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पर्यावरण: क्या यह साल भी गर्मी के रिकॉर्ड तोड़ेगा, ये सवाल भी है परेशान करने वाला
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सर्दी का मौसम लगभग जाने को है। ऐसे में देखना होगा कि साल 2025 कितना पर्यावरणीय अनुकूल बन पाएगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा। यह घटना जलवायु संकट की गंभीरता को उजागर करती है। बढ़ता तापमान मानवजनित गतिविधियों और नीतिगत लापरवाहियों का परिणाम है। धरती की लगातार बढ़ती गर्माहट वर्ष 2025 में क्या नया रिकॉर्ड बनाएगी, यह तो आगामी समय ही बताएगा।
आंकड़ों पर नजर डालें, तो बीते पंद्रह वर्षों में सबसे गर्म पांच वर्षों का होना इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि जलवायु परिवर्तन अब एक अनदेखी समस्या नहीं रही। इसके प्रभाव हर साल और अधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं, जो न केवल पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि मानव जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रहे हैं। वर्ष 2024 में वैश्विक तापमान वृद्धि ने औद्योगिक युग (1850-1900) के पूर्व-स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर लिया। भारत की ऊर्जा संरचना कोयले पर अत्यधिक निर्भर है, जो कुल ऊर्जा उत्पादन का 77 फीसदी है। नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में सकारात्मक प्रगति के बावजूद, इसका वास्तविक योगदान 10 प्रतिशत से भी कम है। हालांकि, वैश्विक उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी केवल आठ फीसदी है, जो चीन और अमेरिका से काफी कम है।
भारत के लिए यह समय है कि वह जलवायु परिवर्तन से निपटने की अपनी रणनीतियों को और अधिक सुदृढ़ बनाए। इसे न केवल राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा स्रोतों की विविधता बढ़ाने की जरूरत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपने प्रयासों को मजबूती से प्रस्तुत करना होगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ आगे बढ़ें। इंडिया स्टेट ऑफ द फॉरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर) के अनुसार, देश का वन क्षेत्र बढ़कर 25 फीसदी हो गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसके परिणामस्वरूप भारत का कार्बन सिंक 2005 के स्तर से 2.29 अरब टन तक अधिक हो गया है। रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपनी कार्बन सिंक प्रतिबद्धता को समय से पहले पूरा कर लिया है। लेकिन पौधारोपण को वन क्षेत्र मानने की सरकारी प्रवृत्ति भ्रामक है, क्योंकि ऐसे क्षेत्रों की कार्बन अवशोषण क्षमता सीमित होती है।
भारत ने शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य 2070 तक तय किया है, लेकिन हर गुजरते साल के साथ बढ़ती गर्मी इस लक्ष्य को समय से पहले पूरा करने की जरूरत पर बल देती है। जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है; यह मानव जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रही है। वैसे भी भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत से आधा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत जलवायु संकट से मुक्त है। देश को न केवल इस चुनौती को स्वीकार करना होगा, बल्कि निर्णायक पहल भी करनी होगी।
सबसे पहले, नीति निर्माताओं को जलवायु कार्य योजनाओं में व्यापक सुधार करने होंगे। इन योजनाओं को क्षेत्रीय और स्थानीय जरूरतों के अनुसार तैयार करना होगा, ताकि उनकी प्रभावशीलता बढ़ सके। इसके साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा की भंडारण क्षमता को उन्नत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए अत्याधुनिक भंडारण तकनीकों में निवेश अनिवार्य है। दूसरा, हरित तकनीकों को अपनाने और उनका विस्तार करने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। इसके तहत ऊर्जा-कुशल उपकरणों और इमारतों को प्रोत्साहन देना, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना और स्वच्छ उद्योगों को बढ़ावा देना शामिल है। तीसरा, शहरीकरण और औद्योगीकरण को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। स्मार्ट शहरों के निर्माण में हरित क्षेत्रों का समावेश, जल-प्रबंधन प्रणालियों का सुधार और टिकाऊ परिवहन तंत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
जलवायु संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना और वैश्विक मंचों पर अपनी चिंताओं और आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से रखना होगा। जलवायु वित्त और तकनीकी सहायता के क्षेत्र में विकसित देशों से समर्थन प्राप्त करने की दिशा में भारत को अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। इन ठोस और दूरदर्शी कदमों के बिना, जलवायु संकट का प्रभाव केवल गहराता जाएगा। अब समय आ गया है कि भारत अपने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए निर्णायक कार्यों की दिशा में आगे बढ़े। ग्लोबल वार्मिंग की इस गति में औद्योगिक क्रांतियों के बाद से तेज वृद्धि हुई है। बढ़ते उत्सर्जन स्तर, वनों की कटाई और ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता ने इस समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। 2024 का यह रिकॉर्ड केवल चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर संकेत है कि अब ठोस और तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।