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लचीलेपन से काम नहीं चलेगा

Fri, 11 Jan 2013 10:34 PM IST
वेदविलास उनियाल
वेदविलास उनियाल Updated Fri, 11 Jan 2013 10:34 PM IST
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flexibility will not work

भारतीय सीमा पर घात लगाकर दो सैनिकों के साथ जिस तरह बर्बरता की गई, वह एक और उदाहरण है कि रिश्तों को बेहतर बनाने की भारतीय पहल का जवाब पाकिस्तान किस तरह देता है। सवाल है कि ऐसे में हमारी नीति क्या हो। इस ज्वलंत मुद्दे पर लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) हीरावल्लभ काला से वेदविलास उनियाल ने बातचीत की-

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- वर्ष 2003 में भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम लागू हुआ। फिर भी पाकिस्तान समय-समय पर उकसावे वाली कार्रवाई को अंजाम दे रहा है। वह नियंत्रण रेखा मानने को तैयार नहीं। हमारी ओर से चूक कहां हुई है?
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हमारी तरफ से बेशक संबंधों को बनाने की पहल हुई है। लेकिन पाकिस्तान की मंशा कुछ और है। वहां की आंतरिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं। वहां आए दिन बम विस्फोटों में लोग मर रहे हैं। वहां की सरकार और सैनिक शासन सीमा पर दुस्साहसी कार्रवाइयों के जरिये देश का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है। इसके अलावा पाकिस्तान हमेशा कश्मीर विवाद के अंतराष्ट्रीयकरण की कोशिश में लगा रहता है। इस बार भी उसने ऐसा ही प्रयत्न किया, जब भारत की शिकायत पर उसने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने की बात कही। वीजा प्रक्रिया को सरल बनाने और क्रिकेट शुरू करने के हमारे फैसले गलत नहीं हैं। पर हमें थोड़ी दृढ़ता भी दिखानी चाहिए। ऐसी घटनाओं का तीखा विरोध करना चाहिए। यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि भारत कुछ बातें कहेगा और घटना भुला दी जाएगी। दुर्भाग्य से अब तक ऐसा हो रहा है।
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- क्या हमारी सेना आंतरिक तौर पर कमजोर है? हथियारों की कमी की भी बात कही गई है।
बिल्कुल नहीं। भारतीय सेना पूरी तरह सक्षम है। दरअसल जिस क्षेत्र में वारदात हुई है, वहां घने कोहरे में कई बार हाथ भर की दूरी की चीजें नजर नहीं आतीं। मैं उस क्षेत्र में लंबे समय तक तैनात रहा हूं। वहां चौकियों के बीच लंबे फासले होते हैं। ऐसे में घुसपैठ की आशंका बनी रहती है। लेकिन यहां घुसपैठ कर सैनिकों को न सिर्फ मारा गया, बल्कि उनके शव को विकृत किया गया। इस तरह की क्रूरता के जरिये पाकिस्तान अपने कुटिल इरादों के बारे में ही बता रहा है।

- अगर पाकिस्तान के इरादे यही हैं, तो ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहेंगी। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
एक रास्ता तो बातचीत का ही है। कोई नहीं कहेगा कि बातचीत के सारे रास्ते खत्म कर दो। हां, बहुत तनाव की स्थिति में कुछ समय इससे परहेज किया जा सकता है। लेकिन बातचीत की मेज पर तो आना ही पड़ेगा। बदलती दुनिया आर्थिक, सामाजिक सभी पहलुओं पर सोचकर चलती है। हमें सीमा पर अधिक चौकस होना पड़ेगा। हम अक्सर कहते हैं कि सेना के सभी निर्णय शासक नहीं ले सकते। कई ऐसे गंभीर मामले हैं, जिनमें सेनाधिकारियों की सलाह लेनी चाहिए। भारत-पाकिस्तान का मामला राजनयिक स्तर पर देखने की प्रक्रिया में सेना को एक पक्ष मानना ही चाहिए। उसकी अनदेखी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यदि जरूरी हो, तो पाकिस्तान को सबक सिखाने से नहीं चूकना चाहिए। सबक के लिए केवल बड़ा युद्ध ही जरूरी नहीं होता।


- इस करतूत में सेनाध्यक्ष जनरल कयानी की भूमिका पर उंगली उठ रही है।
देखिए, स्थानीय कमांडर ऐसे बड़े निर्णय नहीं ले सकता। निश्चित तौर पर सेना के आला अधिकारी और शासन का इसमें हाथ होता है। यह तो नहीं कह सकते कि कयानी ने पद पर बने रहने के लिए ऐसी घटना को अंजाम दिया होगा, लेकिन उनके इरादे कभी छिपे हुए नहीं रहे। साफ है कि योजना बनाकर ही पाक सेना ने इसे अंजाम दिया है। पाकिस्तान की तरफ से जो बयान आए हैं, वे भी उसकी मंशा का ही खुलासा करते हैं।

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