पहुंचाया। हालांकि यह नई पहल कितनी कारगर होगी, यह कहना अभी जल्दबाजी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि शुरुआत में रास्ते में बाधाएं आएंगी। दशकों के अविश्वास को खत्म होने में समय लगेगा, उसके बाद ही रिश्ते सामान्य होंगे। लेकिन कम से कम शुरुआत तो हुई।
अभी भारत के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन प्रोफेसर वेद प्रकाश सार्क शिक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेने इस्लामाबाद आए थे। उन्होंने सार्क क्षेत्र में उच्च शिक्षा के अधिक संस्थानों की जरूरत पर बल दिया, ताकि लोग साझा मुश्किलों से मिलकर निपट सकें। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन की साझा चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है कि सभी सार्क देश एकजुट हों। सार्क देशों के लोगों की साझा नियति पर चर्चा करने के लिए सात शिक्षण संस्थानों के प्रमुख एक मेज पर बैठे थे। यदि शिक्षाविदों में इस तरह का सहयोग दिख सकता है, तो संभवतः वह वक्त आ गया कि सार्क देशों, विशेष तौर पर भारत और पाकिस्तान के राजनेताओं को भी अपने नागरिकों के हितों के लिए अपनी समस्याओं पर निरंतर सार्थक बातचीत करनी चाहिए, ताकि पड़ोस में शांति कायम हो।
-लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं