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अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के बड़े पक्षधर भी अपने किसी प्रियजन की आलोचना नहीं सह सकते

Mon, 19 Apr 2021 09:46 AM IST
तस्लीमा नसरीन तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Published by: तस्लीमा नसरीन Updated Mon, 19 Apr 2021 09:46 AM IST
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Even the big Supporters of freedom of expression cannot bear the criticism of a loved one
मोईन अली (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

जब तक आप इसकी-उसकी आलोचना करेंगे, जब तक आप कमजोरों-असहायों की आलोचना करेंगे, तब तक आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आपको शाबासी देगी। पर जैसे ही आप किसी नामचीन व्यक्ति के बारे में मीन-मेख निकालेंगे, तब आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी आलोचना के घेरे में आ जाएगी। जब आप लोकप्रिय व्यक्ति की आलोचना करेंगे, तो लोग आपसे घृणा करने लगेंगे।


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फ्रांस की शार्ली हेब्दो पत्रिका प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय लोगों की आलोचना करती है। मैं तो बहुत पहले ही अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर गंभीर विचार-विमर्श कर इस निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी मुद्दे पर, किसी भी व्यक्ति के बारे में आलोचना करने का अधिकार है। अगर आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यकीन करते हैं, तो सिर्फ अपने और अपने दोस्तों की नहीं, अपने दुश्मनों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी यकीन करेंगे। अगर आप अपने विरोधी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करते, तो फिर आप अभिव्यक्ति के अधिकार के समर्थक हो ही नहीं सकते। शार्ली हेब्दो पत्रिका किसी भी राजनेता, विद्वान, धर्मगुरु को नहीं बख्शती। आतंकवादी इस पत्रिका से जुड़े लगभग सभी लोगों की हत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद कुछ लोगों का समर्थन पाकर यह पत्रिका फिर से अपनी रीढ़ सीधी कर खड़ी हुई है। लेकिन इस पत्रिका के घनघोर समर्थकों में से भी कुछ ने उस दिन मेरे एक ट्वीट पर मुझे निशाना बनाने में गुरेज नहीं किया, क्योंकि वह ट्वीट उनके एक प्रिय खिलाड़ी से संबंधित था।

इसका मतलब यह है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के बड़े पक्षधर भी अपने किसी प्रियजन की आलोचना नहीं सह सकते। इसका मतलब यह भी है कि शार्ली हेब्दो जैसी पत्रिका तभी तक अच्छी है, जब तक वह आपके किसी प्रियजन पर हमला नहीं करती। मेरे किस गुनाह के कारण ट्विटर पर लोगों ने मुझ पर हमला बोला? मेरा जुर्म यह था कि मैंने ब्रिटिश क्रिकेटर मोईन अली की आलोचना की थी। मैंने ट्वीट किया था कि अगर अली क्रिकेटर नहीं होते, तो शायद सीरिया जाकर आतंकवादी संगठन आईएसआईएस का हिस्सा बन चुके होते।

बस फिर क्या था! पत्रिका, न्यूज पोर्टल, टीवी चैनल समेत मीडिया का कोई माध्यम या हिस्सा ऐसा नहीं था, जिसने मुझ पर जहर न उगला हो। मोईन अली के खिलाफ मेरे एक ट्वीट पर पूरा उपमहादेश जैसे क्रोध और घृणा में धधक उठा। जो क्रिकेट देखते हैं, वे तो मुझ पर नाराज थे ही, जो क्रिकेट नहीं देखते, वे भी मुझ पर भड़क गए। पर मोईन अली की मैंने जो आलोचना की, उसका जायज कारण था। जो क्रिकेटर अजान की ध्वनि सुनने पर मैदान में जानमाज बिछाकर नमाज पढ़ने बैठ जाता हो, जो खिलाड़ी खेल के बीच में ही अंपायर से कहकर नमाज पढ़ने चला जाता हो, टीम के खिलाड़ियों द्वारा जीत का शैंपेन खोलने पर जो दूर हट जाता हो, बियर कंपनी के लोगो वाली जर्सी पहनने से जो इंकार करता हो, चौदह सौ साल पुराने इस्लामी आदेश के मुताबिक जो अपनी मूंछ ट्रिम करता हो पर दाढ़ी बढ़ाता हो, जो किसी महिला पत्रकार की ओर देखे बगैर ही इंटरव्यू देता हो और पत्नी को हिजाब पहनाता हो, जिंबाब्वे के एक ऐसे मुफ्ती को जो अपना दोस्त बताता हो, जो व्यभिचारियों को पत्थर मारने की सजा देने का समर्थन करता है, जो यह कहता हो कि क्रिकेट छोड़ दूंगा, पर मजहब नहीं छोड़ सकता, जो खिलाड़ी दुनिया भर के पीड़ित लोगों की चिंता किए बगैर अपने बाजू पर 'गाजा को बचाओ, फलस्तीन की रक्षा करो' का बैज लगाकर मैदान में जाता हो, उस खिलाड़ी की आलोचना करके मैंने आखिर ऐसा कौन-सा गुनाह किया है! लेकिन मुझे धमकी दी गई कि मेरे ट्विटर अकाउंट पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।

