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तल्ख माहौल में जी-20 से उम्मीद
आशुतोष चतुर्वेदी
Updated Tue, 03 Sep 2013 08:03 PM IST
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सबसे ताकतवर मुल्कों अमेरिका और रूस के बीच पाले खिचे हुए हैं और इसके बीच विभिन्न आर्थिक मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए रूस के शहर सेंट पिट्सबर्ग में जी-20 देशों के नेताओं का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। विश्व अर्थव्यवस्था अब भी संकट से मुक्त नहीं हुई है, बल्कि भारत जैसे देशों में तो संकट और बढ़ा है, लेकिन शिखर सम्मेलन में अमेरिका और रूस की तनातनी ही छाए रहने की आशंका है।
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आलम यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सम्मेलन में हिस्सा तो लेंगे, मगर मेजबान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात ही नहीं करेंगे। दोनों राष्ट्रपतियों के बीच न तो कोई द्विपक्षीय बैठक होगी और न अनौपचारिक मुलाकात! यह कुछ ऐसा ही है कि किसी की दावत में तो आप जाएं और कहें कि हमारे मतभेद हैं, इसलिए हम मेजबान से नहीं मिलेंगे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का यह भी एक रूप है।
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दरअसल अमेरिका अपने निगरानी कार्यक्रम को सार्वजनिक करने वाले एडवर्ड स्नोडेन को रूस में शरण देने से खीजा हुआ है। नाराजगी इतनी गहरी कि शुरुआत में तो खबरें आईं कि ओबामा शायद जी-20 सम्मेलन में हिस्सा लेने रूस नहीं जाएंगे। यही नहीं, सम्मेलन रूस के बजाय किसी और देश में आयोजित करने की भी बात उठी। हालांकि बाद में अमेरिका ने थोड़ा लचीला रुख अपनाते हुए घोषणा की कि राष्ट्रपति ओबामा सम्मेलन में शिरकत करेंगे, मगर पुतिन से उनकी मुलाकात नहीं होगी।
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स्नोडेन प्रकरण के अलावा सीरिया के बढ़ते संकट की वजह से भी अमेरिका और रूस के बीच तनाव बढ़ा है। ओबामा सीरिया की असद सरकार के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं, तो पुतिन वहां सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। ऐसे में अमेरिका और रूस के बीच बढ़ती तल्खी में विशेषज्ञ शीतयुद्ध के नए दौर की शुरुआत देख रहे हैं। खुद ओबामा ने भी एक इंटरव्यू में आरोप लगाया है कि रूस शीतयुद्ध वाले दौर की मानसिकता में लौट रहा है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद तकरीबन ढाई दशक बाद दरअसल पुतिन भी रूस को एक बड़ी शक्ति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जाहिर है, ऐसे माहौल में होने जा रहे जी-20 सम्मेलन से किसी बड़ी आर्थिक सहमति की उम्मीद करना बेमानी होगा। जब दुनिया आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही हो, तो आर्थिक मसलों को हल करते समय थोड़े समय के लिए राजनीतिक मतभेदों को अलग रखा जाना चाहिए, लेकिन इसके आसार कम ही नजर आ रहे हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि जी- 20 एक अहम मंच है, जिसमें सभी पांच महाद्वीपों के प्रतिनिधि शामिल हैं और जिसके फैसले दुनिया की मौजूदा आर्थिक स्थिति को रेखांकित करते हैं। मगर समस्या यह है कि जी-20 देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से काफी भिन्न हैं, उनकी समस्याएं अलग हैं और आर्थिक संकट से दो-चार होने को लेकर उनके विचार भी अलग-अलग हैं। फिर चाहे आर्थिक संकट के कारक भले ही एक जैसे हों।
मुश्किल यह भी है कि हर देश अपने हित पर जोर देता है। उदारीकरण के इस दौर में अर्थव्यवस्थाएं आपस में इतनी गुंथी हुई हैं कि वे एक-दूसरे को गहरे तक प्रभावित करती हैं। मसलन, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को यदि जुकाम हो जाए, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को भी छीकें आने लगती हैं।
जी-20 इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसमें आर्थिक मंदी के दौर से निकलने के काम में कमजोर अर्थव्यवस्थाओं की सहायता पर सहमति बनाई जा सकती है। भारत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की समस्या दूसरी है। इन देशों के मुद्रा बाजारों में अमेरिका के नीतिगत कदमों के कारण भारी हलचल मची हुई है।
इसमें सबसे अधिक भारत प्रभावित हुआ है। पिछले कुछ महीनों में रुपये की बुरी गत हुई है और वह डॉलर के मुकाबले 20 प्रतिशत तक लुढ़क गया है। इसके पीछे जहां भारतीय अर्थव्यवस्था के घरेलू कारण जिम्मेदार हैं, तो दूसरी ओर अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने राजकोषीय प्रोत्साहन वापस लेने के संकेत दिए हैं। इसके बाद तो अमेरिकी फंड ने भारत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से डॉलर निकालना शुरू कर दिया। जाहिर है कि मुद्रा बाजारों में उथल-पुथल भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बातचीत का अहम हिस्सा होगी।
मुद्रा अवमूल्यन से भारत के अलावा दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देश भी प्रभावित हुए हैं। शिखर सम्मेलन से यह उम्मीद तो नहीं है कि वह मुद्रा बाजारों पर बने दबावों को घटाने के उपायों पर मंजूरी की मुहर लगाएगा, लेकिन भारत का जोर इस पर चर्चा कराने का अवश्य होगा।
यह दौरा मनमोहन सिंह को ब्रिक्स देशों- ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं से मिलने का अवसर देगा और वे डरबन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर चर्चा कर सकते हैं। पांचों उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस वर्ष मार्च में डरबन में सहमत हुई थीं कि वे गरीब देशों की मदद के लिए 100 अरब डॉलर का एक मुद्रा कोष तैयार करेंगी। लेकिन भारत सहित इनमें से कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं मुश्किल में हैं और इस मोर्चे पर कोई प्रगति की उम्मीद कम है।
ओबामा-पुतिन के मतभेदों के कारण आर्थिक मोर्चे पर कोई बड़ी सहमति भले न हो पाए, पर शिखर सम्मेलन के बाद एक घोषणापत्र जारी हो सकता है। उल्लेखनीय है कि 2009 अमेरिका के पिट्सबर्ग में आयोजित शिखर सम्मेलन में वित्तीय बाजारों के लिए प्रस्तावित निर्देशों को यूरोपीय संघ के देशों ने कानून का रूप प्रदान किया था। इसके 2010 में कनाडा में हुए शिखर सम्मेलन में निर्णय लिया गया था कि सभी सदस्य-देश सरकारी खर्चों में कमी करेंगे। लेकिन जैसे माहौल में यह जी-20 शिखर सम्मेलन होने वाला है, उसमें ऐसे किसी कदम की उम्मीद कम ही है।