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...और विश्व कप में गोल हो गया
सत्येन्द्र पाल सिंह/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 21 Jun 2014 09:17 PM IST
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पेशे से अंग्रेजी के प्रोफेसर नोवी कपाड़िया का पहला प्यार फुटबॉल है। चार दशक से भी ज्यादा से फुटबॉल के हर बदलाव पर उनकी पैनी निगाह रही है। नोवी देश के जाने-माने फुटबॉल समीक्षक और कमेंटेटर हैं। नोवी की किताब ‘द फुटबॉल फैनेटिक्स एसेंशियल गाइड’ 1930 में उरुग्वे से लेकर 2010 में दक्षिण अफ्रीका में हुए अब तक कुल 19 विश्व कपों की कहानी के साथ फुटबॉल प्रेमियों को बुद्धिविलास का पूरा मौका देती है। किताब अंग्रेजी में 19 अध्याय में है।
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बकौल नोवी उन्होंने यह किताब जनवरी 2014 के आखिर में शुरू कर मार्च के आखिर में पूरी की। विश्व कप के हर अध्याय के साथ-साथ सबसे रोचक पन्ना है ‘एक्स्ट्रा टाइम’। 1934 में मुसोलिनी किस तरह हर कीमत पर इटली को विश्व कप जिताना चाहते थे। इसमें मुसोलिनी ने अर्जेंटीना के तीन सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की राष्ट्रीयता बदल कर इटली के लिए खेलने को राजी किया। इससे इटली ने आखिर विश्व कप खिताब जीत कर ही दम लिया।
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तब लुइस मोंटी दुनिया के पहले और अकेले ऐसे खिलाड़ी बने, जिन्होंने दो मुल्कों (अर्जेंटीना और इटली) के लिए खेलकर टीम को चैंपियन बनाया। 1978 के विश्व कप में स्कॉटलैंड के विली जॉनस्टन के डोपिंग में पकड़े जाने पर बैन होने, 1986 में डिएगो माराडोना के हैंड ऑफ गॉड गोल जैसे रोचक किस्सों से भरी है। 1994 के विश्व कप में माराडोना के ड्रग टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने पर बाहर किए जाने का किस्सा भी है।
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2006 में ब्राजील के रोनाल्डो (15 गोल) द्वारा जर्मनी के मुलर (14 गोल) के विश्व कप में सबसे ज्यादा गोल करने के रिकॉर्ड को तोड़ने का उल्लेख है। नोवी बताते हैं कि फुटबॉल के पहले सुपरस्टार ब्राजील के पेले और दीदी से भी पहले उरुग्वे के जोस एंड्राडे थे। वह ‘ब्लैक मार्वल’ के नाम से ख्यात हुए। 1958 में पेले के सबसे कम महज 17 बरस की उम्र में फाइनल खेलने और गोल करके ब्राजील को विश्व कप जिताने की कहानी भी लेखक ने बयां की है।
इस किताब में पाठक जान पाते हैं कि 1950 विश्व कप के लिए क्वॉलिफाई करने और ब्राजील में आयोजकों के इसमें शिरकत करने के बराबर अनुरोध के बावजूद भारत के शिरकत नहीं करने का कारण केवल उसके खिलाड़ियों का नंगे पांव खेलना ही नहीं था। अखिल भारतीय फुटबॉल संघ (एआईएफएफ) ने इसके लिए सही ढंग से तैयारी ही नहीं की थी। ब्राजील पहुंचने के लिए पानी के जहाज से दो महीने की यात्रा और फुटबॉल में एमेच्यर और प्रोफेशनल खिलाड़ियों के नियमों को लेकर भ्रम के कारण ही भारतीय फुटबॉल टीम ने इसमें शिरकत नहीं की।
1962 में चुन्नी गोस्वामी, बलराम, जरनैल, पीके बैनर्जी और पीटर थंगराज की मौजूदगी में जकार्ता एशियाड में सोने का तमगा जीतने के बाद एआईएफएफ के ढुलमुल रवैये के कारण भारत दूसरी बार विश्व कप में खेलता-खेलता रह गया। कुल मिलाकर फुटबॉल फीवर के इस दौर में यह किताब जरूर पसंद की जाएगी।