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अब भी अंग्रेजी के गुलाम

Mon, 14 Sep 2015 07:24 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 14 Sep 2015 07:24 PM IST
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even now slave of english

पिछले सप्ताह हिंदी दिवस का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने बड़ी अच्छी बातें कही थीं। उन्होंने बताया था कि किस तरह चाय बेचते हुए उन्होंने हिंदी सीखी। उन्होंने बताया कि इस डिजिटल दौर में तीन भाषाएं महत्वपूर्ण हैं, चीनी, हिंदी और अंग्रेजी। उन्होंने यह स्वीकार किया कि हिंदी को विश्व भर में लोकप्रिय बनाने में हिंदी फिल्मों का कितना योगदान रहा है। उनकी ये बातें सुनकर अच्छा लगा, लेकिन दुख हुआ कि प्रधानमंत्री ने ये सब बातें कहने के बाद यह नहीं कहा कि जब हिंदी के लिए विशेष दिवस रखना बंद कर देंगे, तब यकीन के साथ कह सकेंगे कि हिंदी एक जिंदा भाषा है, जिसको सरकारी सहायता की जरूरत नहीं है।

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प्रधानमंत्री इसलिए शायद यह बात नहीं कह पाए, क्योंकि उनको भी मालूम होगा कि हिंदी को जितना नुकसान अंग्रेजों के जाने के बाद हुआ है, उतना नुकसान अंग्रेज भी नहीं कर पाए थे। प्रधानमंत्री यह भी नहीं कह पाए कि यह नुकसान हुआ है, क्योंकि ब्रिटिश राज के समाप्त होने के बाद जिन भारतीयों ने उनकी जगह ली, उन्होंने कभी ऐसी शिक्षा नीति नहीं बनाई, जिनके द्वारा देश के स्कूलों में हिंदी को वह जगह दी जा सके, जो अंग्रेजों ने अंग्रेजी को दे रखी थी।
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शिक्षा क्षेत्र में अनेक नीतियां बनीं, लेकिन यह इस देश की बदकिस्मती है कि एक भी शिक्षा मंत्री ऐसा नहीं मिला है आज तक, जिसको एहसास हुआ हो कि जब तक बच्चों को अंग्रेजी के माध्यम से इतिहास, भूगोल और गणित पढ़ाया जाएगा, तब तक हमारे बच्चे अंग्रेजी के गुलाम ही रहेंगे। इस गुलामी का सुबूत किताबों की दुकानों में मिलता है। आप किसी भी महानगर, किसी भी कस्बे में जांच कर सकते हैं, चाहे वह तमिलनाडु हो, चाहे महाराष्ट्र, चाहे पश्चिम बंगाल- आपको बड़ी दुकानों में सिर्फ अंग्रेजी की किताबें ही मिलेंगी। हां, यह जरूर है कि इन दुकानों के एक कोने में आपको शायद भारतीय भाषाओं की किताबें भी मिल जाएं। एक सच यह भी है कि हिंदी फिल्मों ने जितना काम किया है हिंदी और उर्दू को जिंदा और लोकप्रिय रखने में, उतना काम सरकारी अधिकारी नहीं कर पाए हैं।
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इसका मुख्य कारण यह है कि जिन सरकारी संस्थानों को 1947 के बाद भारतीय भाषाओं को जिंदा रखने का काम सौंपा गया था, वे शुरू से सिर्फ सरकारी नौकरियां हासिल करने का जरिया बन गए थे। हिंदी फिल्में न होतीं, हिंदी फिल्मों के गाने न होते, तो हिंदी भाषा आज उर्दू की तरह कब्र में पांव लटकाए हुए होती। दरअसल जो भाषा रोजी-रोटी का साधन नहीं बनती है, वह भाषा धीरे-धीरे अपनी अहमियत खो बैठती है।


विश्व हिंदी सम्मेलन मनाने के बदले हमें जरूरत है एक नई शिक्षा नीति की, जिसमें अंग्रेजी शिक्षा के प्रावधान बेशक हों, लेकिन दूसरी भाषा के तौर पर। शिक्षा में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को ज्यादा अहमियत दी जानी चाहिए। आज हाल यह है कि देश के स्कूलों से जो बच्चे निकल कर आते हैं, वे चेतन भगत के अलावा अगर किसी लेखक का नाम बता सकते हों, इसे बहुत बड़ी बात माननी चाहिए। इसलिए प्रधानमंत्री की बातें सुनकर अच्छा तो लगा, लेकिन इसका दुख है कि स्वतंत्रता के अड़सठ वर्ष बाद भी हिंदी को जिलाए रखने के लिए विशेष दिवस की आवश्यकता पड़ती है। अंग्रेजों के जाने के बाद भी हम अंग्रेजी के गुलाम बने हुए हैं।

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