{"_id":"19344cbe-bfd6-11e2-a4b2-d4ae52bc57c2","slug":"false-coin","type":"story","status":"publish","title_hn":"झूठ का सिक्का","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
झूठ का सिक्का
सुरेश सेन निशांत
Updated Sat, 18 May 2013 09:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमाचल प्रदेश में पले-बढ़े सुरेश सेन की कविताएं हर बार एक नया शब्द पाने, रचने और गढ़ने की मासूम सी कोशिश है। प्रफुल्ल स्मृति सम्मान और सूत्र सम्मान प्राप्त। कविता संग्रह ‘वे जो लकड़हारे नहीं हैं’ से एक कविता।
विज्ञापन
बची है
इतनी भर ईमानदारी
इतना भर शोक
बचा है।
कि झूठ के सिक्के का
चल निकलना
अच्छा नहीं समझते हैं लोग
उसे सम्मानित होते देख
हो जाते हैं उदास
भर जाते हैं घृणा से।
पर पता नहीं क्यों
मुखर होता नहीं उनका विरोध।
इस पाप की क्षमा
मांगते हैं वे हर रोज
अपने तैंतीस करोड़ देवताओं से।
इसलिए तो रहती है इतनी भीड़
मंदिरों और बाबाओं के पास
उनकी देहरी पे
मांगते रहते हैं वे माफी
रगड़ते रहते हैं नाक
धोते रहते हैं इस तरह
अपने मन और आत्मा की मैल।
आततायी हैं खुश कि
धवल हैं उनके वस्त्र
सफल हुए हैं वे
लहलहा रही है खूब
उनके अनाचार की फसल
धर्म भी है खुश
फल-फूल रहा है दिन दूना
उसका भी कारोबार
झूठ के सिक्के का भी
निखरा हुआ है रंग खूब
इस कृशकाय रंग उड़ी
सत्य की देह को देख।