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बदलाव की लड़ाइयां अंजाम तक कैसे पहुंचें
अनुराग कश्यप/अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित फिल्मकार
Updated Thu, 01 Jan 2015 03:35 PM IST
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बीते बरसों में दुनिया इतनी सिमट चुकी है कि आप इसे अग्ली (विद्रूप) कह सकते हैं। लोगों ने खुद से बाहर झांकना बंद कर दिया है। नई सदी की दस्तक के बाद पिछले पंद्रह बरसों में दुनिया बहुत तेजी से बदली है। इस दौर में हमने बहुत उतार-चढ़ाव देखे।
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नई सदी की शुरुआत में हमने कुछ सकारात्मक बदलाव महसूस किए थे। इंटरनेट आया और मीडिया का विस्तार हुआ था, तो लगा कि सबको आवाज मिल गई। फिर इसका दूसरा रुख भी देखा। बड़ी संख्या में ऐसे लोग सामने आए, जो भीड़ में खड़े होकर सिर्फ चिल्लाते हैं। फिर लगने लगा कि वही जीवन अच्छा था, जब हम चिल्लाते नहीं थे। गुस्से और पीड़ा को अपने भीतर रखते थे, जो समय के साथ रचनात्मक रूप ले लेती थी। अब यह खत्म हो गया।
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आदमी के अंदर अगर कुछ पनपता है, तो वह सीधे जाकर उसे सोशल मीडिया में उड़ेल देता है। विचार पक नहीं पाते। किसी के पास कुछ सार्थक कहने को नहीं बचता। लोग जल्दी से जल्दी ठोस धारणाएं बनाने लगे हैं। उन्हें कुछ सुनना नहीं है। वैचारिक लचीलापन खत्म हो रहा है। अपना सच सबको परम सत्य लगने लगा है।
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चिंता की बात है कि हमारे दौर में सृजन खत्म हो रहा है। लेखक चुक रहे हैं। जमे हुए लेखक तक, जिनकी रचनाओं की प्रतीक्षा होती थी, फेसबुक और ट्विटर पर शोर मचाते हैं। खुद कहते हैं कि अच्छी किताबें कम हो गई हैं। वास्तव में सोशल मीडिया की दुनिया में दोमुंहेपन को बड़ी आवाज मिली है, जिससे रचनात्मकता का संतुलन बिगड़ गया है।
साल-डेढ़ साल पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की एक बयार आई थी। तब मैं चौंक गया था कि जो लोग कुछ साल पहले मुझसे कहते थे कि ′तुम चीजों को बदलने की क्या बात करते हो, पैसा कमाओ,′ वे भी इस लड़ाई में शामिल थे। ऐसे में बदलाव के प्रति मोहभंग क्यों नहीं होगा? बदलाव को लेकर मेरी लड़ाई सिनेमा तक सीमित थी। आज भी है। इसमें मैं जो कर सकता हूं, कर रहा हूं। इतनी बड़ी दुनिया है, जिसमें तलाश करने को बहुत कुछ है। मैं इस तलाश में निकल पड़ा हूं।
मैं उम्मीदों से भरा इंसान हूं और कई लोग मेरे आसपास हैं, जिनसे मुझे काफी आशा है। मैं सिनेमा में सांसें लेता हूं और सिनेमा में बदलाव देखना चाहता हूं। आजकल सब कुछ बहुत ज्यादा मात्रा में है। इसलिए लोगों में जुनून कम होता दिखता है। उनके सामने विकल्प होते हैं। वे किसी आदर्श के लिए नहीं लड़ना चाहते। इसके बावजूद ऐसे लोग भी हैं, जो रचनात्मक मूल्यों, समाज और सिनेमा को सार्थक दिशा देना चाहते हैं। मैं मानता हूं कि हर दौर में सच्चा काम करने वाले लोग कम होते हैं और दिखावा करने वाले ज्यादा। इसके लिए आप किसी को दोष नहीं दे सकते।
बदलाव की लड़ाइयों को हम अक्सर भटकते हुए देखते हैं, क्योंकि लोग भूल जाते हैं कि वे किस उद्देश्य से साथ आए थे। जैसा कुछ समय पहले आम आदमी पार्टी के साथ हुआ। लक्ष्य हासिल नहीं किया और उससे पहले ही आपस में झगड़ने लगे कि कौन ऊपर, कौन नीचे। 2014 में देश में बड़ा बदलाव लाने वाला मतदान हुआ। मैं डरा हुआ था, क्योंकि मुझे लगता था कि एक तरह का कट्टरपंथ आएगा। कहीं-कहीं कुछ ऐसा आज दिख भी जाता है, पर देश और समाज के विकास पर भी नजर है। मैं पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नहीं सोचना चाहता। इस सरकार को देखता हूं, तो इसमें दोनों रंग दिखते हैं। एक तरफ इसमें सांप्रदायिक तत्व दिखते हैं, तो दूसरी तरफ तरक्की पसंद लोग भी।
सांप्रदायिकता का डर सबसे बड़ा है। हमारे प्रधानमंत्री इसे बढ़ावा देते नहीं दिखते, पर मैं उन्हें ऐसे लोगों को रोकते हुए भी नहीं देख रहा हूं। वह देश के साथ विदेशी मोर्चों पर भी हमें दिखे हैं। दूसरे देशों की नजरें सिर्फ हमारे बाजार पर हैं। वे हमारे प्रधानमंत्री का जोर-शोर से स्वागत करते हैं, तो इसलिए कि एक विशाल देश का प्रमुख आया है, जो उनके लिए धन कमाने के दरवाजे खोल रहा है। लेकिन वे पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा में तरक्की की बात हमसे नहीं करते। विदेशी हममें दिलचस्पी ले रहे हैं, तो अच्छा है, क्योंकि वहां की चमचमाती कारें यहां भी आएंगी। लेकिन सड़कें कहां हैं? हमेशा दो विरोधाभासी चीजें एक साथ अस्तित्व में रही हैं। कांग्रेस के जमाने में भी भ्रष्टाचार और विकास साथ-साथ चल ही रहे थे। इसलिए मैं इस सरकार पर कोई निर्णायक राय बनाने से पहले दो-तीन वर्ष इंतजार करूंगा, क्योंकि मैंने उम्मीद नहीं खोई है।