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पर्यावरण: इसलिए गर्म नहीं हो रही धरती, पृथ्वी की उत्पत्ति से ही सक्रिय हैं नियंत्रणकारी शक्तियां

Thu, 26 Feb 2026 07:00 AM IST
पवन पांडेय डाइटमार मुलर, प्रोफेसर, सिडनी यूनिवर्सिटी
डाइटमार मुलर, प्रोफेसर, सिडनी यूनिवर्सिटी Published by: पवन पांडेय Updated Thu, 26 Feb 2026 07:00 AM IST
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सार
प्रचलित धारणा है कि धरती के गर्म होने के लिए वाहनों का धुआं, एसी-फ्रिज और औद्योगिक उत्सर्जन जिम्मेदार हैं, पर एक हालिया शोध बताता है कि धरती के तापमान को नियंत्रित करने वाली ताकतें हमारी सोच से कहीं अधिक जटिल हैं, जो पृथ्वी की उत्पत्ति के समय से ही काम कर रही हैं।
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Environment: This is why Earth is warming; controlling forces have been active since the Earth's origin.
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हमारी पृथ्वी ने अपने लंबे इतिहास में जलवायु के कई चरम दौर देखे हैं। कभी यह ठिठुरती हुई ‘आइसहाउस’ बन गई, तो कभी तपते हुए ‘ग्रीनहाउस’ में तब्दील हो गई। वैज्ञानिक लंबे समय से जलवायु के इन उतार-चढ़ावों का सीधा संबंध वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा से जोड़ते आए हैं। लेकिन, ताजा शोध ने इस धारणा को नया मोड़ दे दिया है। अब यह पता चला है कि इस कार्बन का स्रोत और इसे नियंत्रित करने वाली ताकतें हमारी पुरानी सोच से कहीं अधिक जटिल हैं।


हकीकत तो यह है कि पृथ्वी की सतह पर टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल जलवायु को आकार देने में एक ऐसी बड़ी भूमिका निभाती है, जिसे अब तक नजरअंदाज किया गया था। कार्बन केवल उन जगहों से नहीं निकलता, जहां प्लेटें आपस में टकराती हैं, बल्कि वे स्थान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जहां ये प्लेटें एक-दूसरे से दूर खिंचती हैं। कम्युनिकेशंस, अर्थ एंड एन्वॉयरन्मेंट जर्नल में प्रकाशित हमारा नया अध्ययन इस रहस्य से पर्दा उठाता है कि पिछले 54 करोड़ वर्षों में पृथ्वी की टेक्टोनिक्स प्लेटों ने वैश्विक जलवायु को गढ़ने में वास्तव में किस तरह मदद की है। जहां पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं, वहां ज्वालामुखियों की लंबी शृंखलाएं बन जाती हैं, जिन्हें ‘वॉल्केनिक आर्क्स (ज्वालामुखीय चाप)’ कहा जाता है। इन ज्वालामुखियों से जुड़ी पिघलने की प्रक्रिया चट्टानों के भीतर हजारों वर्षों से कैद कार्बन को मुक्त कर देती है और उसे धरती की सतह पर ले आती है।


ऐतिहासिक रूप से अब तक यही माना जाता रहा है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड को घोलने के लिए मुख्य रूप से ये ज्वालामुखी ही जिम्मेदार थे, लेकिन हमारा शोध बताता है कि मध्य-समुद्र की पर्वतमालाएं और महाद्वीपीय दरारें, यानी वे, स्थान जहां टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर फैलती हैं, पूरे भूगर्भीय समय के दौरान पृथ्वी के कार्बन चक्र को संचालित करने में कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि दुनिया के महासागर वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड की विशाल मात्रा को सोख लेते हैं और उसे समुद्र तल पर मौजूद कार्बन-समृद्ध चट्टानों के भीतर जमा कर देते हैं। हजारों वर्षों में, यह प्रक्रिया समुद्र की गहराई में सैकड़ों मीटर मोटी कार्बन-समृद्ध तलछट की परतें पैदा कर देती है। जैसे-जैसे ये चट्टानें टेक्टोनिक प्लेटों के साथ पूरी पृथ्वी पर घूमती हैं, वे अंततः ‘सबडक्शन जोन’ से टकराती हैं। सबडक्शन जोन वे जगहें हैं, जहां प्लेटें आपस में मिलती हैं। यहां पहुंचकर ये चट्टानें अपने भीतर दबे कार्बन डाइऑक्साइड के भंडार को वापस वायुमंडल में मुक्त कर देती हैं। इसे ‘डीप कार्बन साइकिल’ (गहरा कार्बन चक्र) के रूप में जाना जाता है।

हम टेक्टोनिक प्लेटों पर जमा कार्बन की हलचल को फिर से गढ़कर, पिछले 54 करोड़ वर्षों की प्रमुख ‘ग्रीनहाउस’ (गर्म) और ‘आइसहाउस’ (ठंडी) जलवायु परिस्थितियों की सटीक भविष्यवाणी करने में सफल रहे। ग्रीनहाउस काल के दौरान, जब पृथ्वी अधिक गर्म थी, चट्टानों में कैद होने वाले कार्बन की तुलना में वायुमंडल में अधिक कार्बन मुक्त हुआ। इसके विपरीत, आइसहाउस जलवायु के दौरान, महासागरों में कार्बन जमा होने की प्रक्रिया हावी रही, जिससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर गिर गया और वैश्विक शीतलन (कूलिंग) की शुरुआत हुई। हमारे अध्ययन का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड को नियंत्रित करने में गहरे समुद्र की तलछट की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे टेक्टोनिक प्लेटें धीरे-धीरे खिसकती हैं, वे अपने साथ कार्बन-समृद्ध तलछट ले जाती हैं, जो अंततः ‘सबडक्शन’ की प्रक्रिया के माध्यम से पृथ्वी के गर्भ में वापस लौट जाती हैं। हम यह स्पष्ट करते हैं कि यही प्रक्रिया यह तय करने वाला सबसे बड़ा कारक है कि पृथ्वी ग्रीनहाउस (गर्म) अवस्था में रहेगी या आइसहाउस (ठंडी) स्थिति में।

ऐतिहासिक रूप से, ज्वालामुखीय चापों से निकलने वाले कार्बन को वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के सबसे बड़े स्रोतों में से एक माना जाता रहा है। लेकिन, हमारे शोध के अनुसार यह प्रक्रिया पिछले 12 करोड़ वर्षों में ही प्रभावी हुई है, और इसका श्रेय जाता है ‘प्लेंक्टिक कैल्सीफायर्स’ को। ये नन्हे समुद्री जीव फाइटोप्लांकटन परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जिनकी मुख्य खूबी घुले हुए कार्बन को कैल्साइट में बदलना है। ये जीव वायुमंडलीय कार्बन की विशाल मात्रा को सोखकर उसे समुद्र तल पर जमा होने वाली कार्बन-समृद्ध तलछट में बदलने के लिए जिम्मेदार हैं।

प्लेंक्टिक कैल्सीफायर्स का विकास लगभग 20 करोड़ साल पहले हुआ था और ये करीब 15 करोड़ साल पहले दुनिया के महासागरों में फैल गए थे। इसलिए, पिछले 12 करोड़ वर्षों में ज्वालामुखीय चापों से वायुमंडल में जो भारी मात्रा में कार्बन निकला है, वह दरअसल इन्हीं नन्हे जीवों द्वारा बनाई गई कार्बन-समृद्ध तलछट का परिणाम है। इससे पहले के कालखंड में हमने पाया कि वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड में मुख्य योगदान मध्य-समुद्र की पर्वतमालाओं और महाद्वीपीय दरारों, यानी वे क्षेत्र, जहां टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर खिंचती हैं, से निकलने वाले कार्बन का था। हमारे ये निष्कर्ष इस बात पर एक नया नजरिया पेश करते हैं कि कैसे पृथ्वी की टेक्टोनिक प्रक्रियाओं ने हमारी जलवायु को गढ़ा है और भविष्य में भी वे इसे प्रभावित करती रहेंगी। ये नतीजे बताते हैं कि पृथ्वी की जलवायु केवल वायुमंडलीय कार्बन से ही संचालित नहीं होती, बल्कि यह पृथ्वी की सतह से होने वाले कार्बन उत्सर्जन और समुद्र तल की तलछट में उनके कैद होने के बीच के जटिल संतुलन से प्रभावित होती है।

यह शोध भविष्य के जलवायु मॉडलों के लिए भी महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, विशेष रूप से बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड स्तर को लेकर वर्तमान चिंताओं के संदर्भ में। अब हम जानते हैं कि हमारे पैरों के नीचे खिसकती टेक्टोनिक प्लेटों से प्रभावित पृथ्वी का प्राकृतिक कार्बन चक्र, ग्रह की जलवायु को नियंत्रित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भूगर्भीय समय के इस गहरे परिप्रेक्ष्य को समझना हमें भविष्य के जलवायु परिदृश्यों और मानवीय गतिविधियों के निरंतर पड़ने वाले प्रभावों की बेहतर भविष्यवाणी करने में मदद कर सकता है। - साथ में सबिन जाहिरोविक और एड्रियाना डटकिविज।  (द कन्वर्सेशन)
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