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फिक्सिंग कहां नहीं है

Sun, 25 Aug 2013 08:53 PM IST
योगेंद्र शर्मा
योगेंद्र शर्मा Updated Sun, 25 Aug 2013 08:53 PM IST
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Fixing is everywhere

आईपीएल में हुई फिक्सिंग से हताश मेरी धर्मपत्नी ने भविष्य में टीम इंडिया का मैच देखने से ही साफ मना कर दिया है। उन्हें विस्तार से समझाने में मेरे पसीने छूट रहे हैं कि फिक्सिंग कोई आज की समस्या नहीं है, यह सदा-सदा से होती रही है। विष्णु के अवतार होते हुए भी श्रीराम ने बालि का वध जिस तरह किया था, उसे क्या कहेंगे? महाभारत में जयद्रथ वध जैसे प्रसंगों में फिक्सिंग साफ दिखती है। हमारे पुराने कवियों ने इसे छिपाया भी नहीं है। तुलसीदास तो आत्मा और परमात्मा की फिक्सिंग का यह कहते हुए खुलासा कर गए हैं कि ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

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इधर हमारे यहां सिनेमा की शताब्दी मनाई गई। लेकिन शुरू से आज तक हिंदी सिनेमा में हम फिक्सिंग ही तो देख रहे हैं। नायक और नायिका में एक गरीब होता है, दूसरा अमीर। नायक पहली बार नायिका को छेड़ता है, तो वह उपेक्षा करती है, दूसरी बार लड़ पड़ती है, तीसरी बार शरमा जाती है, फिर दोनों ड्यूट गाते हैं। तभी दाल-भात में मूसलचंद बन विलेन आ टपकता है। वह नायिका का अपहरण कर लेता है। अकेला हीरो विलेन के बीस हट्टे-कट्टे चमचों को उसके अड्डे में ही ललकारता है और विलेन के चमचे एक-एक कर हीरो से पिटते जाते हैं। हीरो की व्यस्तता का लाभ उठाकर विलेन फिर हीरोइन को लेकर भागता है। हीरो उसका पीछा करता है। युद्ध के अंतिम चरण में पुलिस घायल विलेन को ले जाती है और नायक-नायिका मिलते हैं। इसी तरह की फिल्में हमारे बाप-दादे ने देखी थी, अब हम देख रहे हैं, और खुदा ने चाहा, तो हमारे बच्चे के बच्चे भी देखेंगे। फिक्सिंग की इस अनंत कथा पर तो किसी की भौंहें नहीं तनतीं। फिर आईपीएल में फिक्सिंग से इतनी नाराजगी क्यों है?
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अब देखिए, राजनीतिक पार्टियों तक में फिक्सिंग पक्की है। सरकार घोटालों को पचाने में लगी है और विपक्ष उससे इस्तीफा मांगने में। बहुतेरी पार्टियां दोनों नावों पर पैर धरे अंदर से सरकार को समर्थन दे रही है, और ऊपर से इस्तीफा मांग रही है। यह अंदरखाने फिक्सिंग है। उत्तर प्रदेश में दो राजनीतिक पार्टियां आने वाले चुनाव को देखकर सांप्रदायिक खेल की फिक्सिंग में लग गई हैं। उन्हें लगता है कि इससे उन दोनों को ही लाभ होगा और पब्लिक कुछ नहीं समझेगी।
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मुश्किल यह है कि फिक्सिंग पर इतने सारे तर्क भी मेरी पत्नी को प्रभावित नहीं कर रहे। अब लगता है, बुढ़ापे में टीवी पर साथ मैच देखने का आनंद भी छूट जाएगा।

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