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एक गलत को दूसरे से सही नहीं कर सकते: राष्ट्रपति के 14 सवाल अहम... व्याख्या कर नए प्रावधान बनाना गलती

Fri, 16 May 2025 05:20 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Fri, 16 May 2025 05:20 AM IST
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सार
तमिलनाडु के राज्यपाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई लिहाज से गलत है। विधेयकों को लंबित रखना एक मुद्दा हो सकता है, लेकिन संविधान में जो प्रावधान नहीं है, उसकी व्याख्या करके नए प्रावधान बना देना बड़ी गलती है। राष्ट्रपति के 14 सवाल यही बताते हैं कि एक गलत को दूसरे गलत से सही नहीं किया जा सकता।
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exe vs judiciary President Droupadi Murmu 14 que Vital Supreme Court provisions by interpreting wrong decision
राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के नए चीफ जस्टिस बीआर गवई को छह महीने के संक्षिप्त कार्यकाल में तीन बड़ी चुनौतियां उत्तराधिकार में मिली हैं। पांच करोड़ लंबित मुकदमों का बोझ, कॉलेजियम में सुधार और जजों के भ्रष्टाचार से निपटने का तंत्र। तमिलनाडु विधानसभा से पारित बिलों को राज्यपाल और राष्ट्रपति की समयबद्ध मंजूरी के लिए पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था। दो जजों ने संविधान के अनुच्छेद 142 की असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्यपाल की अनुमति के बगैर ही विधेयकों को मंजूरी दी थी। उपराष्ट्रपति ने 142 के इस्तेमाल को परमाणु मिसाइल जैसा खतरनाक बताया था। अब केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के माध्यम से अनुच्छेद 143 के तहत 14 सवालों का रेफरेंस भेजकर नए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष बड़ी चुनौती पेश की है।



सुप्रीम कोर्ट के नियमानुसार, ऐसे मामलों में केंद्र सरकार को पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए। इसलिए सवालों के गुण-दोष पर गए बगैर सुप्रीम कोर्ट राय देने से मना कर सकता है। अनुच्छेद-143 के तहत सबसे पहले महत्वपूर्ण मामले ‘दिल्ली लॉज एक्ट-1951’ में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी। केरल शैक्षणिक बिल-1957 पर रेफरेंस को सांविधानिक तौर पर व्याख्यायित करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने राय दी थी। लेकिन अयोध्या में राममंदिर विवाद पर नरसिंह राव सरकार के रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों से जुड़े मामलों में राय देना अनुच्छेद-143 के दायरे में नहीं आता। साल 1993 में कावेरी जल विवाद रेफरेंस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया। साल 2002 में गुजरात चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपील या पुनर्विचार याचिका दायर करने के बजाय 143 से रेफरेंस भेजने का विकल्प सांविधानिक तौर पर गलत है। पूर्व चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की तरह रेफरेंस पर राय बाध्यकारी नहीं होना सांविधानिक तौर पर विचित्र है।


राज्यपाल मामले से जुड़े कुछ पहलू 2-जी मामले में यूपीए सरकार के रेफरेंस से मेल खाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 122 फर्मों और कंपनियों के 2-जी लाइसेंस व स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द कर दिया था। केंद्र सरकार ने उस फैसले के खिलाफ रेफरेंस भेजते हुए पूछा था कि क्या नीतिगत मामलों में सुप्रीम कोर्ट की दखलंदाजी होनी चाहिए? केशवानंद भारती मामले में संविधान पीठ के फैसले के अनुसार, साल 2006 में इंदौर नगर निगम मामले में तीन जजों की बेंच ने फैसला दिया था कि नीतिगत मामलों में संसद और केंद्र सरकार के निर्णयों पर अदालतों की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए।

राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई लिहाज से गलत है। ऐसे मामले में दो जजों के बजाय संविधान पीठ के पांच जजों के सामने सुनवाई होनी चाहिए। रिटायरमेंट भाषण में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि लंबी व जटिल याचिकाएं जल्द और सही न्याय में बाधक हैं। इंटरनेट रिसर्च और लॉ क्लर्क की मदद से लिखे जा रहे भारी-भरकम फैसलों पर भी रोक लगनी चाहिए। तमिलनाडु मामले में जजों ने यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फिजी के साथ पाकिस्तान की सांविधानिक व्यवस्था का विश्लेषण किया, जो अप्रासंगिक होने के साथ गलत भी है।

संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास बिल कितने दिन लंबित रहेगा, इसका जिक्र नहीं है। संविधान में जो प्रावधान नहीं है, उसकी व्याख्या करके सुप्रीम कोर्ट ने नए प्रावधान बना दिए। केशवानंद भारती फैसले के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट को कानून निर्माण या संविधान संशोधन की शक्ति नहीं है। सरकार की गलतियों को ठीक करने के लिए जजों को संरक्षक की भूमिका मिली है। ऐेसे में एक गलत को दूसरे गलत से सही नहीं किया जा सकता है। सरकार गलत करे, तो जनता चुनाव में विरोध दर्ज करा सकती है, लेकिन न्यायपालिका यदि संविधान का अतिक्रमण करने लगे, तो यह लाइलाज मर्ज हो सकता है। 

मौजूदा प्रावधान पर्याप्त न हों या अस्पष्ट हों, तब न्याय सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 142 के जरिये सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय करने की विशेष शक्ति मिली है। डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में इस अनुच्छेद का समर्थन करते हुए इसे सेफ्टी वॉल्व कहा था। इसके तहत जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति यानी केंद्र सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट आदेश दे सकता है, लेकिन राष्ट्रपति या राज्यपाल की तरह काम करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। मान लें, जज नियुक्ति की सिफारिश लंबित हो, तो सुप्रीम कोर्ट यह नहीं कह सकता कि सिफारिश लंबित है, तो हम राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना नियुक्ति कर देते हैं। अनुच्छेद 141 के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होते हैं। इसलिए राज्यपाल फैसले के समयबद्ध निर्णय की व्यवस्था को सभी अदालतों में लागू करने की जरूरत है, जिससे पांच करोड़ मुकदमों से पीड़ित लोगों को समयबद्ध न्याय मिल सके।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ‘संविधान की सफलता इसका संचालन करने वाले लोगों के आचरण व विवेकपूर्ण बर्ताव पर निर्भर रहेगी।’ रेफरेंस में पूछे गए 14 सवालों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ सरकारी कामकाज की कमियां भी उजागर होती हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह झलकता है कि विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपाल, सलाहकार के बजाय बाधा डालने वाली मशीनरी के तौर पर काम कर रहे हैं। केंद्र-राज्य संबंधों पर तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि ने कमेटी बनाई थी। उसी तर्ज पर अब स्टालिन सरकार ने पूर्व जज की अध्यक्षता में कमेटी के गठन का एलान किया है। इसलिए संघीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए संविधान में जन कल्याण की भावना के अनुसार सरकारी कामकाज में सुधार की कोशिश होनी चाहिए। 

इस रेफरेंस से केंद्र-राज्य संबंध, संघीय व्यवस्था, संविधान पीठ में सुनवाई, राज्यपाल के अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन और अनुच्छेद-142 के बेजा इस्तेमाल पर गंभीर बहस शुरू हो सकती है। संसद और सरकार की गलतियों को ठीक करने के साथ आम जनता को न्याय देने और न्यापालिका में संस्थागत सुधार के लिए 142 की विशिष्ट शक्तियों का सुप्रीम कोर्ट को इस्तेमाल कर सकता है। इसके तहत अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन, गरीब और बेगुनाह कैदियों की रिहाई, सभी जजों की संपत्ति की घोषणा, भ्रष्ट जजों की महाभियोग के बगैर बर्खास्तगी जैसे कुछ मामले हो सकते हैं। राष्ट्रपति के रेफरेंस पर बहस से न्यायपालिका में भी सुधारों की ऐतिहासिक शुरुआत हो, तो संविधान के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न ज्यादा सफल होगा।

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