मोईन अली के एक साथी खिलाड़ी ने मेरे ट्विटर अकाउंट के बारे में रिपोर्ट करने के लिए कहा। लाखों लोगों द्वारा रिपोर्ट किए जाने के कारण ट्विटर ने मेरे अकाउंट पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन बाद में उसने मुझे चेतावनी देकर छोड़ दिया कि अगर भविष्य में मैंने ऐसा कोई ट्वीट किया, तो मेरा ट्विटर अकाउंट हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा। जबकि ट्विटर पर मुझे निशाना बनाने से पहले मोईन अली पर मेरे ट्वीट को चार हजार से अधिक लोगों ने लाइक किया था। पिछले कुछ दिनों से मैंने महसूस किया है कि अफवाह बहुत ताकतवर होती है, जबकि घृणा बेहद संक्रामक है। मैंने ट्वीट किया था कि अगर मोईन अली क्रिकेट न खेलते, तो क्या करते। अगर वह क्रिकेट नहीं खेलते, तो निहायत ही सामान्य इंसान होते, जो हमेशा मजहब की बात करता है। यहां एक बात बताना आवश्यक है।

सीरिया जाकर आईएस से जुड़ने वाले लोग चोर-डाकू नहीं थे, बल्कि वे सभी बेहद धार्मिक थे। हालांकि मैं यह भी नहीं कहती कि सभी मजहबी लोगों ने सीरिया का रुख किया। ढाका के गुलशन कैफे को निशाना बनाने वाले सभी युवा रोजा रखने वाले, पांच वक्त नमाज पढ़ने वाले और पढ़ने-लिखने में बेहद जहीन थे। बोस्टन मैराथन में प्रेशर कुकर बम रखने वाले दो भाई भी बेहद प्रतिभाशाली थे। बांग्लादेश के मदरसों के अत्यंत धार्मिक शिक्षक और छात्र क्या कर रहे हैं, यह तो हम अपनी आंखों से देख ही रहे हैं। मेरी मां भी बहुत धार्मिक थीं, लेकिन वह हमेशा धार्मिक कट्टरवादियों के खिलाफ खड़ी रहती थीं। मुझे सवाल किया गया था कि मैंने मोईन अली पर वह ट्वीट डिलीट क्यों किया। जवाब है कि ट्विटर के अधिकारियों ने ऐसा करने के लिए मुझे कहा था। मुझ पर यह भी आरोप लगाया गया कि जोखिम देखकर मैंने बहाना बना दिया कि मोईन अली से मजाक किया था। क्या मैं कभी जोखिम से डरी हूं? क्या मैंने कभी समझौता किया है?

समझौता करके तो मैं बांग्लादेश में ही रह सकती थी। जो मुस्लिम-विरोधी हैं, वे मुस्लिम समाज को अंधेरे में ही रखना चाहते हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहती। इसलिए जोखिम उठाकर भी, निर्वासित जीवन में भी निरंतर लिख रही हूं। मुस्लिम कट्टरवादी अब तक कहते थे कि हिंदू मेरा समर्थन करते हैं। लेकिन मोईन अली पर ट्वीट ने हिंदुओं को भी मेरा विरोधी बना दिया। मैंने इस उपमहादेश में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए लज्जा उपन्यास लिखा था। लेकिन मेरे उस उपन्यास से जो संभव नहीं हो पाया, लगता है, वह एक ट्वीट से हो गया।

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