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हिंद महासागर पर नजर

Sat, 07 Oct 2017 10:53 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Sat, 07 Oct 2017 10:53 AM IST
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Focus on Indian Ocean
हिंद महासागर

पिछले दिनों भारत की यात्रा पर आए अमेरिकी रक्षा मंत्री सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल मैटिस ने हमारी उम्मीद से अलग किसी भी हथियार सौदे के बजाय इस बात पर ज्यादा जोर दिया कि अफगानिस्तान में अमेरिकी एजेंडे को आगे बढ़ाने में भारत क्या मदद कर सकता है। इसलिए ऐसा लगता है कि विशेष रूप से अफगानिस्तान और सामान्य तौर पर हिंद महासागर क्षेत्र में अगर अमेरिका और भारत की रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाना है, तो मोदी सरकार की क्षेत्रीय रणनीति को इस क्षेत्र से संबंधित अमेरिका की नई रणनीति के साथ जोड़ने की जरूरत होगी।


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इसलिए अब सवाल यह उठता है कि अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर भारत अपना कार्ड कैसे खेल सकता है कि न केवल हमें इसका लाभ मिले, बल्कि हमारी रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रहे?   
पहले भारत की ओर से यह घोषणा की गई थी कि 'अफगानिस्तान की धरती पर कोई भी भारतीय जवान लड़ाई लड़ने नहीं जाएगा।' और यहां तक कि भारतीय रक्षा मंत्री ने जाहिर तौर पर अपनी उन चिंताओं को जाहिर किया कि हम नहीं चाहते कि अफगानिस्तान में अमेरिकी और उसके सहयोगी सैनिकों को जो भुगतना पड़ रहा है, वह हमारे भारतीय सैनिकों को भुगतना पड़े। एक दशक से ज्यादा के हस्तक्षेप के बावजूद अमेरिकी और उसके सहयोगी देशों के सैनिक ऐसे अंतहीन दलदल में फंसे हैं कि अब भी उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी है।

हालांकि अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में से 31 में कुछ भारतीय विकास परियोजनाओं से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा युद्धग्रस्त अफगानिस्तान की धरती पर बहुत से भारतीय मिशनों को भारतीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों से सुरक्षा मिलती है।
 
इस तथ्य को बहुत कम महत्व दिया गया कि अमेरिका भी हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप का मुकाबला करने के लिए भारत को मजबूत बनाना चाहता है। इसके लिए भारत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत के बाद) अमेरिका से 22 गार्जियन शिकारी नौसैनिक टोही ड्रोन हासिल कर सकता है, जो संभवतः अब तक की सबसे उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकी है और जिसकी पेशकश अमेरिका ने भारत से की है। यह निश्चित रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसैनिक की निगरानी क्षमता को बढ़ाएगा। और यदि भारतीय नौसेना इससे सुसज्जित हो जाएगी, तो यह उसकी क्षमता को और समृद्ध करेगा। पाकिस्तान तो हमारी क्षमता से चिंतित है ही, बीजिंग की भी चिंता बढ़ जाएगी।

लेकिन अमेरिकी समर्थन के तमाम आश्वासनों के बावजूद भारत इस पहलू की अनदेखी नहीं कर सकता कि भारत चीन की आक्रामकता का सामना करने वाला अग्रणी देश है और अगर भारत को युद्ध के लिए मजबूर किया जाता है, तो चीन-पाकिस्तान की मिलीभगत को देखते हुए उसे दो मोर्चे पर युद्ध की तैयारी करनी होगी। ज्यादातर पर्यवेक्षकों का मानना है कि दोकलम गतिरोध हिमालयी क्षेत्र में अंतिम गतिरोध नहीं था, जहां चीन का सामना करने वाला भारत अग्रणी देश है। अभी हाल ही में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बी. एस. धनोआ ने बताया कि चीनी सैनिक अब भी दोकलम के चुंबी घाटी में तैनात हैं। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि वे जल्द ही वहां से चले जाएंगे, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चीनी सैनिक फिर से दोकलम में सड़क को लेकर काम कर रहे हैं। वायुसेना प्रमुख ने यह भी कहा कि यों तो टकराव की आशंका नहीं है, लेकिन यदि ऐसा कुछ होता है, तो हम जवाब देने के लिए तैयार हैं।

भले ही भारत को कम से कम इस समय हिंद महासागर क्षेत्र में चीन से बढ़त हासिल है और पाकिस्तान से बहुत ज्यादा श्रेष्ठता प्राप्त है, लेकिन हिंद महासागर क्षेत्र में उसे अपनी शक्ति प्रदर्शन को आगे बढ़ाने के लिए नौसैनिक परिसंपत्तियों को बढ़ाना होगा। इससे हिमालयी क्षेत्र में चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं पर उपयुक्त तरीके से नियंत्रण किया जा सकता है और भारत-पाक संदर्भ में भी यह कारगर हो सकता है, क्योंकि टकराव की स्थिति में भारतीय नौसेना आसानी से पाकिस्तान की तटीय रेखा को अवरुद्ध कर सकती है।

इसलिए भारत को एक ऐसी रणनीति तैयार करनी होगी, जो अमेरिका को बातचीत की मेज पर लाए, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत अमेरिका के साथ कितनी दूर तक आगे बढ़ना चाहता है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका अब भी चीन के साथ आक्रामकता से मुकाबला नहीं करना चाहता है, क्योंकि अमेरिका के साथ चीन की भारी आर्थिक भागीदारी है।

और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भले ही पाकिस्तान को आतंकवादी संगठनों को पनाह देने के लिए शर्मिंदा किया गया हो, (संभवतः पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कहा है), लेकिन पाकिस्तान पर अमेरिका की निर्भरता तब और बढ़ेगी ही, जब अफगानिस्तान के प्रति उनकी नई रणनीति (वहां और जवानों को तैनात करने और अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के रुकने की इच्छा) को लागू किया जाएगा।

संक्षेप में, अफगानिस्तान का तात्कालिक ध्यान भले ही अमेरिकी प्रशासन पर केंद्रित हो, पर भारत को अपनी सॉफ्ट पावर के साथ अमेरिकियों को जीतने की योजना बनानी चाहिए और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के प्रति बाध्यकारी प्रतिबद्धता के लिए अमेरिकी नौसैनिक की शक्तिशाली ताकत को आकर्षित करने के लिए विकासात्मक पहल करनी चाहिए। हिंद महासागर न केवल दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री व्यापार मार्ग है, बल्कि एशिया में विकास की कुंजी भी है। यदि एशिया के दो बड़े देशों-चीन और भारत के बीच कोई संघर्ष होता है, तो उसका भविष्य भी हिंद महासागर पर ही निर्भर करेगा।

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