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आंकड़े घटे, लेकिन खतरा बाकी
अजय साहनी
Updated Sun, 11 Feb 2018 07:34 PM IST
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वर्ष 2004 के बाद नक्सलियों ने अपने सांगठनिक विस्तार के लिए जो रणनीतिक भूलें की थीं, उसके परिणाम अब दिखने लगे हैं। 2015 में देश के 75 जिले ऐसे थे, जहां नक्सलियों ने हिंसक घटनाएं अंजाम दी थीं। इनकी संख्या 2016 में घटकर 67 और 2017 में और कम होकर 58 तक आ गई है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ये घटते आंकड़े एक नई उम्मीद जगाते हैं। ठीक इसी समय महाराष्ट्र पुलिस ने एक माओवादी सरगना रमन्ना को उसकी पत्नी के साथ गिरफ्तार किया है, जो माओवादियों के लिए हथियार बनाने का काम करता था और जिस पर 25 लाख रुपये का इनाम था।
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दरअसल नक्सल आंदोलन को धार देने के लिए माओवादी ऐसे इलाकों में घुस गए, जहां उन्हें जितना समर्थन मिला, उससे कहीं ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। नक्सलियों ने इन इलाकों में अपने काडरों की संख्या बढ़ाने की कोशिश की, मगर उनकी इस कोशिश में कई ऐसे लोग नक्सली बने, जो पुलिस और खुफिया तंत्र के बड़े काम आए। 2009-10 के दौरान नक्सलियों के खिलाफ केंद्र सरकार की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। सरकार ने माओवादी सरगनाओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया। तब से पिछले वर्ष तक नक्सलियों के कुल 976 नेताओं को बेअसर किया गया, जिसका अर्थ है उन्हें या तो मार दिया गया या फिर उन्हें पकड़ा गया है।
काडर स्तर पर पकड़े गए नक्सलियों की संख्या और भी ज्यादा है, लेकिन नेतृत्व पर आघात सबसे ज्यादा कारगर साबित हुआ। एक वक्त था, जब राष्ट्रीय स्तर पर नक्सलियों के तीन दर्जन से अधिक नेता हुआ करते थे, जो अब घटकर आधे से भी कम रह गए हैं। कभी दस राज्यों में प्रभाव रखने वाले नक्सली आज मात्र चार राज्यों में सिमट कर रह गए हैं, और उसमें भी यदि छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए, तो शेष राज्यों के मात्र कुछेक जिलों में ही नक्सली खौफ शेष है।
ऐसा नहीं है कि नक्सलवाद के कम होते खतरे को देखते हुए सुरक्षा बलों की कुल बटालियनों की तैनाती कम की गई है, बल्कि इसमें बढ़ोतरी ही हुई है। लेकिन सुरक्षा बलों की दूसरी जरूरतों में कमी आई है, फिर चाहे वह उनके लिए विशेष प्रशिक्षण हो या फिर नए उपकरणों के लिए किया जाने वाला खर्च। अक्सर यह दबाव पैदा होता है कि सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होते ही इसका खर्च कम किया जाना चाहिए। अंग्रेजी में इसे सिक्युरिटी पैराडॉक्स कहते हैं, जबकि किसी भी अन्य क्षेत्र की सफलता में निवेश बढ़ाने की बात की जाती है। यदि यह सिक्युरिटी पैराडॉक्स बरकरार रहता है, तो छह महीने या कुछ और वक्त बाद फिर से पुरानी परिस्थितियां वापस आ जाती हैं। मसलन, एक जीत के बाद यदि हमने अपनी क्षमताएं कम करनी शुरू कर दीं, तो दुश्मन को मौके मिलेंगे और वह दोबारा मजबूत होगा। नक्सलवाद के मामले में हमें इस मानसिकता से निकलना होगा। देश की आंतरिक सुरक्षा को केवल कमजोर होते नक्सलियों के दायरे में न रखकर पूर्वोत्तर के उग्रवादियों तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं को भी ध्यान में रखना होगा। इन सभी चुनौतियों से एक साथ निपटने के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। वैसे भी दुनिया रूपी कॉलोनी के जिस मोहल्ले (दक्षिण एशिया) में हम रहते हैं, उसमें कई ऐसे पड़ोसी हैं, जिन्हें हमारी तरक्की फूटी आंखों नहीं सुहाती। किसी भी खुशफहमी से इतर हमें देश के लिए सबसे प्रतिकूल परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।
नक्सलियों का प्रभाव कम होने में विकास कार्यों की भी अहम भूमिका है। अनेक नक्सलियों ने भी कई मौकों पर यह स्वीकार किया है कि उन लोगों में जागरूकता बढ़ी है, जिन्हें वे पहले अपनी विचारधारा से आसानी से प्रभावित करते थे। नक्सल आंदोलन के प्रति अब उन लोगों में अरुचि स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। जिन आदिवासियों को खाने के लिए रोटी नहीं मिलती थी, वे आज अपने घरों मैं बैठकर टीवी देख रहे हैं। मगर एक बात ध्यान रखने वाली है कि विकास से पहले सुरक्षा आती है। इसलिए हमें किसी भी विकास कार्य से पहले सुरक्षा के पहलू को महत्व देना होगा।
माओवादियों के सिकुड़ते दायरे को दर्शाने वाले आंकड़ों के पीछे कुछ स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों का भी हाथ होता है, जो अपने काम को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। प्रदर्शन के दबाव से कई बार गलत ऑपरेशन अंजाम दिए जाते हैं। ऐसे ऑपरेशनों से तात्कालिक लाभ भले ही हो, पर आगे चलकर राज्य को नुकसान ही उठाना पड़ता है। एक भी निर्दोष व्यक्ति यदि पकड़ा जाता है, तो न सिर्फ वह व्यक्ति, बल्कि उसको जानने वाले कई लोगों का व्यवस्था से मोहभंग होता है।
इसकी पूरी आशंका है कि लाल साम्राज्य के ढलते सूरज के बावजूद माओवादी दोबारा उभरने की कोशिश करें। अपना अस्तित्व बचाने के लिए वे नए इलाकों की तलाश कर रहे हैं। खुफिया तंत्र द्वारा नक्सलियों के जब्त किए गए दस्तावेजों में इस बात की पुष्टि होती है कि वे अपने आंदोलन को नए ठिकानों से संचालित करने की फिराक में हैं। लेकिन उनके लिए यह काम इतना आसान नहीं रह गया है। दरअसल किसी भी ताकत के कमजोर होते ही उसके सहयोगियों की संख्या में कमी होती है।
समर्पण करने वाले अनेक नक्सलियों ने माओवादियों की रणनीतियों का भेद खोल दिया है। सुरक्षा बलों को चाहिए कि वे कमजोर होते नक्सल आंदोलन के खिलाफ अपने अभियान में और तेजी लाएं। तुलनात्मक रूप से यह आसान भी है, क्योंकि कमजोर होते दुश्मन को खत्म करना मुश्किल नहीं होता। यदि नक्सलियों पर मौजूदा दबाव बरकरार रखा जाए और ऑपरेशन की कुछ विकृतियां दूर हो जाएं, तो आगामी तीन-चार वर्षों में देश को नक्सलवाद की समस्या से पूरी तरह मुक्ति दिलाई जा सकती है। कम से कम माओवाद के संस्थानिक ढांचे को तो खत्म किया ही जा सकता है।
-कार्यकारी निदेशक, इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट